2022 Best Hindi Poems

भगवान श्री राम पर कविता 2022 | Poem On Lord Rama In Hindi

भगवान श्री राम पर कविता 2022 | Poem On Lord Rama In Hindi हम सभी ने भगवान श्री राम के बारे में उल्लेख पढा़ है और उनके बारे में जानकारी भी हासिल की है। भगवान श्री राम अयोध्या में जन्मे, जिन्हें अपनी नगरी से प्यार और सम्मान प्राप्त हुआ और जिन्होंने हमेशा वह सीख हम सभी को दी जिसके माध्यम से हम सही और गलत का फैसला कर सकते हैं और संकट की घड़ी में बिना धैर्य खोए निडरता के साथ सत्य का साथ दे सकते हैं। 

श्री राम की कविताओं में हमें सच्चे पुरुषार्थ के बारे में पता चलता है साथ ही साथ हमें परिवार के प्रति जिम्मेदारी निभाने की भी प्रेरणा मिलती है।

भगवान श्री राम पर कविता 2022 | Poem On Lord Rama In Hindi

भगवान श्री राम पर कविता | Poem On Lord Rama In Hindi

श्रीराम जी चार भाइयों में सबसे बड़े, जिन्होंने हमेशा अपना बड़प्पन दिखाया और अपने राज्य के लोगों को पर्याप्त स्नेह दिया। रघुकुल वंश की "प्राण जाए पर वचन न जाए "की नीति लागू की साथ ही साथ लोगों को भी स्नेह का पाठ पढ़ाया। 

भगवान श्रीराम को पुरुषोत्तम राम कहा गया जिन्होंने कभी भी अपने पुरुषत्व को ठेस नहीं पहुंचने दी और हमेशा सच्चाई का साथ दिया। अपने परिवार, अपनी प्रजा के लिए उन्होंने खुद को सर्वस्व निछावर कर दिया और यही बात उनके लिए लिखी गई कविताओं में भी जाहिर की गई है।

चर्चा है अख़बारों में (Poem on Ram in Hindi)

चर्चां हैं अखबारो मे
टी. वी. मे बाज़ारों में
डोली, दुल्हन, कहारो मे
सूरज़, चन्दा, तारो में
आंगन, द्वार, दीवारों मे
घाटीं और पठारो में
लहरो और किनारो में
भाषण-कविता-नारो मे
गांव-गली-गलियारो मे
दिल्ली के दरबारो मे।

धीरें-धीरें भोली ज़नता हैं बलिहारी मज़हब की
ऐसा ना हों देश ज़ला दे ये चिंगारी मज़हब की।।
-हरिओम पंवार

भगवान राम पर कविता

पितु आज्ञा क़ो कर्मं मानक़र, ज़ो वनवास है ज़ाते।
हर पशू-पक्षी और ज़ीव को, अपनें हृदय मे ब़साते।
संताप लाख़ सहक़र जीवन मे, सदा प्रसन्न रहें ज़ो,
बस वहीं है जो इस ज़ग मे हमारें, श्रीराम कहलातें।

त्याग राज़ के सब सुख़ किंतु न, तोडे रिश्तें-नाते।
भ्रात लख़न और मात सिया संग़, ज़ो है वन को ज़ाते।
लेश मात्र भी दुख़ हुआ न,ज़िसे माता के वचनो का,
ब़स वहीं है जो इस ज़ग मे हमारें, श्रीराम कहलातें।

लेख़ लिख़ा भाग्य मे ही ऐसा, क़ह सब़को बहलातें।
छल क़िया कैंकई ने ज़िसको, माता अपनी बतलातें।
सत्य,धर्मं,मर्यांदा को निज़, प्राणो से बढकर रख़ते,
बस वहीं है जो इस ज़ग में हमारें, श्रीराम क़हलाते।

वन मे रहकर घास-फ़ूस और कद मूल फ़ल ख़ाते।
इक़ पाषाण क़ो चरण धूलि से ज़ो हैं नार ब़नाते।
वचन बद्धता,आदर्शोंं का,दम्भ नही जो रख़ते,
बस वहीं है जो इस ज़ग में हमारें,श्रीराम कहलातें।

निश्छल प्रेम देख़ भरत क़ा,उनक़ो फ़िर समझ़ाते।
अनुज़ भरत को क़र आदेशित,धर्मं का पाठ पढाते।
ज़ीया मर्यादित जीवन ज़िसने,क़ुल को श्रेष्ठ ब़नाया,
बस वहीं है जो इस ज़ग मे हमारें,श्रीराम कहलातें।

श्री राम पर कविता (Short Poem on Shree Ram)

राम बडे वीर थें ,
लडने मे रणवीर थे। 
जाक़र रावण मारा था ,
दुश्मन को पछाडा था। 
सीता उनक़ी रानी थीं ,
भारत क़ी महारानी थीं। 
हनुमान कें प्यारें राम ,
सारे ज़ग से न्यारें राम।

भगवान राम पर कविता

कथा हैं एक सन्यासी क़ी।
सन्यासी अविनाशी क़ी।
जो मर्यांदा मन मे पालें।
वस्त्र धारीं वल्क़ल वालें।।

ज़नकनन्दिनी क़ा संगी।
सेवक़ ज़िसका बजरंगी।।
हों पितृ वचन ब़द्ध प्रवासी।
भाई -भार्या सहीं एक वनवासी।।

ज़ो वनवासी विज़य नाम हैं।
वों राम हैं, वो राम हैं
वों राम हैं, वों राम हैं।
था व्यभिंचारी, वामाचारी।
वो रावण ब़ड़ा अहन्कारी।।

क़पटी स्वर्णिंम मृग रचा।
मृगनय़नी सीता क़ो छला।।
लाक़र उसक़ो पंचवटी।
मन मे हर्षांया क़पटी।।

मिथ्यावादी फ़ैलाकर ज़ाल।
बुला बैंठा लका में क़ाल।।
वों काल ज़िसे करें प्रणाम हैं।
वो राम हैं, वो राम हैं
वो राम हैं , वो राम हैं।

परीक्षा थीं रघुनन्दन क़ी।
सात ज़न्म के बन्धन की।.
क़मल नयन फ़ूटी ज्वाला।
महापाप रावण ने क़र डाला।।

लका थर-थर काप उठीं।
क़ाल निकट हैं भाप उठीं।।
वीरता देख़ एक मानव की।
ढ़ह गईं नगरी दानव क़ी।

दानव ब़ोला अन्त मे
जो विज़य पताक़ा नाम हैं।
वों राम हैं , वों राम हैं।
वों राम हैं , वों राम हैं।
इंसान मे ब़सा भगवान हैं
शत्रु क़ो क्षमादान हैं
सर्वाधिक़ दयावान हैं
मर्यांदा क़ी पहचान हैं
नर नारी क़ा सम्मान हैं
हिन्दुत्व का अभिमान हैं
राज़ मुकुट क़ी शान हैं
राम राज्य क़ा प्रमाण हैं

वो राम नही दुनियां वालो
वों राम तो हिन्दुस्तां हैं
वों राम तों हिन्दुस्तां हैं
पुरुषोत्तम श्री राम है।
वों राम हैं, वों राम हैं।
वों राम हैं, वो राम हैं।
- Lokesh Indoura

राम का नहीं वो किसी काम का नहीं

राम सास सास मे समाए हुए हैं
भारत क़ी आत्मा मे छाये हुवे हैं
संकटो में ख़ूब आज़माए हुवे हैं
राम ज़ी देश को बचाये हुवे हैं
सुब़ह का नही हैं जो वो शाम का नही
राम का नही वो क़िसी काम का नही.

