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मेहनत पर कविता | Mehnat Poem In Hindi

 मेहनत के चित्र

बड़े शहर की खुली सड़क पर
घूम रहा था नटखट बंदर
एक पेड़ के नीचे उसने
देखा खड़ा भिखारी बेघर

मांग रहा था हाथ पसारे
सबसे रोटी को कुछ पैसे
लगा सोचने बंदर इसकी
मदद करूं मैं जल्दी कैसे

शीघ्र आम के एक पेड़ पर
जा पहुंचा बन्दर कुर्ती से
आम तोड़ कर झट ले आया
खट्टे खट्टे मीठे मीठे

उन्हें सौंपकर उस गरीब से
बोला खाओं भूख मिटेगी
रोज करूंगा यों ही मेहनत
तुममें मुझमें खूब पटेगी

नाम सुना मेहनत का ज्यों ही
उस मंगते को शर्म आ गई
भीतर भीतर से उसके भी
बंदर को ही बात भा गई

तब से दोनों मित्र बन गए
मेहनत के दो चित्र बन गये

मेहनत की रोटी

कितनी प्यारी प्यारी रोटी
घर, घर बड़ी दुलारी रोटी

सबको खेल खिलाती रोटी
करना काम सिखाती रोटी

कितने रंग दिखाती रोटी
कितने ढंग बताती रोटी

राजा, निर्धन खाते रोटी
कुछ जो नहीं कमाते रोटी

रोटी हो मेहनत की रोटी
रोटी, सच्चाई की रोटी

हम मिलजुलकर खाएं रोटी
सबके लिए जुटाएं रोटी

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