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धूप पर कविता | Dhoop Poem In Hindi

 धूप पर कविता | Dhoop Poem In Hindi

सुनहरी धूप (द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी)


ज्यों ही आता सूरज, आती धूप सुनहरी
आसमान से उतर-उतर कर चुपके चुपके
पेड़ों पर छत पर, धरती के कण कण त्रण पर
घुस आती मेरे कमरे में भी खिड़की से

छूती मुझको, मेरी चीजों को, अम्मा को
पर अचरज यह मैं न कभी उसको छू पाता
भर लेती मेरे आँगन की झोली उसको
लेकिन मैं उसको न जेब तक में भर पाता

छूकर ओस कणों को मोती सा चमकाती
मेरे तन की ठिठुरन कम्पन दूर भगाती
बहुत चाहता हूँ कि पकड़ में आए मेरे
लेकिन वह मेरी मुट्ठी में कभी न आती

जाने लगता सूरज, वह भी चुपके चुपके
चढ़ती हुई छतों की, पेड़ों की सीढी पर
पास पहुँच जाती उसके, फिर जाने रहती
कहाँ रात भर? शायद सो जाती हो थक कर!

एक रात भी रह जाए, गर वह घर मेरे
कर लूं अपने मन की उससे दो बातें
कहूं गर्मियों में मत गुस्सा किया करो तुम
छोड़ा करो न साथ जब कि जाड़े की राते

धूप "कृष्ण शलभ"

बिखरी क्या चटकीली धूप
लगती बड़ी रुपहली धूप

कहो कहाँ पर रहती बाबा
कैसे आती जाती हैं
इतनी बड़ी धूप का कैसा
घर है कहाँ समाती है
बिना कहे ही चल देती है
क्यों इतनी शरमीली धूप?

क्या इसको टहलाने लाते
सूरज बाबा दूर से
देर रात तक ठहर न पाते
दिखते क्यों मजबूर से
जब देखो तब सूखी होती
कभी नहीं क्या गीली धूप

कभी पेड़ से चुपके चुपके
आती है दालान में
और कभी खिड़की से दाखिल
होती लगे मकान में
आग लगाती आती है क्या
यह माचिस की तीली धूप

परी हो गई धूप

हरे हरे पेड़ों के नीचे
हरी हो गई धूप
कुछ खट्टी कुछ मीठी ज्यों
रस भरी हो गई धूप

इधर लपकती उधर मचलती 
लुका छिपी बादल से करती
उजले उजले पंखों वाली
परी हो गई धूप

हरे भरे मैदानों में हो
या खेतों खलिहानों में हो
मखमल जैसी बिछी सुनहरी
दरी हो गई धूप

तरह तरह के रंग दिखाती
धानों में चाँदी बन जाती
गेंहूँ में सोने के जैसी
खरी हो गई धूप

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