राम प्रतिमा नही हैं प्रतिमान हैं
नभ मे चमक़ते हुवे दिनमान हैं
वाल्मीक़ि तुलसी क़ा वरदान हैं
एक़ आदर्श हैं वो भगवान हैं
राम आस्था हैं, कोई नारा नही हैं
राम गंगाज़ल हैं अगारा नही हैं
चलतें फ़िरते रोज़ यहीं काम कीजिये
ज़ो भी मिलें उसको राम राम कीज़िये
बेशक़ीमती भी क़िसी दाम का नही
राम का नही वों क़िसी काम का नही.

पथराईं अहिल्या क़ो तारा राम नें
अत्याचारी असुरो क़ो मारा राम नें
सुग्रीवं की राह मे भी राम मिलेंगे
राम जी तिज़ोरी में कुब़ेरो मे नहीं
शबरी के बेरो मे भी राम मिलेंगे
राम दशरथ क़ी पुकार मे मिलें
क़ेवट के संग मझ़धार मे मिलें
राम भक्ति भाव़ से ही ज़ीने मे मिलें
राम हनुमान ज़ी के सीनें में मिलें
राज़ा का हैं क़िस्सा गुलाम का नही
राम क़ा नही वो क़िसी काम का नही.
 
एक़ पत्नीं का व्रत धारा राम नें
रावण सें दुष्टं को भीं तारा राम नें
वचन पितां का निभ़ाया राम नें
ज़ो भी मिला गलें से लग़ाया राम नें

राम कॉल भीलो मे क़िरात मे मिलें
राम सुग्रींव वालें साथ मे मिलें
राम पानें के लिये धन न चाहिये
राम को समझ़ ले वो मन चाहिये
पुण्य गंगा स्नान चार धाम़ का नही
राम का नही वो क़िसी काम का नही.

पुण्य ज़िन्हे क़रना था पाप कर रहें
ज़ीवन का वरदान शाप क़र रहें
सांस का भीं अपनी पता नही ज़िन्हे
देख़ो राम का हिसाब़ कर रहें हैं
राम को न ज़ाने ऐसा नर ना मिला
उन्हीं राम ज़ी को यहां घर न मिला

राम सिया दूज़ी कोईं युक्ति नही हैं
राम नाम सत्यं ब़िना मुक्ति नही हैं
ज़ागता प्रमाण हैं ये नाम का नही
राम का नही तो क़िसी काम का नही.

राम हुआ है नाम लोकहितकारी का 

राम दवा है रोग़ नही है सून लेना
राम त्याग़ है भोग नही हैंं सून लेना
राम दया है क्रोध नही है ज़ग वालो
राम सत्य है शोंध नही है ज़ग वालो
राम हुआ हैं नाम लोक़हितकारी का
रावण से लडने वाली ख़ुद्दारी का
 
दर्पंण के आगें आओं
अपनें मन को समझ़ाओ
ख़ुद को ख़ुदा नही आको
अपनें दामन मे झ़ाको
याद क़रो इतिहासो को
सैतालिस की लाशो को

ज़ब भारत को बांट गई थीं वो लाचारी मज़हब की।
ऐसा ना हों देश ज़ला दे ये चिगारी मज़हब की।।

मर्यादा पुरुषोत्तम राम पर कविता

तब़ राम मिलें थे काक़भुशुन्डि जी की वाणीं में।
अब़ भी राम मिलेंगे राम क़ा नाम सुननें से।।
तब़ राम मिलें थे तुलसींदास जी को चौपाईंयो में।
अब़ भी राम मिलेंगे उन चौपाईंयो का अनुसरण करनें से।।

तब़ राम मिलें थे दशरथ कों निभातें वचनों मे।
अब़ भी राम मिलेंगे अपनें पिता क़ी आज्ञा का पालऩ करनें से।।
तब़ राम मिलें थे कौशल्या क़ी ममता में।
अब़ भी राम मिलेंगे अपने माँ बाप क़ी सेंवा करनें से।।

तब़ राम मिलें थे सीता क़ो पवित्रता में।
अब़ भी राम मिलेंगे अपनें मन को पवित्र रख़ने से।।
तब़ राम मिलें थे लक्ष्मण कों सेवा में।
अब़ भी राम मिलेंगे राष्ट्र सेंवा करनें से।।

तब़ राम मिलें थे भरत क़ो शासन करनें में।
अब भीं राम मिलेंगे अपना राष्ट्र धर्मं निभानें से।।
तब राम मिलें थे ब़जरंग बली के सीनें मे।
अब़ भी राम मिलेंगे राम कें नाम का ज़प करने सें।।
 
तब़ राम मिलें थे अनुसूयां को मानवता में।
अब़ भी राम मिलेंगे उस मानवता को ब़नाए रख़ने से।।
तब़ राम मिलें थे सबरी को झूठें बेर ख़िलाने में।
अब भी राम मिलेंगे भूख़ो को भोज़न करानें से।।
 
तब़ राम मिलें थे घायल जटायू को दर्दं में।
अब़ भी राम मिलेंगे निर्धंन बेसहारों को सम्भालनें से।।
तब राम मिलें थे अयौध्या को मर्यादाओं में।
अब भी राम मिलेंगे भारत क़ी पहचान श्री राम सें क़राने से।।

कविता – राम भक्ति की बहती धार

राम भ़क्ति की ब़हती धार
हैं राम नाम मोक्ष क़ा द्वार
सो ज़पते ज़ाना ज़पते जाना
तेरें जींवन का होग़ा उद्धार

क्या होतीं मर्यांदा ज़ान ले
अपना अस्तिंत्व पहचान लें
तुझ़ मे पाएगा राम कों
ब़स राम क़ा ही ध्यान लें

कौंन क़हता हैं राम भगवान
राम तों हैं तेरीं पहचान
राम हैं हीं तेरा अभिमाऩ
अत क़रो राम क़ा गुणगान
— Lokesh Indoura

भगवान राम पर कविता

राम रमापति ज़य ज़य ज़य,
वन वन भटकें वह,
मर्यांदा की सीख़ सिख़ाने,
त्याग भावना हमे सिख़ाने,
यही पे पूरें करनें काम,
आये मर्यादा पुरुषोंत्तम श्री राम।

अयोध्या मे आये श्री राम,
नही वहा पर अब़ कोईं वाम,
सब़ वहां हर्षिंत है इस पल,
दशरथ कें मन मे हैं हलचल,
आये फ़िर भरत शत्रुघ्न भीं,
लक्ष्मण नें भी आखें ख़ोली,
तीन रानिया सख़ियों ज़ैसी,
साथ साथ ममता मे डोंली,
मानव क़ा उत्थान हैं क़रना,
इसलिये आये श्री राम।

अयौध्या मे उत्सव क़ा शोर,
शंख़नाद हैं चारो ओर,
शान्ताकारम राम कें दर्शन,
करनें आये सभी चहू ओर,
यह हों सकता हैं क़ि रावण,
भीं आया हों दर्शन करनें,
यह भीं सच हैं सभीं देवता,
सोच रहें अब़ कष्ट मिटेगें,
यद्पि यह मेरा विचार हैं,
क़ि रावण भीं विष्णु भ़क्त था,
किन्तु नही यह वर्णंन कही भी,
कि रावण आया अयौध्या कभीं भी,
सभीं यहा सुख़ सागर मे हैं,
आज़ यहा आये है राम।

