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गुड़िया पर कविता | Gudiya Hindi Poem

 गुड़िया कितनी थकी हुईं तुम

गुड़िया कितनी थकी हुईं तुम
बार बार लेती जमुहाई
कल कर लेना और पढ़ाई

लगातार लिखते पढ़ते यों
सिर तक अपना बिना उठाए
एक एक करके तुमने तो
लगभग सभी विषय निपटाए
देखो भूख प्यास तक अपनी
पढ़ने के आगे बिसराई

होमवर्क पूरा करने में
लगे ढ़ाई घंटे है पूरे
लिखते लिखते हाथ थके पर
कुछ सवाल रह गये अधूरे
मेरी नन्ही सोनचिरैया
तुम दिखतीं कितनी कुम्हलाई

बस्ता अलमारी में धर दो
उठो, हाथ मुंह धोकर आओ
तनिक ठुमककर नाच दिखा दो
या मीठा सा गाना गाओ
चलो, बाग़ में चलते हैं हम
ठंडी हवा जहाँ सुखदाई

छुटकी

दादीजी का प्यार दुलार
पापा का पल पल दुत्कार
कब तक झेलेगी छुटकी
कैसे खेलेगी छुटकी

सोनपरी कहतीं दादी
बिटिया रानी शहजादी
पापा तो नकचढ़ी कहें
चाहें वह खामोश रहे
देते है बन्दरघुड़की
दादी कहें डली गुड़ की
देती हरदम शाबासी
पापा कहे उल्टबाँसी
दिल पर ले लेगी छुटकी
कैसे खेलेगी छुटकी

दादी कहतीं खूब पढों
चाँद सितारे नभ छू लो
कथा कहानी भी कहती
खुश रखती खुद खुश रहती
पापा कोसों लड़की कह
घर के कामों में खुश रह 

छुटकी नहीं रहेगी चुप
रोना नहीं उसे छुप छुप
धरती बेलेगी छुटकी
नभ से खेलेगी छुटकी

मुनिया तू शैतान बड़ी

मुझे चिढाकर पूछा करते
मुझसे मेरे दादाजी
बोलो, तुमको कौन है प्यारा
मम्मी जी या पापाजी

क्या जवाब दू सोच सोचकर
होती मुझको हैरानी
मम्मी की है रानी बेटी
पापा की है बिटिया रानी

मैं कह देती मम्मी प्यारी
प्यारे प्यारे पापाजी
मम्मी पापा से भी प्यारे
लेकिन मेरे दादाजी

दादाजी के होठों पर तब
आ जाती मुस्कान बड़ी
कान पकड़कर मेरा कहते
मुनिया तू शैतान बड़ी

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