Short Poem In Hindi Kavita

गेहूं पर कविता | Poem On Wheat in Hindi

गेहूं पर कविता | Poem On Wheat in Hindi में आपका स्वागत हैं. आज हम गेंहूँ के अनाज पर लिखी गई कुछ महत्वपूर्ण हिंदी कविताएँ साझा कर रहे हैं. हमें उम्मीद है आपको यह कविता संग्रह बहुत पसंद भी आएगा.


गेहूं पर कविता | Poem On Wheat in Hindi


गेहूं पर कविता | Poem On Wheat in Hindi


 गेहूं की बालियाँ

हरी भरी बालियाँ
बजा रही तालियाँ
ओलों में अड़ि रहीं
कुहरे से जूझ गई
पाले में खड़ी रही
पत्थर की बालियाँ
जीत गई बाजियाँ
पकी पकी बालियाँ
खुशियों की तालियाँ
सूरज ने गर्मी दी
पूरी हमदर्दी दी
सोने की वर्दी दी
महक उठीं थालियाँ
चहक उठी बालियाँ

गेहूँ चाँस लगे

गेहूं चांस लगे, आँख़ के कितनें पास
कि नत्थूं घर मे बैठें-बैठें गिन लेता हैं
पीक़ बालियां दाने क़ीमत क़र्ज़ां बचत।
और मेड पर नन्हें की अंगुली थामें चलता हैं

गेहूं की चांस के साथ-साथ
आगें ज़ाता हैं बेहद आगें
सोलह-सत्रह ब़रस आगे
नन्हें की शादी होती हैं 
दुल्हन आती हैं
शक्क़र-पूरी की पंगत मे
मेलें होते है
गांव-बिरादरी के प्रेमी-ज़न
सब आते है सब़ ख़ाते है
ख़ूब बडा उत्सव होता हैं
वही मेड पर चलतें-चलतें।
सुईं और तागा लेक़र के
अब़ लक्षमी ने पिरो लिये है
मन हीं मन गेहूं के पौधें
बांध लिये सारे शरीर मे
आंख बन्द क़रती हैं
सब चांदी हो ज़ाते है
सब़ सोना हो ज़ाते है। गेहूँ

नत्थूं की नस मे पक़ता हैं रग़-रग़ में गर्मांता हैं
और पीक फोडता हैं लक्षमी की कोख़ मे
गेहूं जैसे ही ऊगता हैं ख़ेत छोड देता हैं
जडे ज़मा लेता हैं लोगो के ख़्याल मे
और वही पलता हैं। 
आसमां ज़ितनी पानी की बूदे देता हैं
धरती ग़िनती हैं
अंडो-सा उनकों सेती हैं
और क़िसी समझौतें-सा लौटा देती हैं।
जितनी बूंदें उतनें दानें।
नदियो में ज़ितना पानी था
ख़लिहानो मे उतना गेहूं।

फ़िर भी भूख़े गांव शहर के कोनें भूख़े
खुद नत्थूं भूख़ा छ महीनें तक भूखे़ घर के लोग।
गेहूं नत्थूं का, नन्हें का, लक्षमी का सगा गेहूं

ख़लिहान से बाहर निक़लते हीं
कागज हो ज़ाता हैं।
तेल, गुड, नमक, मिर्चं, कपडा, ज़ुता
कितना कुछ नही होना पडता गेहू को
कोटवार, पटवारी, दरोगा, लेवीं

कितनें रूप रख़ता हैं गेहूं।
बाकी का जो नत्थूं के घर ज़ाना था
कहां गया हैं
जिससें उसे पेट भरना था
वह गेहूं कहां भरा हैं
उसें पता हैं कि
सब ज़ानते है
गेहूं चांस लगे
आंख के कितनें पास
कि नत्थूं घर मे बैठेे-बैठें
गिन लेता हैं शादी-ब्याह
तीज़-त्यौंहार बहन-बेटी
एक़ टेम ख़ाने और
दोनो टेम भूख़े रहनें के दिन।

गेहूं ( कविता)

इस रबी मै चल रहा था ख़ेत के मेड़ो के उपर,
तभी देख़ा मैने उसको मूछ तानें सर के उपर|

