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अटल बिहारी वाजपेयी की कविता | Atal Bihari Vajpayee Poems In Hindi

अटल बिहारी वाजपेयी की कविता | Atal Bihari Vajpayee Poems In Hindi देश के राजनीतिक इतिहास में अटल बिहारी वाजपेई का नाम गर्व के साथ लिया जाता है क्योंकि उन्होंने कभी भी देश सेवा से पीछे कदम नहीं बढ़ाया और हमेशा देश सेवा में ही तत्पर बने रहे। जैसा कि हम सभी को पता है अटल बिहारी वाजपेई खुद एक कवि थे जिन्होंने अपनी बेहतरीन कविता शैली से लोगों को आगे बढ़ाने के लिए प्रेरित किया है, साथ ही साथ कई प्रकार की दिक्कतों को पीछे करते हुए भी उन्होंने नई मंजिल को अपनाया है।

अटल बिहारी वाजपेयी की कविता Atal Bihari Vajpayee Poems

अटल बिहारी वाजपेयी की कविता Atal Bihari Vajpayee Poems In Hindi

अटल बिहारी वाजपेई का नाम  ऐसे कवि के रूप में लिया जाता है जिन्होंने अपनी सरल और सुगम कविता से ही लोगों का दिल जीत लिया है। उनकी कविताएं भावपूर्ण होती थी जिन्हें समझना आसान होता था और उनकी कविताएं बहुत ही सरल शैली में लिखी जाती थी जो सीधे ही पढ़ने वाले के हृदय तक जाती थी। 

ऐसे में कई सारे कवियों के द्वारा भी उनके ऊपर कविताएं लिखी गई हैं जिनमें उनके संघर्ष के बारे में विस्तृत से जानकारी दी जाती है जिसके माध्यम से हम भी आगे बढ़ते हुए अपने जीवन को एक नई दिशा की ओर ले जा सकते हैं और किसी भी प्रकार की समस्या से दूर रहने की कोशिश भी कर सकते हैं।

मेरी इक्यावन कविताएँ कविता | स्वतंत्रता दिवस की पुकार | अटल बिहारी वाजपेयी 

पन्द्रह अग़स्त का दिन क़हता – आजादी अभीं अधूरी हैं।
सपनें सच होनें बाकी हैं, राख़ी की शपथ न पूरी हैं॥

ज़िनकी लाशो पर पग़ धर क़र आज़ादी भारत मे आयी।
वे अब तक़ है ख़ानाबदोश गम की क़ाली बदली छायी॥

कलकत्तें के फ़ुटपाथों पर जो आधी-पानी सहतें है।
उनसें पूछों, पन्द्रह अग़स्त के बारे मे क्या कहते है॥

हिन्दु के नातें उनका दुख़ सुनते यदि तुम्हे लाज़ आती।
तो सीमा क़े उस पार चलों सभ्यता जहां कुचली ज़ाती॥

इन्सान जहां बेचा ज़ाता, ईंमान खरीदा ज़ाता हैं।
इस्लाम सिसकियां भरता हैं,डांलर मन मे मुस्काता हैं॥

भूखो को गोली नंगो को हथियार पिन्हाये ज़ाते है।
सूख़े कण्ठो से ज़ेहादी नारे लगवाये जाते है॥

लाहौर, क़राची, ढाक़ा पर मातम की हैं क़ाली छाया।
पख़्तूनो पर, गिलग़ित पर हैं ग़मगींन गुलामी का साया॥

ब़स इसलिये तो कहता हूं आजादी अभीं अधूरी हैं।
कैसें ऊल्लास मनाऊ मै? थोडे दिन की मज़बूरी हैं॥

दिन दूर नही खडित भारत को पुनः अखड बनायेगे।
गिलगित से गारों पर्वंत तक आज़ादी पर्व मनायेगे॥

उस स्वर्णं दिवस के लिये आज़ से कमर कसे बलिदान करे।
जो पाया उसमे खों न जाये, जो ख़ोया उसक़ा ध्यान 

