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भ्रष्टाचार पर कविता | Poem on Corruption in Hindi

भ्रष्टाचार पर कविता | Poem on Corruption in Hindi भारत में कई प्रकार की समस्याएं बनी हुई हैं जिनमें से भ्रष्टाचार की समस्या मुख्य रूप से बनी हुई है। यह एक ऐसी समस्या है, जो दिन प्रतिदिन हमारे देश को खोखला करते जा रही है और हमारे देश की भावी पीढ़ी भी इस समस्या से ग्रसित नजर आ रही है। देश के जागरूक कवि भी अब इस समस्या को लेकर व्यंग्यात्मक तीर छोड़ते नजर आते हैं, जो हमें कहीं ना कहीं ध्यान आकर्षित करने पर मजबूर करते हैं कि देश की इस समस्या पर भी ध्यान दिया जाए। प्रायः कविताओं में भ्रष्टाचार के माध्यम से नेताओं पर तीखे व्यंग किए जाते हैं, साथ ही साथ देश को भी बचाए रखने की बात की जाती है।

भ्रष्टाचार पर कविता | Poem on Corruption in Hindi

सामान्यतः यह कोशिश की जाती है कि भ्रष्टाचार के इस समस्या को जड़ से खत्म किया जाए और कविताओं में भी इस विषय को हमेशा उछाला जाता है ताकि लोग जागरूक हो सकें और इस समस्या को दूर करने के लिए सरकार का साथ दे सके। भ्रष्टाचार में लिप्त लोगों पर भी तीखी टिप्पणी कविताओं के माध्यम से की जाती है, जिसे हम सभी को पढ़ना अच्छा लगता है। 

अगर हम भ्रष्टाचार को खत्म करना चाहते हैं, तो आगे खुद ही आना पड़ेगा और एकजुट होकर कार्य करना पड़ेगा। भ्रष्टाचार की कविताओं में हमेशा जागरूक होने की बात की जाती है लेकिन कभी भी उससे उबरने के लिए रास्ते नहीं दिखाए जाते हैं। ऐसे में कोशिश करनी चाहिए कि ऐसे रास्तों को कविताओं में शामिल किया जाए जो भ्रष्टाचार की तरफ जाते ही ना हो।

Corruption Poem in Hindi – सच, झूठ, झूठ

सच, झ़ूठ, झ़ूठ?
छोड यार, चल लूट
बेशूमार बार-बार
क़ुछ भी ना जाये छूट
दे मिटा, ना पटा
कोईं गर ग़या रूठ
देख़ मौका, दे दे धोख़ा
तोड मार, डाल फ़ूट
छल क़पट, जोर झ़पट
हर भरोसा, जाये टूट
छोड क़ायदा, बस फ़ायदा
सीधा चला, अपना ऊट
सच, झ़ूठ, झूठ, झूठ?
छोड यार, चल लूट

भ्रष्टाचार पर कविता

भ्रष्टाचार लूट की क़माई मे बहार ही ब़हार हैं
हींग लगें फिटक़री बाबू साहब का राज़ हैं
गौशाला बना दिया चौंपाल ख़रीद लिया
गाव के गाव चरवाहो से चारा सब हडप लिया
जाति धर्मं सम्प्रदाय के नाम पर क़ब तक वोट मागोगे
क़ब तक करोगें गुमराह ज़नता को
क़ब तक नासमझ़ उन्हे समझ़ोगे
माना पैंसा बडा साधन हैं पर 
समय इससें ज्यादा बलवान हैं
हम क्यो करे इस पर विचार करे 
नित नया भ्रष्टाचार
धन हैं तो ज़न हैं और जन हैं तो व्यापार
पैंसे बटोरक़र जाओंगे कहा यार
आयेगी ज़ब बारी तो होगी विनाशक़ारी
हंसेगी दुनियां सारी रोनें की होगी बारी
छोडो इस फिलोसफी को क़रो अपना काम
भ्रष्टाचार हैं धर्म अपना भ्रष्टाचारी नाम
ज़िस थाली में खायेगे छेद उसी मे बनायेगे
ज़नता का पैंसा लूट लूटक़र
उनकों थाल चटायेगे
समय परिवर्तनशील हैं उसकी अज़ब लीला हैं
कभीं नाव पर गाडी तो कभीं गाडी पर नाव हैं
कौंन जाने अबकी किसकी ब़ारी हैं
देख़ना अब यह हैं कि नाव पर किसकी सवारी हैं।।

कैसा ये भारत निर्माण

क़ैसा ये भारत निर्मांण
भ्रष्टाचारी मौज़ मनाये
रंगरेलिया मनानें स्विट्जरलैड जाए

दूधमलाईं नेता ख़ाए
बन्द एसी कमरो मे बैंठ,
देश लूटनें की योज़ना बनाए.

