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भारतीय संस्कृति पर कविता | Poem On Indian Culture In Hindi

भारतीय संस्कृति पर कविता | Poem On Indian Culture In Hindi- नमस्कार साथियों स्वागत है, आपका आज के हमारे इस लेख में साथियों आज हम आपके लिए इस लेख में हमारी भारतीय संस्कृति और विरासत तथा गौरवान्वित करने वाले अतीत से जुडी कविताएँ जो अपनी संस्कृति को जिजीविषा का उद्भव करती है. आपके समक्ष प्रस्तुत करेंगे. 

भारतीय संस्कृति पर कविता | Poem On Indian Culture In Hindi

भारतीय संस्कृति जी़वन की विधि है,
संस्कारों से पोषित बहुमूल्य निधि़ है।
विश्व की पहली और महान संस्कृ़ति,
विविध़ता में एकता की अनुरक्त समीकृति।
 
अमृत स्रोतस्वि़नी विकास चिरप्रवाहिता,
संस्का़रित और परिष्कृत विचारवाहि़ता।
 
ध़न्य सुवासित भारतीय संस्कृति सु़पुष्पी,
ज्ञान, भक्ति, सद्कर्मों के प्रांग़ण में पनपी।
 
समेटे सांस्कृतिक, धार्मिक, भाषा़ की विविधता,
शिष्टाचार, संवाद, धार्मिक संस्कारों की परिशु़द्धता।
 
परिवारो, जातियो और धार्मिक समुदायो का सभ्या़चार,
विवाह, परपराएं, रीति-रिवाज, उत्स़वो का मंग़लाचार।
 
इंसानि़यत, उदारता, एकता, धर्मनि़रपेक्षता, अपनाएगे,
समता, समन्वय, सदाचा़र से इसे अक्षुण्ण बनाएगे।

राष्ट्रीय संस्कृति पर कविता

संस्कारों से बंधी में संस्कृति मेरी पह़चान है
मैं कहू शान से मेरा भारत महान है
शि़ष्टाचार और सभ्य़ता की यहां खान है
और आने़ वाला हर अतिथि भी यहा भगवान है
मैं कहूं शा़न से मेरा भारत महान है

नहीं को़ई भेदभाव किसी मै
साथ-साथ चलते हिंदू और मुसलमान हैं
मै कहू शान से मेरा भारत महान है
नृत्य क़ला और संगीत का एक अलग ही नाम़ है
पूरा विश्व ही करता इसका गुणगाऩ है
मैं कहूं शाऩ से मेरा भारत महान है

नदियों को भी मिलता मां जै़सा सम्मान है
ओर  हर घर में बसते यहां प्रभु श्रीराम है
वेद, उपनिष़दों का भी यहां खू़ब विस्तार हैं
परंपराओं और मान्य़ताओं से बंधा यहा हर इंसान है
ऐसी पावऩ संस्कृति वर्णन कर पाना़ कहा आसान है
मै कहू शान से मेरा भारत महान है..||

कविता : हमारी संस्कृति

अपने देश वाली संस्कृति ही
हमको पहचान दिलाती है
देश वाली एकता ही
हमको सबसे अलग बनाती है

नमस्कार कहें या फिर 
कहें वड़क्कम
दिल हमेशा साफ-सुथरा रहता है
हमारी संस्कृति का अपनत्व और प्यार ही
भावनाओं से जुड़ा लगाव रहता है

हलवा खाओ या फिर पूरी
या फिर खाओ इडली-सांभर-डोसा
एक बार में ही पेट भर जाता है
बंगाल की मिष्टी-दोई खाके
मन प्रफुल्लित सा हो जाता है
अपनी संस्कृति का प्यार सबको बहुत भाता है,
यही खाने को स्वादिष्ट बनाता है

भंगड़ा करो या फिर 
करो गरबा
खुशहाली सी छा जाती है,
अपने संस्कृति की यही है, पहचान
यहां दिलों से अपनाया जाता है

पूजा करो श्रीराम की या फिर करो
खाटू-महाराज जी की
बस मनोभाव ही तो देखा जाता है
हमारी संस्कृति की पहचान यही है
यहां बस परायों को अपना बनाया जाता है..||

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