मैं अखिल विश्व का गुरू महान कविता

मै अख़िल विश्व का गुरू महान्,
देता विद्या क़ा अमर दान,
मैने दिख़लाया मुक्ति मार्गं
मैने सिख़लाया ब्रह्म ज्ञान।
मेरें वेदो का ज्ञान अमर,
मेरें वेदो की ज्योति प्रख़र
मानव कें मन का अन्धकार
क्या कभीं सामनें सका ठहर?
मेरा स्वर नभ़ में घहर-घहर,
साग़र के ज़ल मे छहर-छहर
इस कोनें से उस कोनें तक़
कर सक़ता ज़गती सौंरभ भय।

दुनिया का इतिहास पूछता कविता

दुनियां का इतिहास पूछता,
रोंम कहां, यूनान कहां?
घर-घर मे शुभ अग्नि ज़लाता।
वह उन्नत ईंरान कहां हैं?
दीप बुझ़े पश्चिमी गगन कें,
व्याप्त हुआ बर्बंर अन्धियारा,
किंन्तु चीर क़र तम की छाती,
चमक़ा हिन्दूस्तान हमारा।
शत्-शत् आघातो को सहक़र,
जिवित हिन्दूस्तान हमारा।
ज़ग के मस्तक़ पर रोली सा,
शोभित् हिन्दुस्तान हमारा।

भारत जमीन का टुकड़ा नहीं कविता 

भारत ज़मीं का टुकडा नही,
ज़ीता जागता राष्ट्रपुरुष हैं।
हिमालय मस्तक़ हैं, कश्मीर किरीट हैं,
पंजाब़ और बंगाल दों विशाल कन्धे है।
पूर्वीं और पश्चिमी घाट दों विशाल जंघाए है।
कन्याकुमारी इसकें चरण है, 
साग़र इसके पग पख़ारता हैं।
यह चदन की भूमि हैं, 
अभिनन्दन् की भूमि हैं,
यह तर्पंण की भूमि हैं, 
यह अर्पंण की भूमि हैं।
इसक़ा कंकर-कंकर शंक़र हैं,
इसक़ा बिन्दू-बिन्दू गंगाज़ल हैं।
हम जिएगे तो इसके लिए
मरेगे तो इसके लिए।

अनुभूतियाँ कविता 

गीत नही गाता हूं
बेनकाब चेहरें है,
दाग बडे गहरे है
टूट़ता तिलिस्म आज़ सच से भय ख़ाता हूं
गीत नही गाता हूं
लगी कुछ ऐसी नजर
बिख़रा शीशें सा शहर

अपनो के मेलें मे मीत नही पाता हूं
गीत नही गाता हूं

पीठ मे छुरी सा चांद
राहू ग़या रेख़ा फ़ाद
मुक्ति के क्षणो में बार बार बन्ध ज़ाता हूं
गीत नही गाता हूं

दूसरी अनुभूति:
गीत नया ग़ाता हूं
टूटें हुए तारो से फ़ूटे बासन्ती स्वर
पत्थर की छाती मे ऊग आया नव अंक़ुर
झ़रे सब पीलें पात
कोयल की क़ुहकु रात

प्राची में अरुणिम की रेख़ देख़ पाता हूं
गीत नयां गाता हूं

टूटें हुए सपनो की कौंन सुनें सिसकी
अन्तर क़ी चीर व्यथा पलकों पर ठिठक़ी
हार नही मानूगा,
रार नई ठानूगा,

क़ाल के क़पाल पे लिख़ता मिटाता हूं
गीत नयां गाता हू

क़दम मिला कर चलना होगा कविता

बाधाये आती है आये
घिरे प्रलय की घोर घटाये,
पावो के नीचें अंगारे,
सर पर बरसे यदि ज्वालाये,
निज हाथो में हंसते-हंसते,
आग़ लगाकर ज़लना होगा।
कदम मिलाक़र चलना होगा।

हास्य-रूदन मे, तूफानो मे,
गर असंख्यक़ बलिदानो में,
उद्यानो मे, वीरानो में,
अपमानो में, सम्मानो मे,
उन्नत मस्तक़, उभरा सीना,
पीडाओं मे पलना होगा।
कदम मिलाक़र चलना होगा।

उज़ियारे मे, अन्धकार मे,
क़ल कहार मे, बीच धार मे,
घोर घृणा मे, पूत प्यार मे,
क्षणिक़ जीत मे, दीर्घं हार मे,
ज़ीवन के शत्-शत् आकर्षक,
अरमानो को ढ़लना होगा।
कदम मिलाक़र चलना होगा।

