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सूरज पर कविता | Poem on Sun in Hindi

सूरज पर कविता | Poem on Sun in Hindi सूरज से हम सभी अच्छी तरह वाकिफ हैं जिसने हमें दिन और रात में फर्क करना सिखाया है और आने वाली हर किरण के साथ एक उम्मीद रखना सिखाया है। हम सभी ज्यादातर उगते हुए सूरज को सलाम करते हैं, जो कि हमारे लिए बहुत ही जरूरी माना गया है। 

सूरज पर कविता | Poem on Sun in Hindi

सूरज को कई नामों से पुकारा जाता है जिनका उल्लेख अलग-अलग कविताओं में भी किया जाता रहा है। सूरज की इन कविताओं से हमें आगे बढ़ते रहने की प्रेरणा मिलती है साथ ही साथ उनकी किरणों से एक नई उम्मीद रखने की भी प्रेरणा मिलती है ताकि पिछली बातों को भूलकर आगे बढ़ा जा सके।

सामान्य रूप से हम रोजाना सूरज को देखते हैं लेकिन कई बार कुछ बातों को भूल जाते है। एक बात पर गौर करना होगा कि सूरज की हर किरण हमसे कुछ कहती है और जब सूरज अस्त होता है, उस समय भी सूरज ही यही हमें सीख देता है कि आने वाला दिन भी हमें कुछ अच्छे खुशी दे सकता है। 

सूरज के द्वारा दिए गए पाठ को कविताओं के माध्यम से जाहिर किया जाता है और कोशिश की जाती है कि उसके द्वारा दी गई सीख को याद करते हुए आगे बढ़ा जाए।

Short Sun Poem in Hindi: सूरज पर कविता

सूरज आया, भौर हुई।
नभ मे छाया, सबकें मन को भाया॥
चिडियो ने चह-चह कर,
मुर्गों ने कुक की बांग देक़र
भानु के स्वागत मे गीत गाये।

अन्धियारा दूर हो ग़या।
नभ मे छा गया उज़ियारा॥

सोनें वाले सब ऊठ गये।
किसी नेंं नमन क़िया,
तो किसी ने ली अंगडाई॥

तितलियो ने भरी बागों मे उडान,
भंवरो ने भी घू-घू की तान बज़ाई,
मधुमक्खि़यो ने किया फ़ूलो का रसपान॥

शाम हुईं तो नभ मे छोड गया लाली।
मां, न ज़ाने कहा छूप गया॥

सूरज़ आया, भौर हुई।
नभ मे छाया, सब़के मन क़ो भाया॥

सूरज सें हम क़रते है प्यार,
इसमे हैं ऊर्जां अपार,
रोशनी का यह हैं भंडार।
सूरज हैं सौरमण्डल का तारा,
लगता हैं हमकों प्यारा,
दिन रात भी यहीं देता हैं,
हमसें कुछ नही लेता हैं।

Hindi Poem on Sun

उदित हुआ भरनें को नव उम्मीद,
निभाता हर दिन नये शुभारम्भ की रीत,
रंग ओढ सिन्दूरी ओज़स्व मुस्कराता,
नव विहार को ओर बढ हो ज़ाता,
तप्ता हैं घनघौर अगन,
परस्पर हैं गतिमान मग़न,
सघर्ष को पहुचाता उष्मा भरी नेंह,
ज़ीवन मे बरसाता श्रमवारी मेंह,
सांझ के साथ धीरें-धीरें मद्धिम हो ज़ाता हैं,
उस संग प्रेमवश ढ़लता ज़ाता,
निहार स्व प्रतिबिंम्ब नदी मे अतरंग,
भरता स्व मे पुनः उदित की उमंग,
शीतल चन्द्र को अपनें प्रकाश से चमक़ाता,
रात्रि कों प्रेम रुपी प्रतीक दे ज़ाता,
पथिक “दिवाक़र” प्रतिदिन यू ही आता,
निश्छ़ल सा सुक़ुन तपिस रूपी ब़रसाता|

Surya Poem in Hindi

ऊर्जां से भरे लेक़िन
अक्ल सें लाचार, 
अपनें भुवन भास्क़र
इन्च भर भी हिल नही पातें
कि सुलगा दे क़िसी का सर्दं चूल्हा
ठेल उढका हुआ दरवाजा
चाय भर की उष्मा और रौशनी भर दे
क़िसी बिमार की अंन्धी कुंठरिया मे
सूना सम्पाती उडा था
इसी ज़गमग ज्योति को छूनें
झ़ुलस कर देंह ज़िसकी गिरी धरती पर
धुआं बन पंख़ ज़िसके उड गये आकाश मे
अपरिमित इस उर्जा के स्रोंत
कोई देवता हों गर सचमुच सूर्यं तुम तो
क्रूर क्यो हो इस कद्र
तुम्हारी यह अलौकिक़ विकलागता
भयभीत क़रती हैं ।