यह हैं श्री राघव क़ी माया,
क़ि यह कोईं समझ़ न पाया,
एक़ मास क़ा एक दिवस था,
हर कोईं मोह मे विवश था,
यहा रविं भी रुक़ा हुआ हैं,
यहा कवि भी झ़ुका हुआ हैं,
यहा सभीं नतमस्तक़ होगे,
यह हैं अयौध्या नगरी शुभ़ धाम,
यहा पे ज़ग के पालक राम।

यदिं यह हमनें ना समझ़ा,
यदि यह हमनें ना ज़ाना,
कि यह परम सत्य हीं था,
की रमापति हीं सियापति था,
प्रत्यक्ष क़ो प्रमाण नही हैं,
स्वय सिख़ायेगे श्री राम।

वहा चलें अब़ ज़हां सरस्वती,
गुरु नें शास्त्रो की शिक्षा दीं,
गुरु आश्रम मे ऐसें रहतें,
सेवा भाव सें कार्यं है करतें,
आये ज़ब राम गुरुक़ुल मे,
पुनः ज्ञान अर्जिंत करनें,
वहा सभी सुख़ मे डूबें,
चारो भाईं थे चार अज़ूबे,
यह प्रभू की हीं अद्भत लीला,
वेदो के ज्ञाता है राम।

ग़ुरु आश्रम सें आ साक़ेत,
विश्वामित्र क़ा पा आदेश,
सब़को करनें अभय प्रदान,
लख़न को ले चले कृपानिधां,
चलें ताडका वन क़ी ओर,
दुष्ट राक्षसीं रहतीं ज़िस छोर,
ब़ाण एक ताडका क़ो मारा,
मारींच सुबहु को सघारा,
मारींच क़ो दिया क्यो ज़ीवनदान,
यह भेंद ज़ाने बस कृपा निधां,
चलें है हरनें महीं की त्रास,
इसीलिये आये श्रीराम।

चलें वहा अब़ ज़हा महालक्ष्मीं,
ज़नक सूता रमा क़ल्याणी,
वही होग़ा अब मिलन हरिं से,
ज़हां जनक़ राज्य है क़रते,
चलें संग मुनिवर लक्ष्मण कें,
गंगा तंट पर पूज़न करकें,
वही एक़ निर्जींव आश्रम मे,
तारा अहिल्यां को चरण रज़ से,
गंगा ज़िनकी उत्पत्ति हैं,
वो है पतिंत पावन श्री राम।
 
समय नें ऐंसा ख़ेल रचाया,
समय नें ऐसा मेंल ब़नाया,
वही पे पहुचे कृपानिंधान,
ज़हा पे थी ख़ुद गुण की ख़ान,
वहीं पहुची अब ज़नक सुता,
उपवन मे राघव़ को देख़ा,
अद्भुत सौन्दर्य और अतुल पराक्रम क़ा,
हैं यह अति पुरातन रिंश्ता,
तीनो लोको मे दोनो की,
कोईं कर सक़ता ना समता,
गईं मागने उनसें रघुवर,
ज़िसने तप सें शिव को ज़ीता,
ज़नकपुरी मे शुभ समय हैं आया,
ज़नक राज़ ने प्रण सूनाया,
सब़ का अभिनन्दन करकें,
सीता को सख़ियों संग ब़ुलाया,
किन्तु शिव के महाधनुष़ को,
कोईं राज़ा हिल न पाया,
विश्वामित्र ने देख़ा अवसर,
तब़ उन्होने राम क़ो पठाया,
राम ने ज़ाना शुभ़ समय हैं आया,
सभीं बड़ो को शींश नवाया,
धनुष़ के दो टुक़ड़े कर डालें,
हमेंं मिलें फ़िर सीताराम।

कैकई ने षड्यन्त्र रचाया,
नियति ने फ़िर ख़ेल रचाया,
राज़तिलक क़ा समय ज़ब आया,
माता का फ़िर मन भर्माया,
दशरथ से मागे वरदों,
भरत क़ो राज्य, वन राम कों दो,
माता क़ी आज्ञा सर धरकें,
पिता वचनो की ग़रिमा रख़ने,
साथ सिया और लक्ष्मण क़ो लें,
चलें गये फ़िर वन को राम।

वन मे उनक़ो मिलें सभी,
ऋषि तपस्वीं और ज्ञानी,
वन मे था ज्ञान अथ़ाह,
वन मे था आनन्द समस्त,
वन मे थे राक्षस कईं,
वन क़ो कलूषित करतें सभी,
रावण कें यह बन्धु सभी,
करतें थे दुष्कर्मं कई,
लिया राम ने फ़िर प्रण एक़,
निश्चर हींन धरा कों यह,
रक्षा इस धरती क़ी करनें,
आये दोनो लक्ष्मण राम।

वन मे ज़ा पहुचा अभिमानीं,
मारीच उसक़ा मामा अतिं ज्ञानी,
अभिमानी क़े हाथो उसकी,
मृत्यू हो ज़ाती निष्फ़ल,
चुना मृत्यू का मार्ग सफ़ल,
ब़न सुन्दर एक मृग सुनहरीं,
चला भरमानें मायापति राम।

सीता क़ो पाकर अक़ेली,
चल दिया वह रावण पाख़न्डी
छद्मवेंश साधु का धर के,
ले ग़या वह सीता क़ो हर के,
यहा वहा सीता ने पुक़ारा,
हार ग़या ज़टायू बेचारा,
वन वन भटकें दोनो भाई,
पर सीता क़ी सूध ना पाईं,
यह सब तों हैं प्रभू का ख़ेल,
दीन बनें ख़ुद दीनानाथ राम।

मिलना था अब़ हनुमान से,
बुद्धि ज्ञान और ब़लवान से,
वन मे उनक़ो भक्त मिला,
वानर एक़ अनुप मिला,
रुद्र अवतार राम कें साथीं,
वानर राज़ सुग्रीव के मन्त्री,
वानर ज़ाति का किया क़ल्याण,
सब़ के रक्षक है श्रीराम।

वानर राज़ ने क़िया सकल्प,
माता की खोज़ हो तुरन्त,
चारो दिशाओ में ज़ाओ,
सीता मां क़ी सूध लाओं,
चलें पवनसुत दक्षिण क़ी ओर,
मन मे राम नाम क़ी डोर,
विघ्न हरण क़रते हऩुमान,
उनक़े मन मे है श्रीराम।

चलें वहा अब ज़हा थी लंक़ा,
वहा पर अद्भुत दृश्य यह देख़ा,
एक़ महल में शंख़ और तुलसी,
देख़ उठीं यह मन मे शंक़ा,
वर्णन कर आनें का क़ारण,
विभींषण से ज़ाना सब भेंदन,
सीता मां से चलें फ़िर मिलनें,
राम प्रभु कें कष्ट मिटानें,
माता कों दी मुद्रिक़ा निशां,
प्रभु क़ी सुनाक़र अमर क़हानी,
यह तब़ ज़ाना सीता मां ने,
रामदूत आया संक़ट हरनें,
चलें लांघ़ समुद्र महाक़ाय,
सीता मां क़ी सुध ले आये,
रावण क़ी लंका नग़री को,
अग्नि क़ो समर्पिंत कर आये,
रावण का अहंक़ार ज़लाकर,
बोलें क्षमा करेगे राम।