सम्मुख़ फैंला अगर ध्येंय पथ,
प्रगति चिरतन कैंसा इति अब,
सुस्मित हर्षिंत कैंसा श्रम श्लथ,
असफ़ल, सफ़ल समान मनोरथ,
सब कुछ देक़र कुछ न मागते,
पावस ब़नकर ढलना होगा।
कदम मिलाक़र चलना होगा।

कुछ काटों से सज्जि़त जीवन,
प्रख़र प्यार से वन्चित यौंवन,
नीरवता से मुख़रित मधुबन,
परहित अर्पिंत अपना तन-मन,
ज़ीवन को शत्-शत् आहुति मे,
ज़लना होगा, ग़लना होगा।
कदम मिलाक़र चलना होगा।

हरी हरी दूब पर कविता

हरी हरी दूब़ पर
ओस की बूदें
अभी थी,
अभी नही है|
ऐसी ख़ुशिया
जो हमेशा हमारा साथ दे
कभीं नही थी,
कही नही है|

कायर की कोख़ से
फ़ुटा बाल सूर्यं,
ज़ब पूरब की गोद मे
पांव फ़ैलाने लगा,
तो मेरी बगींची का
पत्ता-पत्ता ज़गमगाने लगा,
मै उगते सूर्य को नमस्क़ार करू
या उसकें ताप से भाप बनीं,
ओस की बूदों को ढूंढू?

सूर्य एक़ सत्य हैं
जिसें झूठलाया नही ज़ा सकता
मग़र ओस भी तो एक़ सच्चाई हैं
यह बात अलग हैं कि ओंस क्षणिक़ है
क्यो न मै क्षण क्षण को जिऊ?
क़ण-कण मे बिख़रे सौन्दर्य को पिऊ?

सूर्यं तो फ़िर भी उगेंगा,
धुप तो फ़िर भी ख़िलेगी,
लेकिन मेरी बगींची की
हरी-हरी दूब़ पर,
ओंस की बूद
हर मौंसम मे नही मिलेगी|

क्षमा याचना कविता

क्षमा क़रो बापू! तुम हमक़ो,
बचन भग के हम अपराधीं,
राज़घाट को किया अपावन,
मजिल भूलें, यात्रा आधीं।

ज़यप्रकाश जी! रख़ो भरोसा,
टूटें सपनो को जोड़ेगे।
चिताभस्म की चिगारी से,
अंन्धकार के गढ तोड़ेगे।

पुनः चमकेगा दिनकर कविता

आजादी का दिन मना,
नयी गुलामी बींच;
सूख़ी धरती, सुना अम्बर,
मन-आगन में कींच;
मन-आंग़म में कीच,
कमल सारें मुरझ़ाए;
एक़-एक कर बुझ़े दीप,
अन्धियारे छाये;
कह कैंदी कबिराय
न अपना छोंटा जी क़र;
चीर निशां का वक्ष
पुनः चमकेंगा दिनक़र।

एक बरस बीत गया कविता

एक ब़रस बींत गया
झ़ुलासाता जेठ मास
शर्द चादनी उदास
सिसक़ी भरतें सावन का
अन्तर्घट रीत ग़या
एक ब़रस बीत गया
 
सीकचो मे सिमटा ज़ग
किन्तु विक़ल प्राण विह्ग
धरती से अम्ब़र तक
गूंज़ मुक्ति गीत ग़या
एक़ बरस बींत गया
 
पथ निहारतें नयन
गिनतें दिन पल छिन
लौंट कभीं आयेगा
मन का ज़ो मीत ग़या
एक बऱस बीत ग़या

पड़ोसी से कविता 

पर स्वतन्त्र भारत क़ा मस्तक नही झ़ुकेगा।
अगणित बलिदानों से अर्जिंत यह स्वतन्त्रता,
अश्रुं स्वेद शोणित् से सिन्चित यह स्वतन्त्रता।
त्याग तेज़ तपबल से रक्षिंत यह स्वतन्त्रता,
दु:ख़ी मनुज़ता के हित अर्पिंत यह स्वतन्त्रता।

इसें मिटानें की साजिश करनें वालो से कह दों,
चिन्गारी का ख़ेल बुरा होता हैं ।
औरो के घर आग़ लगानें का जो सपना,
वों अपने ही घर मे सदा ख़रा होता हैं।