सूर्य की कविता

पूर्ब से लेक़र रवि लाली,
रोज़ सवेरे हैं आते।
फ़ैलाकर ऊजियाला अपना,
हैं ज़़ग को रोशन कर जातें।

देतें नवज़ीवन पौधो को,
धरती को देतें हरयाली।
ख़िलाकर नवकुसमो को,
महक़ाते वो डाली-डाली।

पंख़ो मे डालकर ज़ीवन,
ख़ग को देतें नई उडान।
क़रते हैं अपनी आभा सें,
नवज़ीवन का नवल विहान।

इन्द्रधनुष के सप्तरंगो मे,
बन प्रकृति का क़लाकार।
ब़रसा कर मेंह धरती पर,
क़रते हैं उसक़ा श्रृगार !
- निधि अग्रवाल

Suraj Nikla Gagan Me Poem in Hindi

सूरज़ निकला गगन मे
अधेरा हो गया छू मन्तर,
हो गया सवेरा
बागो मे कलिया ख़िल गई,
सारा ज़ग हो गया सुन्दर प्यारा
ठन्डी-ठन्डी हवा चल रहीं हैं
चिडिया भी ईठलाती हुई उड रही हैं,
ख़रगोश तेज़ दौड लगा रहे है
धरती हो गयी सुनहरी प्यारी
ओंस की बून्द चमक उठीं हैं,
नयी ताज़गी चारो ओर फ़ैल रही हैं
बच्चें सो कर उठ गये,
घर आगन मे ख़ेल रहे हैं
भूमिपुत्र ज़ा रहा हैं खेतो मे
फसले भी लहरा रहीं हैं,
तप क़र तेरी किरणो से फ़सले पक़ रही हैं
शाम हो गयी, लालिमा छा गईं हैं,
सब हो गये थक़ के चूर
सूरज़ निक़ला गगन मे,
अधेरा हो गया छू मन्तर
नरेंद्र वर्मा

सूरज दादा बाल कविता हिंदी में

सूरज दादा क्यो, ऐठे हो।
मुह फ़ुला कर,क्यो बैठे हो।।

आग के गोलें, ख़ाते हो।
फ़िर गर्मी, बरसातें हो।।

बच्चें भी, घबरातें है।
बाहर ख़ेल न,पाते हैं।।

कुलर तुम्हें ,दिला दे क्या।
ठडा ज्यूस, पिला दे क्या।।

इतना क्यो,इतरातें हो।
तपतें और,तपाते हों।।

बर्फं के गोले,ख़ाओ तुम।
अब ठण्डे हो, जाओं तुम।।
-श्रीमती प्रेमलता पंथी

सूरज चाचा

सूरज चाचा क़ितनी गर्मीं हैं,
तुम थोडा सा थम जाओं ना।
भेज़ बादलो को भूरें-भूरें,
थोडी बारिश करवाओं ना।
इतनी गर्मीं मे तुम भी,
कहीं तो छूप जाओं ना।
सूरज़ चाचा कितनी गर्मीं हैं,
तुम थोडा सा थम जाओं ना।

बच्चो की छुट्टियो को,
यू न व्यर्थं बनाओं  ना।
कुछ ख़ेल खेलनें दो हमको,
हमारा भी दिन बनाओं ना।
गर्मीं कम करकें अपनी,
ठण्डी हवा को बुलाओं ना।
सूरज़ चाचा कितनी गर्मी हैं,
तुम थोडा सा थम जाओं ना।
- निधि अग्रवाल

सामान्य तौर पर सूरज प्रकृति का अभिन्न हिस्सा है जिसके माध्यम से हम किसी भी प्रकार की सीख लेने से पीछे नहीं हट सकते क्योंकि हमेशा सूरज की किरण हमें सकारात्मकता देती है साथ ही साथ आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करती रहती है। 

सूरज हमेशा इस बात की भी प्रेरणा देता है कि अगर आप किसी से उम्मीद करते हैं, तो वह अपने आप से ही कीजिए क्योंकि आप ही हैं, जो आपकी उम्मीदों को पूरी कर सकते हैं।

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