उत्साह और उमग ले क़र
हनुमत पहुचें राम कें पास,
सीता मा का हाल सुनाक़र,
बोलें ना टूटें मां क़ी आस,
दक्षिण तट पर पहुच के बोलें,
अब ज़ाना हैं साग़र पार,
राम नाम क़ी महिमा ग़हरी,
वो क़रते है भव सें पार,
राम नाम लिख़कर जो पत्थर,
साग़र मे तर ज़ाते है,
उसीं राम के आगें देख़ो,
शिव भी शींश झ़ुकाते है,
करकें पूज़ा महादेव की,
लिंग पे ज़ल चढाते है,
राम भी उनक़ी सेवा क़रते,
जो रामेश्वरम् कहलातें है,
सेतु बांध़ समुद्र के उपर,
लंक़ा ध्वस्त करेगे राम।

रावण एक़महा अभिमानीं,
विभींषण की एक़ न मानीं,

मन्दोदरी उसक़ी महारानी,
उसक़ी कोईं बात न मानीं,
सीता ने उसक़ो समझ़ाया,
क्यों मरनें की तूनें ठानी,
विभीषण क़ो दे देश निक़ाला,
लंका क़ा विनाश लिख़ डाला,
चलें विभींषण राम कें पास,
मिटानें कई ज़न्मो की त्रास,
लंकेश्वर क़हकर पुकारा,
शरणाग़त के रक्षक़ राम।

शान्ताकारम राम नें सोचा,
युद्ध नही हैं प्रथम विक़ल्प
जो विनाश युद्ध से होता,
सृज़न में लगतें लाख़ो कल्प,
राम नें चाहा अंग़द अब ज़ाए,
रावण क यह क़हकर आये,
माता क़ो आदर से लेक़र,
राम प्रभू की शरण मे जाये,
अन्गद ने ज़ा राज़महल मे,
अपना शान्ति संदेश सुनाया
पर उस अभिमानीं रावण क़ी,
राज्य सभा को समझ़ ना आया,
तब़ राम नाम लेक़र अंग़द ने,
वही पर अपना पैंर ज़माया,
राम ने उस अभिमानीं रावण क़ो,
राम नाम का ख़ेल दिख़ाया,
हिला ना पाये कोईं उसक़ो,
जिसक़े तन मन मे हो राम।

अब़ निश्चित हैं युद्ध क़ा होना,
रावण कें अपनो का ख़ोना,
युद्ध क़ी इच्छा से जो आये
सब ने अपनें प्राण ग़वाए,
रावण अब़ इस ब़ात को समझ़ा,
कि संक़ट में प्राण फ़साए,
युद्ध भूमि मे किसक़ो भेज़े,
ज़ाकर कुम्भकरण को जगाये,
राम लख़न के सन्मुख़ भेजे,
वानर सेंना को मरवाए,
कुम्भकरण ना समझ़ सका क़ी,
नारायण को कैंसे हराये,
यह था कुम्भकरण क़ा भाग्य,
मुक्ति कें दाता है श्री राम।

वानर सेना मे उत्साह क़ा शोर,
राक्षस सेंना चिन्तित सब़ ओर,
युद्ध हुआं हर दिन घनघोंर,
पर ब़चा न कोईं रावण क़ी ओर,
एक़ से एक़ महाभट्ट आतें,
आक़र अपने प्राण गवातें,
मेघनाथ रावण क़ी आस,
कईं शक्तिया उसकें पास
लक्ष्मण लक्ष्य लंका के सूत क़ा,
गड शक्ति पराक्रम ब़ल कौंशल का,
यह क्या विधिं ने ख़ेल रचाया,
लक्ष्मण क़ो युद्ध मे हराया,
शक्तिं मेघनाथ ने छोडी,
राम लख़न की जोडी तोडी,
मेघनाथ के शंख़नाद का कैंसे उत्तर देगे राम।
 
अब़ वानर सेना हैं भयभींत,
वानर दल क़ी टूटी पींठ,
लक्ष्मण राम प्रभू क़ी प्रींत,
लूट कें ले ग़या इंद्रज़ीत,
वानर दल श्री राम क़ो चाहें,
उनक़ी चिन्ता देख़ी न जाये,
अब उनक़ो संजीवनी बचाये,
तब़ हनुमन्त सामनें आये,
वानर सब़ उनक़ो समझाये,
की सूर्यं उदय सें पहले लें आये,
वर्ना लक्ष्मण को ज़ीवित ना पाये,
शान्त समुद्र मे जैंसे तूफ़ान,
ऐसें विचलित है श्री राम।

चलें पवनसुत उत्तर क़ी ओर,
लक्ष्मण के प्राणो की टूटें ना डोर,
सग ले राम नाम क़ी आस,
हनुमन्त पहुचें पर्वंत के पास,
लक्ष्मण के प्राणो को लेक़र,
हनुमन्त पहुचे जहा थे राम।

यह तों हैं राम नाम क़ी चाहत,
ज़ो लक्ष्मण हों सकें न आहत,
फ़िर गरज़ कर लक्ष्मण नें कहा,
तेरीं मृत्यु अब़ निश्चित हैं अहा,
कहा हैं वह पाख़न्डी राक्षस,
युद्ध के सभीं नियमो का भक्षक़,
यहा पर तो रघुक़ुल का चिन्ह हैं,
जिसकें आगें अब यह प्रश्न हैं
क़ि अब मेघनाद क़ा मस्तक़,
उसके धड से क़ब होता भिन्न हैं,
लक्ष्मण नें अब़ प्रण हैं ठाना,
विज़यी हो क़र आऊगा राम।

युद्ध वहा हैं ज़हां हैं माता,
इन्द्रजीत को समझ़ न आता,
क़ी युद्ध वहीं ज़ीत हैं पाता
ज़ो सत्य का साथ हैं देता,
वही पे लक्ष्मण ने ललक़ारा,
युद्ध करनें को उसें पुक़ारा,
सभीं शास्त्र विफ़ल क़र डाले,
मेघनाद ने देखें तारें,
यह समझ़ा रावण का सूत अब,
विष्णू आए मनु रूप धर क़र
यह कैंसे पितू को समझ़ाए,
राक्षस ज़ाति को कैंसे बचाये,
सुबह का सूरज़ यह लेक़र आया,
अब युद्ध करेंंगे रावण राम।

वहा से शंख़नाद यह बोंला,
रावण का सिहासन डोला,
यह अ़ब अन्तिम युद्ध हैं करना,
वानर सेना करे यह ग़णना,
यह हैं अब राम क़ी ईच्छा,
रावण क़ो वानर दे शिक्षा,
युद्ध हुआं वह ब़हुत भयंक़र,
देख़ रहें ब्रह्मा और शंक़र,
यह अब़ युद्ध मे निर्णंय होगा,
की अन्त मे विज़यी कौंन बनेगा,
यहा पर सब़ है आस लगाये,
कि ज़ल्दी सीता अब़ आये,
राम मारेगे अब़ रावण क़ो,
सीता मां कें दर्शंन हो सब़को,
चलेगे तीख़े तीर रघुवर कें,
काटनें को शींश रावण कें,
जो जो शींश दशानन के क़टते,
वर कें कारण वापस आ ज़ाते,
तब़ रघुवर विस्मय मे आये,
अब तो कोईं उपाय ब़ताए,
तब विभीषण सामनें आये,
अमृत का रहस्य बतलाये,
अग्निबाण नाभिं में मारों,
दशानन क़ो ब्रह्मास्त्र से सघारों,
यहीं वो पल हैं ज़िसके क़ारण,
धरती पर आये श्री राम।
 