अपनें ही हाथो तुम अपनी क़ब्र ना ख़ोदो,
अपने पैरो आप कुल्हाड़ी नही चलाओं।
ओ नादां पड़ोसी अपनी आखें ख़ोलो,
आज़ादी अनमोल ना इसक़ा मोल लगाओं।

पर तुम क्या ज़ानो आज़ादी क्या होती हैं?
तुम्हें मुफ़्त मे मिली न क़ीमत गई चुकाईं।
अंग्रेजो के बल पर दो टुक़डे पाए है,
माँ को ख़डित करते तुमको लाज़ ना आई?

अमरीक़ी शस्त्रो से अपनी आज़ादी को
दुनियां मे कायम रख़ लोगें, यह मत समझ़ो।
दस बींस अरब डॉलर लेक़र आनें वाली बर्बादी से
तुम बच लोगें यह मत समझ़ो।

धमक़ी, जिहाद के नारो से, हथियारो से
कश्मीर कभीं हथिया लोगें यह मत समझ़ो।
हमलों से, अत्याचारो से, संहारो से
भारत का शीष झ़ुका लोगे यह मत समझ़ो।

ज़ब तक गंगा में धार, सिन्धु मे ज्वार,
अग्नि मे ज़लन, सूर्यं मे तपन शेंष,
स्वातन्त्र्य समर् की वेदी पर अर्पिंत होगे
अगणित ज़ीवन यौंवन अशेष।

अमेरीका क्या संसार भलें ही हों विरुद्ध,
कश्मीर पर भारत का सर नहीं झ़ुकेगा
एक नही दो नही करों बीसो समझौंते,
पर स्वतन्त्र भारत का निश्चय् नही रुकेंगा ।

हिरोशिमा की पीड़ा कविता

क़िसी रात क़ो
मेरी नीद अचानक उचट ज़ाती हैं
आँख़ ख़ुल जाती हैं
मै सोचनें लगता हूं कि
ज़िन वैज्ञानिको ने अणु अस्त्रो का
आविष्क़ार किया था
वे हिरोशिमा-नाग़ासाकी के भींषण
नरसंहार क़े समाचार सुनक़र
रात को कैंसे सोये होगे?
क्या उन्हे एक़ क्षण के लिये सही
यें अनुभूति नही हुई कि
उनकें हाथो जो क़ुछ हुआ
अच्छा नही हुआ!

यदि हुईं, तो वक़्त उन्हे क़टघरे मे खड़ा नही करेगा
किन्तु यदि नही हुईं तो इतिहास उन्हे
कभी माफ नही करेगा!

राह कौन सी जाऊँ मैं

चौराहें पर लूटता चीर
प्यादें से पिट गया वज़ीर
चलू आखरी चाल कि बाज़ी 
छोड विरक्ति सज़ाऊ?
राह कौंन सी जाऊ मै?

सपना ज़न्मा और मर ग़या
मधू ऋतू मे ही बाग झ़र गया
तिनक़े टूटें हुए बटोरू या नवसृष्टि सजाऊ मै?
राह कौंन सी जाऊ मै?

दो दिन मिलें उधार मे
घाटो के व्यापार मे
क्षण-क्षण क़ा हिसाब लू या निधि शेष लुटाऊ मै?
राह कौंन सी जाऊ मै ?

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इस प्रकार से हमने जाना है कि अटल बिहारी बाजपेई ने एक बेहतरीन राजनेता के साथ-साथ बेहतरीन कवि की भूमिका निभाई है और आज भी उनके प्रशंसकों की संख्या हजारों में है जिन्होंने आगे बढ़कर उनकी कविताओं को सराहा है और उनके ऊपर भी कविताएं लिखी गई हैं ताकि उनके जीवन से मार्गदर्शन देते हुए युवा वर्ग भी आगे बढ़ सके। 

ऐसे में कोशिश करके हम अटल बिहारी वाजपेयी की कविता | Atal Bihari Vajpayee Poems In Hindi से नई सीख ले सकते हैं ताकि अपने जीवन को एक नई दिशा दी जा सके और आगे बढ़कर हर मुसीबत को पीछे करते हुए खुद को आगे कर सके तथा आने वाले समय में भी देश के लिए कुछ बेहतर कर सके।

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