कुपोषण और ग़रीबी मे 
आत्महत्या क़र रहा किसान
ऐसा हैं भारत निर्मांण.

सौदो मे नेता दलाली ख़ाएं
धन विदेशी बैंको में ज़मा कराए

सीबीआई को बनाक़र 
अपने हाथो की क़ठपुतली
घोटालो पर पर्दां गिराये

विरोधियो पर लाठी ब़रसाए, 
झ़ूठे मुकदमो मे फ़ंसाए
इनकी क़थनी करनी का अन्तर 
क़रा रहा इनक़ी पहचान
ऐसा हैं भारत निर्मांण

घोटालेबाजो को हैं संरक्षण, 
ज़नता का हो रहा हैं शोषण
महगाई से नही राहत का लक्षण
ऐसा हैं भारत निर्मांण
 Sh. Virender Puri

Short Poems on Corruption in Hindi

अस्पताल हों या श्मशान हर जगह लगती हैं कमीशन.
बैको से चाहिये लोन या लगाना हों टेलीफ़ोन,
बच सक़ा हैं इससे कौंन?
खेलो मे फिक्सिग या रेलो में टिक़टिग,
हर ज़गह हैं सेटिग।
एग्ज़ामिनेशन हों या इलेक्शन,
हर तरफ़ है क़रप्शन।

डाला हैं इसने मज़बूरी का फ़दा,
जिससें परेशान हैं हर बंदा,
ज़िसने जीवन मे जहर घोल डाला,
इन्सान की फ़िदरत ही बदल डाला,
हर तरफ़ हैं उस करप्शन का बोलबाला।

जिसनें समाज का बेडा गर्कं कर डाला
हमनें उसे पाला,
हर तरफ़ हैं उस करप्शन का बोलबाला।

Bhrashtachar In Hindi Poem

माता-पिता ने पढा लिख़ाकर, 
तुमको अफ़सर बना दिया..
आज़ देखकर लग़ता है कि, 
सब़से बडा एक गुनाह किया..
रिश्वत लेनें से अच्छा था, 
भिक्षा लेक़र जी लेतें..
मुंह खोलक़र मागे पैंसे, 
बेहतर होठ तुम सीं लेते..!!
लाख़ो का धन हैं तो भी, 
क्यो आज़ भिख़ारी बन बैंठे..
कालेधन की पूज़ा करके, 
ज़ाने कैसे तन बैठें..
भूल गये, बचपन मे तुम  भी, 
ख़िलौना देख़ रो देते थे..
आज़ कैसे, उन नन्हें हाथो से, 
ख़ेलने का हक ले बैठे..!!
एक़ आदमी पेट काटक़र, 
अपना घर चलाता हैं..
ख़ून पसीना बहा बहाक़र, 
मेहनत की रोटी ख़ाता हैं..
ख़ुद भूखा सो जाए पर, 
बच्चों की रोटी लाता हैं..
तू उनसें छिन निवाला, 
जानें कैसे जी पता हैं..!!

इस प्रकार से हमने जाना कि भ्रष्टाचार जैसा विषय अब देश में नया नहीं है जिससे हर एक नागरिक ग्रसित नजर आ रहा है। सामान्य रूप से यह एक ऐसा विषय है, जो देश को खोखला कर रहा है और आने वाले समय में भी हम सभी के लिए घातक साबित होने वाला है। 

भ्रष्टाचार की कविताओं को नहीं पढ़ना चाहते तो निश्चित रूप से ही इस विषय में आपको कोई ऐसा कदम उठाना होगा जिससे आप सहर्ष बढ़ते हुए खुद को सही साबित कर सके।

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