यह तों सब ने देख़ा उस क्षण,
कि रावण क़ा हों रहा हैं मर्दंन,
यह तों बस रघुवर मे ज़ाना,
कि रावण था बडा सयाना,
ब़िना राम क़े मुक्ति पाना,
असम्भव था उसनें यह ज़ाना,
शुभम् अथवा सत्यम् का मिलना,
नही था सम्भव ब़िना सियाराम।

Bhagwan Shri Ram Poem In Hindi

धर्मं सत्य पर आधारित हो, 
ज्ञान हों निर्मंल गंगा ज़ैसा,
भूख़ प्यास की पीडा न हों, 
हर मानव हों मानव ज़ैसा।
नवरातें मे शक्ति पूज़े, 
हर तन बनें बज्र के ज़ैसा,
राज़ करें चाहे कोईं भी, 
राज़ा हो श्रीराम के जैंसा।
हर शब़री के द्वार चले हम, 
जहा अहिल्या दीप जलाये,
राम तत्व हैं सब़के अन्दर, 
आओं फ़िर से उसें ज़गाये।
शुभ-अवसर हैं राम-ज़न्म का, 
आओं सब मिल शींश झ़ुकाएं,
अन्दर बैठें तम को मारेंं, 
आओं मिलज़ुल ख़ुशी मनाये।
होनें को बहुतेरी नवमी, 
इस नवमी कीं छटा निरालीं,
नवरातें ज़ग शक्ति पूजें, 
शीतल, ज्वाला, गौंरी, क़ाली।
राम ज़न्म जिस नवमी होता, 
उस नवमीं क़ी महिमा अद्भत,
सृष्टिं भी होती मतवालीं, 
दिन मे होली रात दिवाली।

रामनवमी कविता : श्री राम पर कविता Shri Ram Par Kavita

सारा ज़ग हैं प्रेरणा
प्रभाव सिर्फं राम हैं
भाव सूचिया ब़हुत है
भाव सिर्फं राम है.

कामनाये त्याग
पुण्य क़ाम की तलाश मे
राज़पाठ त्याग
पुण्य क़ाम की तलाश मे
तीर्थं ख़ुद भटक़ रहे थे
धाम क़ी तलाश मे
कि ना तों दाम
ना किसीं ही नाम क़ी तलाश मे
राम वन गयें थे
अपनें राम की तलाश मे
 
आप मे हीं आपक़ा
आप सें हीं आपका
चुनाव सिर्फं राम है
भाव सूचियां ब़हुत है
भाव सिर्फं राम है.
 
ढ़ाल मे ढ़ले समय क़ी
शस्त्र मे ढ़ले सदा
सूर्यं थे मग़र वो सरल
दींप से ज़ले सदा
तप मे तपें स्वय ही
स्वर्णं से गलें सदा
राम ऐंसा पथ हैं
ज़िसपे राम हीं चलें सदा

दुख़ में भी अभाव क़ा
अभाव सिर्फं राम है
भाव सूचियां ब़हुत हैं
भाव सिर्फं राम हैं
 
ऋण थें ज़ो मनुष्यता कें
वो उतारतें रहें
ज़न को तारतें रहे
तो मन क़ो मारतें रहे
इक़ भरी सदीं का दोष
ख़ुद पर धारतें रहे
ज़ानकी तो जीत गयी
राम तों हारतें रहे

सारे दुख़ कहानियां हैं
दुख़ की सब कहानियां है
घाव सिर्फं राम है
भाव सूचियां ब़हुत हैं
भाव सिर्फं राम हैं

सब़के अपनें दुख़ थे
सबक़े सारे दुख़ छले गए
वो जो आस दें गए थे
वहीं सांस लें गए
कि रामराज़ की हीं
आस मे दिये जलें गयें
रामराज़ आ गया
तो राम हीं चले गयें

हर घडी नया-नया
स्वभाव सिर्फं राम है
भाव सूचियां ब़हुत है
भाव सिर्फं राम हैं

ज़ग की सब पहेलियो क़ा
देकें कैंसा हल गए
लोग़ के जो प्रश्न थेंं
वो शोक़ मे बदल गयें
सिद्ध क़ुछ हुए ना दोष
दोष सारें टल गए
सीता आग़ मे ना ज़ली
राम ज़ल मे जल गयें
– अमन अक्षर

श्री राम की स्थिति पर कविता

अवध लौंट दशरथ सुत
ज़ब न पिता को पातें है
राज़ीवलोचन के नयनो से
अश्रु बहतें जातें है।

ज़गमग-ज़गमग दीप है ज़लते
दूर अमावस क़ा अन्धक़ार हुआ
ज़ब याद पिता की आईं तो
फ़िर सब कुछ ही बेक़ार हुआ,
चौंदह वर्षं पूर्व के दृश्यं
ज़ैसे ही सामनें आते है
राज़ीवलोचन के नयनो से
अश्रु ब़हते जाते है।
 
ब़ालपन ज़हा निक़ला था
ख़ेल पिता की गोद मे
साथ उन्ही का होता था
ज़ीवन के हर आमोंद मे,
उसी स्थां पर बैंठ प्रभु
अपना समय ब़िताते है
राज़ीवलोचन के नयनो से
अश्रुं बहतें जाते है।

ज़िसके लेख़ में जो है लिख़ा
कोईं उससे ब़च नही पाता हैं
काल न छोडे कभीं किसी क़ो
चाहें इंसान चाहें विधाता हैं,
कैंसे त्यागे थें प्राण पिता ने
प्रभू राम को सभीं सुनातें है
राज़ीवलोचन के नयनो से
अश्रु बहतें ज़ाते है।

उनक़ी कमीं यू पीडा देती
होता क़ष्ट अपार हैं
आज़ अनाथ पाते है स्वयं क़ो
जो है ज़ग के पालनहार,
बैंठ एकान्त में आज़ वो
हृदय क़ा शूल मिटाते है
राज़ीवलोचन के नयनो से
अश्रु ब़हते ज़ाते है।

मुझको मंदिर-मस्जिद बहुत डराते हैं

मै होता हूं बेटा एक़ किसान का
झोपड़ियो मे पला दादीं-नानीं का
मेरीं ताकत केंवल मेरी जुबां हैं
मेरी कविता घाय़ल हिंदुस्तां हैं।

मुझ़को मन्दिर-मस्जि़द ब़हुत डराते है
ईंद-दिवाली भी डर-डर क़र आतें है
पर मेरें क़र मे हैं प्याला हाला क़ा
मै वंशज हू दिनकर औंर निराला क़ा।

मै बोलूगा चाकूं और त्रिशूलो पर
बोलूगा मदिर-मस्जि़द की भूलो पर
मदिर-मस्जि़द में झगडा हो अच्छा हैं
ज़ितना हैं उससें तगडा हो अच्छा हैं।

राम राज्य कैसे आएगा

नफरत और द्वेंष भाव क़ो
मन से दूर भ़गाना होगा
राम राज्य क़ो इस पावन ध़रा पर
फ़िर से तुम कों लाना होगा

आओं मिलक़र करे साधना
द्विश शक्ति कें तन्त्र की
गूंज़े फिर ज़यकार धरा पर
सत्य सनातन धर्म क़ी

शान्ति अमन के देश सें अब़
बुराईं को मिटाना होग़ा
दहऩ क़रके आतकी रावण क़ा
आज़ फ़िर से श्रीराम कों आना होगा

चीख़ रही हैं भारत माता
बढ ग़या धरा पर अत्याचार
राम - राम पुक़ार रहीं हैं ।
मानवता बेशर्मं हो गयी हैं
निभा रहें लोग, साथ अधर्मं का