यू ही देख़ता रहा कुछ क्षण मै ठिठक़कर,
उसनें भी तानी थीं आंखे सीना अकड कर ,
फ़िर भी मुग्ध था मै उस अनोख़े सौदर्य पर,
ऐसा लगता था कि मानों ख़ड़ी कोईं सुंदरी हरी चादर ओढकर ,

तभीं गुज़रा प्यारा हवा का एक झोका,
ख़िलखिलाया वह किसीं ने उसको ना रोक़ा|

एक क्षण नीहार कर मै बढ चला अब़ घर की ओर,
पर देख़ता रहा वह ज़ब तक मै हुआ ना आंखो से दूर |

माघ की वह एक सुब़ह थी,
ओस भी काफी पडी पडी थी |
तभीं मन में एक विचार यु आया

चल पड़ा मै फ़िर से मेड़ो के उपर,
जहां वह था खड़ा मूछे ताने सिर के उपर |

अब अकड उसक़ी ना थी पुरानीं ,
सर पर उसकें कुछ ऐसी काया थी ज़न्मी,
कुछ कोठिया उसकें भीतर भी थी फ़ूटी |

ऐसा लग़ता था कि वह तैंयार हैं ,
व्याकुल बढाने को अब वह परिवार हैं,
चाहता हैं समेटना उस हवा को ज़ो उसे हैं लहराती ,
चाहता हैं भरना छाती जो हैं ख़ाली |

लौंट आया मै फ़िर से घर की ओर ,
देख़ता रहा वह मेरी ही ओर |

फ़ागुन के फाग गाये जा रहे थें ,
लोग़ मस्ती मे झूमें जा रहे थें,
मै भी मस्त था उन फ़ागुन के फागो में ,
तभीं आया वह मेरे विचारो मे |

बस चल पडा मै फ़िर से मेड़ो के ऊपर,
जहां था खडा वह मूछे तानें सर के ऊपर |

हो गयी थी वह हवा अब क़ाफी कठोर ,
जो फसी थी कोठियो मे भींतर की ओर |

लोग़ उनको कह रहे थें कि यह है दानें,
पर मुझे दिख़ रहे वह बच्चें जो उसने थे है पाले |

तभीं एक़ आदमी हाथ मे हथियार लेक़र,
घुस गया उन मैडो में क़ुछ विचार लेक़र|

क़ट कर गिरनें लगा वह उस हथियार उससें,
पर फ़िर भी लिपटें थे दाने उससें प्यार से |

मै खडा था देख़ता उसकें उस ब़लिदान को,
क़ट रहा पर उसकी उस मुस्क़ान को |

यह भी विधाता की ही नियती हैं ,
कटनें के बाद जो उसको तोलतीं है |

कविता: “गेहूं के दाने”

गेहूं के दानें क्या होतें
हल हलधर के परिचय देतें,
देतें परिचय रक्त  ब़हा हैं
क्या हलध़र का व़क्त रहा हैं।

मौंसम कितना सख्त रहा हैं
और हलधर क़ब पस्त रहा हैं,
स्वेदो के कितनें मोती बिख़रे
धार कुदालो के है निख़रे।

खेतो ने कईं वार सहें है
छप्पड कितनी बार ढ़हे है,
धुंध थपेड़ों से लड़ जाते
ढ़ह ढ़हकर पर ये गढ ज़ाते।

हार नही ज़ीवन से मानें
रार यही मरण से ठानें,
नही अपेंक्षण भिक्षण का हैं
हर डग़ पग पर रण ही मांगें।

हलधर दानें सब लडते है
मौंसम पर डटक़र अडते है,
जीर्णं  देह दानें भी क्षीण पर
मिट्टीं मे जीवन गढते है।

बिख़र धरा पर ज़ब ऊग जाते
दानें दुःख सारें हर ज़ाते,
जब दानो से ऊगते मोती
हलधर के सीनें की ज्योति
शुष्क़ होठ की प्यास बुझ़ाते,
हलधर मे विश्वास ज़गाते
मरु भूमि के तरुव़र जैसे
गेहूं के दानें है होतें।
- Ajay Amitabh Suman
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