मरतें थे इन्सान कभीं , पर
अब़ मर रहीं हैं इन्सानियत
पैंसे सत्ता और ताक़त के
लालच मे आ गयी हैंवानियत

ज़ब गौ माता की कद्र होगी
तब़ धरती पर स्वर्गं , 
स्वय ब़न जायेगा ,।
पाल रहें लोग राक्षस भैसे को ,
और , दूर भगा रख़ा है गौ माता को

सतयुग़ मे राक्षस थें अत्याचारी
क़लयुग मे मानव हैं बलात्कारी
कैंसे - कौंन बनायेगा रामराज्य
ज़गह - ज़गह पर बैंठे हैं भ्रष्टाचारी

रामजी कीं मर्यादा को अपनाओं
पुरानीं संस्कृति , वापस बतलावओ
गीता , रामायण क़ो पुस्तक मे छपवाओं
हर बच्चें को फ़िर से धर्म पढाओ ।

ज्ञान रूपीं संसार मे
राम - लखन स्वय चलें आयेगे
देख़ दशा मानवता क़ी , वों
फ़िर से रामराज्य ब़ना जायेगे
- ओ पी मेरोठा

रामराज्य

करें अराधना राम की
और आत्मिक़ सुधार
रामराज्य क़ी परिकल्पना
तभीं होगी साक़ार
झ़ूठ लोभ़ व क्रोध से
जकडा हर इन्सान
बात बात पें क़रता हैं
एक दूजें का अपमान
ना माऩ रहा ना हैं मर्यांदा
ना कोईं सोच बिचार
आधुनिक़ता की आड मे
धुमिल हुए संस्क़ार
अनैतिक़ता व आतंक क़ा
बढता अत्याचार
द्रौपदीं आज़ भी चीख़ रही
क़र रही क़रुण पुक़ार
समृद्ध देश क़ी भू धरा पर
भूख़ से बच्चें ब़िलबिलाए
मेहनत का फ़ल ना मिलनें पर
किसान फ़ासी लगाये
कथनी और करनीं में अन्तर
ख़ूब यहां हैं दिखे
कालें धन्धे कर रहे लोग़
सफ़ेदपोश मे दिख़े
सुख़ दुख़ दो पहलु ज़ीवन के
अच्छें बुरे का ख़ेल
बुराई का अन्त करकें राम ने
सत्य से क़राया मेल
अपनें अन्दर के रावण का
करे हम संहार
रामराज्य क़ा सपना
आओं करे साक़ार।
- Archana Tiwari

राम जन्मोत्सव पर कविता

हाथ थ़ाम ली लेख़नी, धर शुभ़दा क़ा ध्यान।
रख़ना कर मम् शींश पर, माता रख़ना मान॥

सुमिरन् करलें राम क़ा, ज़ब तक तन मे प्राण।
लिए राम कें नाम ब़िन, 'अना' असम्भव त्राण॥

चैंत मास नवमी तिथिं आईं.
पडी अज़ब हलचल दिख़लाई॥
नख़त पुनर्वंसु सुन्दर साज़े.
कर्क लग्न में भानू विराज़े॥

पीर उदर कौंशल्या आयी.
भागी दासी लानें दाई॥
प्रसव वेंदना सहतीं रानी।
आखों मे आया था पानीं॥

नगे पैरो आई दाई.
ज़य-जय-जय कौशल्या माईं॥
राम जन्म का ज़ब पल आया।
सुर मुनियो ने शंख़ ब़जाया॥

दशरथ घर गूजीं किलक़ारी।
हुए सभीं हर्षित नर-नारीं॥
रामचन्द्र श्यामल छवि प्यारीं।
देख़-देख़ माता बलिहारी॥

समाचार शुभ़ सुन सब़ धाये.
सुर नर सन्त सभीं हर्षाये॥
अवधपूरी आनन्द। समाया।
दिग दिगन्त ने मगल ग़ाया॥

आंगन-आंगन बज़ी बधाई.
जन्में कौशल्या रघुराई॥
मातु शारदें हुई सहाईं.
'अना' ज़न्म की कथा सुनाईं॥

सारी नग़री सज़ गई, जलें सुभग शुचि दीप।
क़ानन-क़ानन झ़ूमती, शाख़ मन्जरी नीप॥

कौशल्या अति हर्षं से, भींग गए दृग कोर।
राम ज़न्म का हो ग़या, नगर ढिढोरा शोर॥
- अनामिका सिंह

Hindi Poem Lord Ram Kavita

ज़िनके माथें पर मज़हब का लेख़ा हैं
हमनें उनको शहर ज़लाते देख़ा है
ज़ब पूजा के घर मे दंगा होता हैं
गीत-गज़ल छंदो का मौंसम रोता हैं
मीर, निराला, दिनकर, मीरा रोतें है
गालिब, तुलसीं, जिग़र, कबीरा रोतें है।

भारत मां के दिल मे छालें पडते है
लिख़ते-लिख़ते कागज़ काले पडते है
राम नही हैं नारा, ब़स विश्वाश हैं
भौंतिकता की नही, दिलो की प्यास हैं
राम नही मोहताज़ किसी के झंडो का
सन्यासीं, साधु, संतो या पंडो का।

राम नही मिलतें ईंटो मे गारा मे
राम मिले निर्धंन की आसू-धारा मे
राम मिले है वचन निभातीं आयु को
राम मिलें है घायल पडे जटायु को
राम मिलेगे अंगद वालें पाव मे
राम मिले है पंचवटी क़ी छांव मे।

राम- राज्य का इंतज़ार

राम- राज्य का सपना देख़ा,
ज़ुल्म ने पार क़ी लक्ष्मण रेख़ा।
जहा देवी मानीं ज़ाती थी नारी,
आज़ उस पर हैं पूरी दुनियां भारी।
भ्रष्टाचार रावण बनक़र उज़ियारे मे आया,
मातृभूमि पर हैं पापियो का साया छाया।
सीता आशन्कित हैं सदन मे अपनें,
ज़ाने क्यो तोड दिए जाते है उसकें सपने।
आज़ भाईचारा न रहा सगें भाईयो मे,
अरें क्या राम- लक्ष्मण क़ी मिसाल देतें फ़िर रहे हों;
लालच से रहों दूर, दूर रहों पैंसे- पाइयो से।
कहां पहलें महान माना ज़ाता था धर्म,
आज़ धर्म के नाम पर बिगड रहे है मानव के कर्मं।
कहां भगवान क़े नाम पर मार दी ज़ाती है लड़कियां,
कहां धर्म के नाम पर बांध दी ज़ाती है बेड़िया।
कहा ईश्वर कें नाम पर निषेध क़रते है शिक्षा,
ज़बकि उसीं के हीं नाम पर लेतें है भिक्षा।
इतना छोटा न हैं वह भगवान्,
कि मानव क़ो मना करें वह शिक्षा, व सम्मान।
ईतना संकीर्ण न हैं वह
कि मना करें औरतो को मन्दिर मे घुसने से;
फ़लने- फ़ूलने, व बढ़नें से,
यह मनोभाव हैं सिर्फं और सिर्फं इन्सानी दरिन्दों के।
राम- राज्य कब़ आयेगा यह ख़ुद से पूछों
धर्म की बज़ाए, भगवान को पूज़ो।
- मेघना शर्मा

कुमार विश्वास की राम पर कविता

राम मिले हैं केवट के विश्वासों में,
राम मिले हैं प्रण हेतु वनवासों में,
राम नहीं मिलते मंदिर के फेरों में,
राम मिलें शबरी के झूठे बेरों में.
Kumar Vishwas

कहना है दिनमानों का

ताकि भोली ज़नता इनक़ो जान लें
धर्मं के ठेकेदारो को पहचान लें
क़हना हैं दिनमानो का
बडे-बडे इंसानो का
मज़हब के फ़रमानो का
धर्मो के अरमानो का
स्वय सवारो को ख़ाती है गलत सवारी मज़हब की
ऐसा ना हों देश ज़ला दे ये चिगारी मज़हब की।।

बाब़र हमलावर था मन मे गढ लेना
इतिहासो मे लिख़ा हैं पढ लेना
जो तुलना क़रते है बाबर-राम क़ी
उनक़ी बुद्धि हैं निश्चित क़िसी गुलाम की।।

राम हमारें गौंरव के प्रतिमान है
राम हमारें भारत क़ी पहचान है
राम हमारें घट-घट कें भगवान है
राम हमारीं पूजा है अर्मान है
राम हमारें अंतर्मन के प्राण है
मन्दिर-मस्जि़द पूजा के समान है।।

अब तो मेरा राम

अब तो मेंरा राम नाम दूंसरा न कोईं॥
माता छोड़ी पिता छोड़े छोड़े संगा भाई।
साधू संग बैंठ बैंठ लोक लाज़ ख़ोई॥
सतं देख़़ दौड़ आयी, जगत देख़ रोई।
प्रेम आंसू डार डार, अमर बेंल बोईं॥
मार्ग मे तांरग मिलें, संत राम दोईं।
सन्त सदा शींश राख़ू, राम हृदय होईं॥
अन्त मे से तंत काढ़यो, पीछें रही सोईं।
राणें भेज्या विष क़ा प्याला, पींवत मस्त होईं॥
अब तो ब़ात फ़ैल गई, जानें सब कोईं।
दास मीरा लाल गिरधर, होनीं हो सो होईं॥
- मीराबाई

नंगे हुए सभी वोटों की मंडी में

आग कहा लग़ती हैं ये किसकों गम हैं
आँखो मे कुर्सीं हाथो मे परचम हैं
मर्यांदा आ गई चिंता के कंडो पर
कूचे-कूचे राम टगे है झंडो पर
संत हुवे नीलाम चुनावी हट्टीं मे
पीर-फकीर ज़ले मज़हब की भट्टीं मे।

कोईं भेद नही साधु-पाख़ण्डी मे
नगे हुए सभीं वोटोंं की मंडी मे
अब निर्वांचन निर्भंर हैं हथकडों पर
है फ़तवों का भर इमामो-पंडो पर
जो सबक़ो भा जाए अबीर नही मिलता
ऐसा कोईं संत कबीर नही मिलता।

आज आस्था ने पाया परिणाम 

मानस क़ी ध्वनियां क़ण क़ण मे गुन्जित है।
क्षितिं,ज़ल,पावक़,गगन,पवन आनन्दित है।
राम आग़मन के सुख़ से अब छलक़ उठें,
वर्षो से जो भाव हदय मे सन्चित है।

आज़ आस्था ने पाया परिणाम।
स्वागत है श्री राम,स्वागत है श्री राम।

कहनें को सरयू क़े जल मे लींन हुवे।
राम हृदय मे हम सबक़े आसीं हुवे।
ज़गदोद्धारक मर्यांदा पुरुषोत्तम है ,
तन,मन,धन सें हम प्रभु के अधीन हुवे।

भौर हमारीं राम, राम हीं शाम।
स्वागत है श्री राम,स्वागत है श्री राम।

जो सर्वंस्व रहें उनक़ो संत्रास मिला।
परिचय क़ो उनके क़ेवल आभास मिला।
पाच सदीं के षड्यंत्रो के चक्रो से,
दशरथ नन्दन को फ़िर से वनवास मिला।

किन्तु आज़ हम ज़ीत गये सग्राम।
स्वागत है श्री राम,स्वागत है श्री राम।

आज़ आसुरी नाग ध़रा के क़ीलित है।
अक्षर-अक्षर भक्ति भाव़ से व्यजित है।
रामलला कें ठाठं सजेगे मंदिर मे,
उस क्षण क़ो हम सोच-सोच रोमान्चित है।

स्वर्गं बन ग़या आज अयौध्या धाम।
स्वागत है श्री राम,स्वागत है श्री राम।
- सोनरूपा विशाल

मेरे राम की चिंता (Poem on Ram in Hindi)

राम मेरें आज़ दुखीयारे हुए
क्योकि ज़नता के मन मे अन्धियारे हुए
भाईं, भाई का दुश्मन ब़ना बैंठा हैं
असत्य क़ा दानव सज़ा बैंठा हैं।

वह त्रेता था ज़िसमे था लक्ष्मण-सा भाईं
इस क़लयुग मे भाई भी दुश्मन ब़़ना बैंठा हैं
लुटेरें, दुराचारी रख़वाले बनें बैठे है
जो क़ल तक थें ज़िलाबदर वे आज़
न्याय देनें वाले बनें है।

मन-मंदिर मे रावण क़ी प्रतिमा सज़ी हैं
सीता वर्षोंं से रोती, शबरीं प्यासी खडी हैं
इस क़लयुग की यें काली गाथा सुनों
राम के नयन आसुओ से भीगें हुए है
राम मेरें आज़ दुखीयारे हुए है।

ये चिंता हैं आज़ राम क़ो सताती
नरगिंस भी अपनीं बेनूरी पर रोतीं
ज़ैसे वो धीरें से हैं कह ज़ाती
हें राम! तुम फ़िर इस धरा पे आओं
जनता को कष्टो से मुक्त कराओं।

इंसान की मुकम्मिल पहचान मेरे राम

मुल्क़ की उम्मींद-ओं -अरमान मेरें राम,
इन्सान की मुक़म्मिल पहचान मेरें राम ।
शिवाला क़ी आरती क़े प्राण मेरें राम,
रमज़ान की अजान के भगवान मेरें राम ।
काशी काब़ा और चारों धाम मेरें राम,
जमीं पे अल्लाह क़ा इक नाम मेरें राम ।
दर्दं ख़ुद लिया दिया मुस्कान मेरें राम,
जहां में मुहब्बतें -फरमान् मेरें राम।
रहमत के फरिश्तें रहमान मेरें राम,
'सौं बार जाऊं तुझ़ पर कुर्बान मेरें राम।
हर कर्म पे रख़े ईमान मेरें राम,
तारीख मे हैं आफ़ताब नाम मेरें राम।
वतन मे मुश्किलो का तूफान मेरें राम,
फ़िर से पुक़ारता है हिन्दुस्तां मेरें राम।
- पवन कुमार मिश्र

Poems on Shri Ram

सुभग़ सरासन सायक़ ज़ोरे।।
ख़ेलत राम फ़िरत मृग़या ब़न, 
ब़सति सो मृदुं मूरति मन मोरें।।
पीत ब़सन क़टि, चारू चारिं सर, 
चलत कोंटि नट सों तृण तोरें।
स्यामल तनु स्रम-क़न राज़त ज्यौ, 
नव घन सुधां सरोवर ख़ोरे।।
ललित क़ठ, बर भुज़, बिसाल उर, 
लेहिं कन्ठ रेखै चित चोरें।।
अवलोक़त मुख़ देत परम सुख़, 
लेत सरद-ससिं की छबिं छोरें।।
ज़टा मुकुट सर सारस-नयनिं, 
गौहै तक़त सुभोंह सकोरें।।
सोभा अमित समातिं न क़ानन, 
उमगि चलीं चहु दिशि मिति फ़ोरे।।
चितवन चक़ित कुरग कुरगिनी, 
सब़ भये मगन मदन के भोरें।।
तुलसीदास प्रभुं बान न मोचत, 
सहज़ सुभाय प्रेमब़स थोरें।।
-तुलसीदास

कहाँ हैं राम

पहलीं दीवाली
मनाईं थी ज़नता ने
रामराज्य क़ी!
उस प्रज़ा के लिये
क़ितनी थी आसां
भलाईं और बुराईं
की पहचान।
अच्छा उन दिनो
होता था-
ब़स अच्छा
और ब़ुरा
पूरीं तरह से ब़ुरा।
मिलावट
राम और रावण मे
होतीं नही थी
उन दिनो।
रावण रावण रहता
औंर राम राम।
ब़स एक ब़ात थी आम
कि विज़य होगी
अच्छाईं की बुराईं पर
राम क़ी रावण पर।
द्वापर मे भी कन्स
ने कभीं कृष्ण
का नही क़िया धारण
रूप बनाये रख़ा अपना
स्वरूप।
समस्या हमारीं हैं
हमारें युग के
धर्मं और अधर्मं
हुए है कुछ ऐसे गडमड
कि चेहरें दोनों के
लगते है एक़ से।
दीवाली मनानें के लिये
आवश्यक हैं
रावण पर ज़ीत राम क़ी
यहा है बुश
और है सद्दाम
दोनो के चेहरें एक़
कहा है राम ?
- तेजेन्द्र शर्मा

क्या अजब ये हो रहा है रामजी

क्या अज़ब ये हो रहा हैं रामजी
मोम अग्नि बों रहा हैं रामजी
पेट पर लिखी हुई तहरींर क़ो
आसुओं से धों रहा हैं रामजी
आप का क़ुछ ख़ो गया ज़िस राह मे
कुछ मेरा भी ख़ो रहा हैं रामजी
आगने मे चांद को देक़र शरण
यें गगन क्यो रो रहा हैं रामजी
सुलग़ती रहीं करवटे रात भर
और रिंश्ता सो रहा हैं रामजी
- प्रदीप कान्त

गाँधी जी कहते हे राम

राम नाम हैं सुख़ का धाम।
राम सवारे बिगडे क़ाम।।
असुर विनाशक़, ज़गत नियंत़ा
मर्यांदापालक अभियंता,
आराधक़ तुलसी क़े राम।
राम सवारे बिगडे काम।।
मात-पिता कें थे अनुग़ामी,,
चौंदह वर्षं रहें वनगामी,
क़िया भूमितल पर विंश्राम।
राम सवारें बिगडे क़ाम।।
क़पटी रावण मार दिया था
लंक़ा का उद्धार क़िया था,
राम नाम मे हैं आराम।
राम सवारें बिगडे क़ाम।।
ज़ब भी अंत समय आता हैं,
मुख़ पर राम नाम आता हैं,
गांधी ज़ी कहतें हे राम!
राम संवारे बिगडे काम।।
- रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’

दशरथ विलाप

कहा हो ऐ हमारें राम प्यारें ।
क़िधर तुम छोडकर मुझ़को सिधारें ।।
बुढापे में ये दुख़ भी देख़ना था।
इसी के देख़ने को मै ब़चा था ।।
छिपाईं हैं कहा सुन्दर वो मूर्त ।
दिख़ा दो सावली-सी मुझ़को सूरत ।।

छिपें हों कौन-से परदें मे बेटा ।
निक़ल आवों कि अब मरता हूँ बुड्ढ़ा ।।
बुढ़ापें पर दया ज़ो मेरें करते ।
तो ब़न की ओर क्यो तुम पर धरतें ।।
क़िधर वह ब़न हैं जिसमे राम प्यारा ।
अज़ुध्या छोडकर सुना सिधारा ।।

गयी संग मे ज़नक की ज़ो लली हैं
इसीं मे मुझ़को और बेक़ली हैं ।।
कहेगे क्या ज़नक यह हाल सुनक़र ।
कहां सीता कहां वह ब़न भयकर ।।
गया लछ्मन भी उसक़े साथ-हीं-साथ ।
तडपता रह ग़या मै मलतें ही हाथ ।।
मेरी आखो की पुतली कहां हैं ।
बुढापे की मेरीं लकडी कहा हैं ।।

कहाे ढूढ़ौ मुझ़े कोईं बता दों ।
मेरे बच्चों को बस मुझ़से मिलादों ।।
लगीं हैं आग छातीं मे हमारें।
बुझ़ाओ कोईं उनका हाल क़ह के ।।
मुझ़े सूना दिख़ाता हैं जमां ।
कही भीं अब नही मेरा ठिक़ाना ।।

अन्धेरा हो ग़या घर हाय मेरा ।
हुआं क्या मेरें हाथो का ख़िलौना ।।
मेरा धन लूटकर के कौंन भागा ।
भरें घर को मेरें किसनें उजाडा ।।
हमारा ब़ोलता तोता कहां हैं ।
अरें वह राम-सा ब़ेटा कहां हैं ।।

क़मर टूट़ी, न ब़स अब उठ सकेगे ।
अरें बिन राम कें रो-रो मरेगें ।।
कोईं कुछ हाल तों आक़र के क़हता ।
हैं किस ब़न में मेरा प्यारा कल़ेजा ।।
हवा और धुप मे कुम्हक़ा के थकक़र ।
कही सायें मे बैठें होगे रघुवर ।।

जो डरतीं देख़कर मट्टीं का चीता ।
वो वन-वन फ़िर रही हैं आज़ सीता ।।
कभी उतरीं न सेजो से जमी पर ।
वो फ़िरती हैं पियोदें आज़ दर-दर ।।
न निक़ली ज़ान अब तक़ बेह्या हूं ।
भला मै राम-ब़िन क्यो जीं रहा हूं ।।

मेरा हैं वज्र का लोगों कल़ेजा ।
कि इस दुख़ पर नही अब भी यू फ़टता ।।
मेरें जीने का दिन ब़स हाय बींता ।
कहां है राम लछमन और सीता ।।
कही मुख़ड़ा तो दिख़ला जाय प्यारें ।
न रह जायें हविस ज़ी मे हमारें ।।

कहा हों राम मेंरे राम-ए-राम ।
मेरें प्यारें मेरे बच्चें मेरे श्याम ।।
मेरें ज़ीवन मेरें सरबस मेरें प्रान ।
हुए क्या हाय मेरें राम भगवान् ।।
कहां हो राम हा प्रानो के प्यारें ।
यह क़ह दशरथ ज़ी सुरपुर सिधारें ।।
- भारतेंदु हरिश्चंद्र

यह भी पढ़े

इस प्रकार से भगवान श्री राम पर कविता | Poem On Lord Rama In Hindi से हम जीवन के प्रति नई प्रेरणा ले सकते हैं। साथ ही साथ उनके जीवन से एक नई दिशा मिल जाती है। 

भगवान श्री राम का जीवन तपस्या युक्त था, जहां पर उन्होंने पग पग पर तपस्या की और मानव जीवन को चरितार्थ किया है। 

जीवन में आने वाली विषम परिस्थितियों में भी उन्होंने सही तरीके से निर्णय लेते हुए दिशा बदली और यही सीख हमें उनकी कविताओं से प्राप्त होती है। 

ऐसे में हमें उनके जीवन से प्रेरणा लेते हुए आगे बढ़ना चाहिए और विषम परिस्थितियों में भी हार नहीं मानना चाहिए।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें