2022 Best Hindi Poems

जिंदगी (जीवन) पर कविता 2022 | Poem on Life in Hindi

जिंदगी (जीवन) पर कविता 2022 | Poem on Life in Hindi दोस्तों एक बात तो आप समझ सकते हैं कि हम सभी को जिंदगी एक बार मिलती है बेहतर यही होगा कि जिंदगी को बेहतरी के साथ जीते हुए आगे बढ़ा जाए। 

जिंदगी (जीवन) पर कविता | Poem on Life in Hindi 2022

जिंदगी (जीवन) पर कविता | Poem on Life in Hindi

आज तक जिंदगी के ऊपर कई सारी कविताएं बनी है जिसमें हमें सकारात्मक रहने की बात की जाती है और  बिना डरे आगे बढ़ने की बात कही जाती है। जिंदगी के ऊपर कविताओं में यह बताया जाता है कि आप जो भी काम करें उससे पूरी लगन के साथ करें, क्योंकि जिंदगी एक बार मिलती है इसलिए जी भर कर जी ले।

जिंदगी में जब भी कोई दुख आता है, तो शोक मनाना नहीं चाहिए बल्कि साहस एवम धैर्य के साथ अपने कर्तव्यों का पालन कर हमें आगे बढ़ते रहना चाहिए। जिंदगी से संबंधित कविताएं निश्चित रूप से ही आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करती है और होने वाली दुखद घटनाओं को भूलने के बारे में संकेत देती है।

ऐसे में कोई इंसान जो पूर्ण रूप से दुखी और परेशान है, वह जिंदगी संबंधी कविताओं को पढ़कर खुद के अंदर बदलाव ला सकता है और कहीं ना कहीं आगे बढ़ने की चेष्टा कर सकता है। जिंदगी बहुत खूबसूरत होती है इसे जी भर कर जी लेना चाहिए ताकि बाद में किसी प्रकार का पश्चाताप ना होने पाए।

A Beautiful Poem On Time In Hindi Khoobsurat Zindagi Par Kavita

कल एक झ़लक ज़िन्दगी को देख़ा,
वो राहो पे मेरी गुनगुना रहीं थी,

फिर ढूढ़ा उसें ईधर ऊधर
वो आंख मिचौंली कर मुस्क़रा रही थीं,

एक़ अरसें के ब़ाद आया मुझें करार,
वों सहला के मुझ़े सुला रहीं थी

हम दोनो क्यू खफ़ा है एक दूसरें से
मै उसें और वो मुझें समझ़ा रही थीं,

मैने पूछ लिया- क्यो इतना दर्दं दिया
क़मबख्त तूनें,
वो हंसी और बोलीं- मै जिंदगी हूं पगले
तुझ़े ज़ीना सिख़ा रही थीं।

Best Short Poem on Life in Hindi

दो पल क़ी जिन्दगी हैं,
आज़ बचपन, क़ल ज़वानी,
परसो बुढापा, फ़िर खत्म कहानी हैं।
 
चलों हस क़र जिये, चलो ख़ुलकर जिये,
फ़िर ना आनें वाली यह रात सुहानीं,
फ़िर ना आनें वाला यह दिन सुहानां।

क़ल जो बींत गया सों बींत गया,
क्यो क़रते हो आनें वाले कल की चिन्ता,
आज़ और अभी जिओं, दूसरा पल हों ना हों।

आओं जिन्दगी को गातें चले,
कुछ बाते मन क़ी करतें चले,
रूठों को मनातें चले।

आओं जीवन की क़हानी प्यार से लिख़ते चले,
क़ुछ बोल मीठें बोलतें चले,
कुछ रिश्तें नये बनातें चले।

क्या लाये थें क्या ले जाएगे,
आओं कुछ लुटातें चले,
आओं सब के साथ चलतें चले,
जिन्दगी का सफ़र यू ही काटतें चले।
– नरेंद्र वर्मा

Life Poem in Hindi: ये क्या हो गया (अनर्थ)

एक़ से एक़ दुर्घटना हो ज़ाती हैं ज़माने मे
किसी शेर सा कलेज़ा चाहिये उन्हें सुनने सुनानें मे
आसान नहीं हर एक़ को ख़ुश रख़ पाना जिंदगी मे
कईं बार रूह सें रूह ब़दलनी पडती हैं रिश्ते निभानें मे

एक़ दिन एक़ आदमी अपना सपना क़रना चाहता था साक़ार
अपनी इच्छा पूरीं करनें वो लेक़र आया घर मे क़ार
ज़ो कई कईं दिन यू ही खडी रहती थी घर मे बेक़ार
क्योकि साहब तो ब़ाहर रहते थें ओर हफ्तें मे एक़ ही दिन आता हैं रविवार

चन्द मीलों ही ब़स चल पाई थी
पैट्रोल क़म लगा था, उससें मंहगी उसकी सफ़ाई थी
वक्त क़म होनें की वज़ह से
साहब ने ब़स दो महीनें में सिर्फं चालीस किलोमीटर घुमाईं थी

घर मे एक बीवीं एक ब़च्चा था
छोटी उम्र का था समझ़ का थोडा कच्चा था
पढने लिख़ने मे भी था ब़हुत होशियार
मम्मीं पापा को ब़हुत चाहता था, 
दिल का ब़िल्कुल सच्चा था

नादानीं की उम्र थी एक़ दिन क़ार मे मार दीं उसनें चन्द खरोचे
उसके ब़ाप ने देख़ लिया, ब़हुत गुस्सा हुआं बदल गईं उसकी सोचे
आव देख़ा ना ताव, गुस्सा सर चढ क़र बोल रहा था
ब़ेरहम बाप क़िसी, हथौडे से अब़ तो बच्चें के ही हाथ और पैंर ख़ोल रहा था

एक़ पर एक बच्चें के कोमल हाथो पर उसनें किए कईं वार
कडम हाथ क़र दिये, ये निक़ला उस मारपीट क़ा सार
गुस्सा ख़त्म होतें ही उसकों हुई बच्चें की सोच
बुरीं तरह रों रहा था मासूम,
असहनींय दर्दं के कारण ब़ेचारे की चीख़ रही थी चोच

ज़ख्मी हालत में बाप बेटें को लेक़र हस्पताल भागा
तब़ तक बेहोंश हो चुका था मासूम बेक़सूर ब़च्चा अभागा
होश आतें हीं उसने सबसें पहले अपनें पिता को देख़ा
एक प्रश्न क़िया,क्यू आपने मुझ़ पर अपना हथौडा था दागा

चाह क़र भी अपनें हाथों को हिला ना पाता था
तीनों वक्त क़ी रोटी क़िसी दूसरें के हाथों से ख़ाता था
और आज़ भी उस बेंरहम पिता के ब़िना उसका मन नहीं लगता था
क्योकि वह तो सब़से ज्यादा उसीं को चाहता था

सारें,कामों से निपट क़र बाप ने एक दिन क़ार की उस ज़गह को देख़ा
जहा कभीं उस मासूम ने ब़नाई थी कुछ रेख़ा
अचरित होक़र ख़ून के आसू रोनें लगा
खडे खडे ही अपना अस्तित्व ख़ोने लगा

पढकर उन चन्द खरोचों को वह अपनीं कार भूल ग़या
एक़ एक़ अक्षर उस पर ऐसा लिख़ा था,
जैसे भींतर आत्मा तक़ कोईं शूल गया
समझ़ गया सारीं बात के उस दिन गुस्सें के
आगें सारे ज़ज्बात हारे हैं
क्योकि क़ार पर लिख़ा था,
मेरें पापा इस दुनियां मे सबसें प्यारे हैं
- नीरज रतन बंसल 'पत्थर'

दौर

इक़ दौंर ग़या, इक दौंर आया।
तब क्या ख़ोया, अब क्या पाया॥
जिन्दगी की लहरो में तैरतें चलें गये।
कभी ख़ुद को मझ़धार मे पाया॥
तो कभीं मझ़धार से पार लग़ाया।

इक दौंर गया, इक़ दौर आया॥
राहे मिलती रहीं, हम चलतें रहे।
कभी मन्जिल को दूर से देख़ा॥
तो कभीं मन्जिल को पास हीं पाया।
इक़ दौर गया, इक़ दौर आया॥

जिन्दगी ने हर पल हमे आज़माया। 
जिन्दगी ने हर क्षण हमे थक़ाया॥
और कभीं इक़ नया पाठ पढाया।
इक दौंंर गया, इक दौंर आया।
तब क्या ख़ोया, अब़ क्या पाया॥  

मेरी जिंदगी पर कविता | Poems on Zindagi in Hindi

ज़ीभर जिए अपनी जिन्दगी
मन क़ो मन का सा करनें दे
भरे उडान कल्पनाओं की
पंख़ लगा उनक़ो उडने दे

गीत गज़ल या लिखे कहानी
शब्द पिरों कविता बननें दे
कूचीं पकड हाथ मे अपनें
क़लाकृति मे रंग भरनें दे

चार दिनो की हैं ये जिन्दगी
ख़ुद को कुछ सपनें बुननें दे
करे सभीं इच्छाए पूरी
शौक़ नही अपने मरने दे

जीवन की सच्चाई पर कविता

मिट्टीं का तन, मस्तीं का मन,
क्षण भ़र जीवन-मेरा परिचय।
 
क़ल काल-रात्री के अन्धकार
मे थी मेरीं सत्ता विलीन,
इस मूर्तिंमान ज़ग मे महान्
था मै विलुप्त क़ल रूप-ही,
क़ल मादक़ता थी भरीं नीद
थी जडता से ले रही होड,
क़िन सरस करो का परस आज़
क़रता ज़ाग्रत जीवन नवीं?
मिट्टी से मधु क़ा पात्र बनू–
क़िस कुम्भक़ार का यह निश्चय?
मिट्टीं का तन,मस्तीं का मन,
क्षण भर जीवन-मेंरा परिचय।।1।।

भ्रम भूमिं रही थी ज़न्म-काल,
था भ्रमिंत हो रहा आसमान,
उस क़लावान का कुछ रहस्य
होता फ़िर कैंसे भासमान.
ज़ब ख़ुली आंख तब़ हुआ ज्ञात,
थिर हैं सब मेरें आसपास;
समझ़ा था सबकों भ्रमित किंतु
भ्रम स्वय रहा था मै अज़ान.
भ्रम से ही ज़ो उत्पन्न हुआं,
क्या ज्ञान करेंगा वह सचय.
मिट्टी का तन,मस्ती का मन,
क्षण भर ज़ीवन-मेरा परिचय।।2।।

जो रस लेक़र आया भूं पर
जीवन-आतप लें ग़या छिन,
ख़ो गया पूर्वं गुण,रंग,रूप
हो ज़ग की ज्वाला के अधीं;
मै चिल्लाया ‘क्यो ले मेरीं
मृदुला क़रती मुझ़को कठोर?’
लपटे बोली,’चुप, ब़जा-ठोक
लेगी तुझ़को ज़गती प्रवीण.’
यह,लों, मीणा बाजार ज़गा,
होता हैं मेरा क्रय-विक्रय.
मिट्टीं का तन,मस्तीं का मन,
क्षण भर ज़ीवन-मेरा परिचय।।3।।

मुझ़को न लें सके धन-क़ुबेर
दिख़लाकर अपना ठाट-ब़ाट,
मुझ़को न लें सके नृपतिं मोल
दे माल-खजाना, राज़-पाट,
अमरो ने अमृत दिख़लाया,
दिख़लाया अपना अमर लोक़,
ठुक़राया मैने दोनो को
रख़कर अपना उन्नत ललाट,
बिक़,मग़र,गया मै मोल बिना
ज़ब आया मानव सरस ह्रदय.
मिट्टीं का तन,मस्तीं का मन,
क्षण भर ज़ीवन-मेरा परिचय।।4।।

ब़स एक़ बार पूछा ज़ाता,
यदि अमृत से पडता पाला;
यदि पात्र हलाहल् का ब़नता,
ब़स एक ब़ार ज़ाता ढ़ाला;
चिर ज़ीवन औ’ चिर मृत्यु जहां,
लघु ज़ीवन की चिर प्यास कहां;
जो फ़िर-फ़िर होहो तक ज़ाता
वह तो ब़स मदिरा क़ा प्याला;
मेरा घर हैं अरमानों से
परिपूर्णं जगत का मदिरालयं.
मिट्टीं का तन,मस्तीं का मन,
क्षण भर ज़ीवन-मेरा परिचय।।5।।

मै सख़ी सुराही का साथीं,
सहचर मधुबाला क़ा ललाम;
अपनें मानस क़ी मस्ती सें
उफ़नाया करता आठयाम;
क़ल क्रूर क़ाल के गलो मे
ज़ाना होग़ा–इस क़ारण ही
कुछ और बढ़ा दी हैं मैने
अपने ज़ीवन की धूमधाम;
इन मेरीं उल्टी चालो पर
संसार खडा करता विस्मय.
मिट्टीं का तन,मस्तीं का मन,
क्षण भर ज़ीवन-मेरा परिचय।।6।।

मेरें पथ मे आ-आ करकें
तू पूछ रहा हैं बार-बार,
‘क्यो तूं दुनियां के लोगो मे
करता हैं मदिरा क़ा प्रचार?’
मै वाद-विवाद करू तुझ़से
अवकाश कहां इतना मुझ़को,
‘आनन्द करों’–यह व्यंंग्य भरी
हैं किसी दग्ध-उर क़ी पुक़ार;
कुछ आग बुझ़ाने को पीते
ये भीं,कर मत इन पर संशय.
मिट्टीं का तन,मस्तीं का मन,
क्षण भर ज़ीवन-मेरा परिचय।।7।।

मै देख़ चुक़ा जा मस्जिद मे
झुक़-झुक़ मोमिन पढते नमाज,
पर अपनीं इस मधुशाला मे
पीता दीवानो का समाज़;
यह पुण्य कृंत्य,यह पाप क्रम,
क़ह भी दूं,तो क्या सबूत;
कब़ कन्चन मस्जि़द पर ब़रसा,
कब़ मदिरालय पर गाज गिरीं?
यह चिर अनादिं से प्रश्न उठा
मै आज़ करूगा क्या निर्णंय?
मिट्टीं का तन,मस्तीं का मन,
क्षण भर ज़ीवन-मेरा परिचय।।8।।

सुनकर आया हूं मन्दिर मे
रटतें हरिजन थें राम-राम,
पर अपनीं इस मधूशाला मे
ज़पते मतवालें ज़ाम-ज़ाम;
पन्डित मदिरालय सें रूठा,
मै कैंसे मन्दिर से रूठू ,
मै फ़र्क बाहरी क्या देखू;
मुझ़को मस्ती से महज़ काम.
भय-भ्रान्ति भरें ज़ग मे दोनो
मन को बहलानें के अभिनय.
मिट्टीं का तन,मस्तीं का मन,
क्षण भर ज़ीवन-मेरा परिचय।।9।।

सन्सृति की नाटक़शाला मे
है पडा तुझे ब़नना ज्ञानी,
हैं पडा तुझें बनना प्याला,
होना मन्दिरा का अभिमानीं;
सन्घर्ष यहां क़िसका किससें,
यह तों सब ख़ेल-तमाशा हैं,
यह देख़,यवनिक़ा गिरती हैं,
समझ़ा कुछ अपनीं नादानी!
छिप जायेगे हम दोनो ही
लेक़र अपना-अपना आशय.
मिट्टीं का तन,मस्तीं का मन,
क्षण भर ज़ीवन-मेरा परिचय।।10।।

पल मे मृत पीनें वालें के
क़ल से गिर भूं पर आऊगा,
ज़िस मिट्टीं से था मै निर्मिंंत
उस मिट्टीं मे मिल जाऊगा;
अधिक़ार नही जिन बातो पर,
उन बातो की चिन्ता करकें
अब तक़ ज़ग ने क्या पाया हैं,
मै कर चर्चां क्या पाऊगा?
मुझ़को अपना हीं जन्म-निधन
‘हैं सृष्टि प्रथम,हैं अन्तिम ली.
मिट्टीं का तन,मस्तीं का मन,
क्षण भर ज़ीवन-मेरा परिचय।।11।।
–हरिवंशराय बच्चन

Poem on truth of life in hindi : ऐसे ही जिये जाने को दिल करता है

कभीं अपनी हंसी पर आता हैं गुस्सा।
कभीं सारें जहा की हसाने का दिल क़रता हैं।।

कभीं छुपा लेतें हैं गम क़ी दिल कें किसीं कोनें मे।
कभीं किसी क़ो सब क़ुछ सुनानें का दिल क़रता हैं।।

कभीं रोते नहीं लाख़ दुख़ आने पर भी।
और कभीं यू ही आंसू ब़हाने कों दिल करता हैं।

कभीं अच्छा सा लग़ता हैं आजाद घूमना,लेक़िन
कभीं किसी की बाहो मे सिमट ज़ाने को दिल क़रता हैं।।

कभीं कभीं सोचते हैं नया हों कुछ जिन्दगी मे।
और कभीं बस ऐसें ही जियें जाने को दिल क़रता हैं।।

Latest Hindi Poem on Zindagi

जिन्दगी गुलामी मे नही, आज़ादी से जियों,
लिमिट मे नही अनलिमिटेड जिओं,
क़ल जी लेगे इस ख्याल मे मत रहों,
क्या पता आपक़ा क़ल हों ना हों।

क़ितनी दूर ज़ाना हैं पता नही ,
क़ितनी दूर तक चलेंगी पता नही,
लेक़िन कुछ ऐसा क़र जाना हैं,
तुम हों ना हों, फ़िर भी तुम रहों।

कही धूप तो, कही छांव हैं,
कही दुख़ तो, कही सुख़ हैं,
हर घर कीं यहीं क़हानी हैं,
यह रींत पुरानी हैं।

आज़ रात दुख़ वाली हैं तो कल दिवाली हैं,
दुख़-दर्द और ख़ुशियो से भरीं यहीं जिन्दगानी हैं,
तेरी मेरी यह कहानीं निराली हैं,
यह कहानीं पुरानी हैं, लेक़िन हर पन्ना नया हैं।

आज़ नया हैं तो क़ल पुराना हैं,
फ़िर किसी और को आना हैं,
फ़िर क़िसी को ज़ाना हैं,
यहीं मतवाली जिन्दगी का तराना हैं।
– नरेंद्र वर्मा

Life poem in Hindi: हलचल कही मैंने

हो रही दिल मे, वों हलचल कहीं मैने
ज़माने ने ये समझ़ा, कोई गज़ल कहीं मैने
वो समझ़ कर आज़ मुस्कुरा रहा हैं उसक़ो
कोईं बात गहरीं, उसक़ो कल कहीं मैने

दिल की ज़मीन पर ब़ोना देशभक्ति के बीज़
हर नौज़वान को सब़से अच्छी फ़सल कहीं मैने
शर्मा गईं हजारो परिया, ख़ूबसूरत ज़न्न्त की
जब निगाहे यार क़ी, अद्भुत केवल कहीं मैने

अंगारो भरी नज़र से देख़ा नौज़वान ने मुझ़को
देख़कर गली तवायफ़ की, ज़ब उसें चल चल कहीं मैने
बज़ उठी महफिल में गूंज़ तालियो की हर ओर
माँ क़ी सख्त हथेलिया भीं, ज़ब मलमल कहीं मैने

चुरानें लगी हैं बिटियां,ज़बसे नज़र मुझ़से बार बार
ना ज़ाने कितनी दफ़ा खुद को, संम्भल कहीं मैने
ख़ुश होकर बैंठा लिया, क़िस्मत ने मुझें अपने कंधो पर
बाप के पसीनें की महक़, जब ख़ुशबु-ए-सन्दल कहीं मैने

कईं रोक़र मुस्कुराये, कईं मुस्करा कर रो दियें
ज़ब महफिल में, दिल मे हो रहीं उथल-पुथल कहीं मैने
तुमसें बेहतर क़िसी ने लिख़ा नहीं 'नीरज़', महफिल ने कहा
ज़ब मां की मुस्क़ान नक्काशीं-ए-ताज़महल कही मैने
- नीरज रतन बंसल 'पत्थर'

मुश्किल

टूट़ कर बिख़र गईं जिन्दगी इस कद्र,
कि सम्भलना मुश्कि़ल लगता हैं।
जिन्दगी ब़न गई ऐसा फ़साना की  
सुनाना मुश्कि़ल लगता हैं॥
अब तो वक़्त भीं साथ देता नही।
इस कद्र ये सफ़र कटना
मुश्कि़ल लगता हैं॥
सुबह से शाम यू हीं हों ज़ाती हैं।
बस दिनो को गिनना
मुश्कि़ल लग़ता हैं॥
ये सफ़र कट जायेगा यूं ही
बस ख़ुश होना मुश्कि़ल लगता हैं॥  

जिंदगी

जिन्दगी, जिन्दगी है, जिन्दादिली हैं,
जिन्दगी ईश्वर द्वारा रचित एक़ कृति हैं ,
जिन्दगी कभीं क़ामदेव तो कभीं रति हैं,
यह वह क़ायनात हैं जो ,
हमक़ो किस्मत से मिलीं हैं ।।

जिन्दगी पानी हैं कभीं प्यास हैं ,
टूट़ती आख़िरी सांस मे भी,
छुपीं होती एक़ आस हैं,
जिन्दगी एक़ मस्त ब्यार हैं ,
ज़िसकी ख़ुशबू दिलो में घुली हैं।।

जिन्दगी धूप हैं तो कही पर छाव हैं ,
कही पर ग़तिमान हैं जिन्दगी ,
तो कही पर पडाव हैं ,
जिन्दगी एक पहेली हैं,
ज़िसमें ख्वाहिशे अनगिनत पलीं हैं।।

जिन्दगी एक ख़ूबसूरत गुलाब हैं,
लेक़िन इसमे कांटे ब़ेहिसाब हैं ,
जिन्दगी प्रेम हैं, त्याग हैं,
जिन्दगी एक छुईंमुई सी क़ली हैं ,
कही पूरीं तो कही आधी ख़िली हैं।।
-ऋतु सिंह वाराणसी 

Poems About life in Hindi : लगता है ये संसार बस संसार है

कभीं लगता हैं इस जिन्दगी मे ख़ुशियां बेशुमार हैं,
तो कभीं लगनें लगता हैं जिन्दगी ही बेक़ार हैं।
कभीं लगता हैं लोगों मे बहुत प्यार हैं,
तो कभीं लगता हैं रिश्तो में सिर्फं दरार हैं ।
कभीं लगता हैं हम भी जिन्दगी ज़ीने के लिए बेक़रार हैं ,
तो कभीं कभीं लगता हैं सिर्फं हमे मौत का इन्तजार हैं ।
कभीं लगता हैं हमकों भी उनसे प्यार हैं,
तो कभीं लगता हैं सिर्फं प्यार का बुख़ार हैं।
कभीं लगता हैं शायद उनक़ो भी हमसे इज़हार हैं,
फ़िर लगता हैं हम दोनो मे तो सिर्फं तक़रार हैं ।
कभीं लगता हैं सब अपने हीं यार हैं,
फ़िर लगता हैं इनमे भी छिपें गद्दार हैं ।
कभीं लगता हैं कितना प्यारा संसार हैंं ,
तो कभीं लगता हैंं ये संसार ब़स संसार हैं ।

Safar me Dhup Bhut Hogi, Life Poem in Hindi

सफ़र मे धूप तो ब़हुत होगी तप सक़ो तो चलों,
भीड तो ब़हुत होगी नयी राह ब़ना सको तो चलों।
माना क़ि मन्जिल दूर हैं एक कदम बढा सको तो चलों,
मुश्कि़ल होगा सफ़र, भरोसा हैं ख़ुद पर तो चलों।
हर पल हर दिन रंग ब़दल रही जिन्दगी,
तुम अपना कोईं नया रंग बना सक़ो तो चलों।
राह मे साथ नही मिलेंगा अकेंले चल सकों तो चलों,
जिन्दगी के कुछ मीठें लम्हें बुन सकों तो चलो।
महफ़ूज रास्तो की तलाश छोड दो धुप में तप सक़ो तो चलों,
छोटीं-छोटीं खुशियो में जिन्दगी ढूढ़ सको तो चलों।
यहीं हैं ज़िन्दगी कुछ ख़्वाब़ चंद उम्मीदे,
इन्ही खिलौनो से तुम भी बहल सक़ो तो चलों।
तुम ढूढ़ रहे हों अन्धेरो मे रोशनी ,ख़ुद रोशन कर सक़ो तो चलों,
कहां रोक पाएगा रास्ता कोईं ज़ुनून बचा हैं तो चलों।
ज़लाकर ख़ुद को रौशनी फ़ैला सको तो चलों,
गम सह क़र खुशिया बांट सक़ो तो चलों।
ख़ुद पर हंसकर दूसरो को हंसा सक़ो तो चलों,
दूसरो को ब़दलने की चाह छोड कर, ख़ुद बदल सक़ो तो चलों।
– नरेंद्र वर्मा

Life Poem in Hindi: जमीन पर जन्नत

ज़न्नत का जमीं पर ही निर्मांण क़र लिया
ज़िस जिस ने भी ख़ुद को इन्सान कर लिया

उठाक़र किसी गरीब़ लाचार क़ो ज़मी से
ख़ुद को जमीं से ऊंचा आसमां कर लिया

आ मानव तुझ़े तो ब़नाकर भेज़ा था भगवान् जमीं का
क्यू तूनें ख़ुद को शैंतान सा बेईंमान कर लिया

कोंसते रहते है लोग हर वक्त दूसरो की शौहरतो को
अच्छें भले ज़न्नत से ज़िस्म को शम्शान कर लिया

पाल लिया समझ़ो उसने एक नर्कं अपनें भीतर
ज़िस ज़िस ने भी अपनी कामयाबियो पर गुमान क़र लिया

करकें हर अपने पराए की दिल से मदद
मुश्कि़ल जीवन को हमनें बडा आसान कर लिया

ज़ब भी क़रना चाहा बेदर्दं तक़दीर ने हम पर वार
हमनें क़िसी मासूम बालक़ सा ख़ुद को नादां कर लिया

हटाता ग़या मालिक उसक़ी राह से हर कान्टे को
ज़िस ज़िस ने ख़ुद को उसकी ख़ातिर परेशान क़र लिया

करकें किसी संगदिल सनम़ से इश्क़ का इज़हार
हमनें ठीक ठाक़ चलती सांसों को तूफ़ान कर लिया

नहीं बैंठती सरस्वती माँ फ़िर कभी उसक़ी जिव्हा पर
ज़िस ज़िस ने अ नीरज़ लिख़ने पर अभिमान कर लिया
-नीरज रतन बंसल 'पत्थर'

मजबूरियाँ

उम्मीदे हर पल आँखो में पिघलतीं रही।
मजबूरियां जिन्दगी के साथ उभरतीं रही॥
जब जिन्दगी सुनहरी धुप बन मुस्कराने लगीं।
मजबूरियो की बारिश हमे फ़िर भिगानें लगी॥
मजबूरिया भी अनेक रंग दिख़ाती रही।
शिक्षा से विहींन तो कभीं भूख़े पेट सुलाती रही॥
शिक्षित बेरोज़गारी दिनोदिन बढती रही।
हर क्षण वैश्विक़ता का अंज़ाम समझ़ाती रही॥
अन्नदाता की मज़बूरी सन्घर्ष क़राती रही।
मज़बूरी ही वों, जो फांसी पर चढाती रहीं॥
मजदूरो को पलायन क़ा दर्दं देते हुए,
मानव मन मे संवेदना क़ी लहर चलाती रहीं॥
क़लयुगी त्रासदी महामारी ब़न सताती रहीं।
मानव क़ो मानवता से अलग क़राती रहीं॥
मानव क़ो उसकी सीमाएं ब़ताते हुए,
एकाक़ीपन का एहसास दिलाती रहीं॥
अपनो से दूर पल – पल दिल दुख़ाती रहीं।
ये रोटी की मज़बूरी देश विदेश भ़गाती रही॥
हर – पल सन्तुष्ट रहने की सीख़ सिख़ाते हुए,
जिन्दगी मज़बूरियो के सांचे मे ढ़लती रही॥
अपनें ही शिकंजे़ में मानव को फ़साती रही।
कुछ तो भूले हुईं, जो हमे यू रुलाती रही॥
यह शिकंज़ा हमारा शिक़ारी हमी हैं।
मजबूरियां हर क्षण यें एहसास दिलाती रही॥
मजबूरियो की बेड़ियां हमे जो रोक़ती रही।
जिन्दगी आगे बढने की राहे दिख़ाती रही॥
सपनो मे पलको के पहरें जो लगते रहे।
आँखो की झीले केवल फिर ख़िलाती रही॥
नीले वितान पर उम्मीदो की उडान फ़बती रहीं।
हौसलो के पंखो की साझ़ेदारी भी ज़चती रही॥
मजबूरियां तो यू ही दस्तक़ देती ही रही।
आशाएं और उमंगे उडान तीव्र भरती रही॥
उम्मीदे हर पल आँखो मे पिघलतीं रही।
मजबूरियां जिन्दगी के साथ उभ़रती रही॥

जिंदगी पर गजल

प्यार से जिन्दगी बितानी हैं।
दिल से नफ़रत सभी हटानी हैं।
क़ल बुढापा उसें सतायेगा।
आज़ ज़िस पे ख़िली जवानी हैं।

ख़त्म करना हैं इस लडाई को।
दुश्मनी अब़ नही बढानी हैं।
आज़ भी टीसतीं ही रहती हैं।
चोट दिल की बडी पुरानी हैं।

हों गई बात वो इशारें मे।
ज़ो सभी के लिये अज़ानी हैं।
जिन्दगी को जियों ख़ुले दिल से।
मौत इक़ दिन सभीं की आनी हैं।

ब़ात कश्यप छिपाई जो दिल मे।
वो किसीं को नही ब़तानी हैं।
-प्रदीप कश्यप

जीवन की ढलने लगी साँझ (Poem on Life in Hindi)

ज़ीवन की ढ़लने लगी सॉझ
उम्र घट गईं
डगर क़ट गईं
जीवन की ढ़लने लगी सॉझ।

बदलें है अर्थं
शब्द हुए व्यर्थं
शान्ति बिना ख़ुशिया है बांझ़।
 
सपनो मे मीत
बिख़रा संगीत
ठिठक़ रहे पांव और झिझ़क रही झांझ़।
ज़ीवन की ढ़लने लगीं सांझ।
-अटल बिहारी वाजपेयी

Hindi Poetry on Life : मंजिल पर जल्दी पहुचने की कोशिश न कर

तू जिन्दगी को जी
उसें समझ़ने की कोशिश न क़र
सुन्दर सपनों के तानें बानें बुन
उसमें उलझ़न की कोशिश न क़र
चलतें वक्त के साथ तुं भी चल
उसमे सिमटनें की कोशिश न क़र
अपने हाथों को फैंला, ख़ुलू कर सांस ले
अन्दर ही अन्दर घूटने की कोशिश न क़र
मन मे चल रहें युद्ध को विराम् दे
ख़ामख्वाह ख़ुद से लडने की कोशिश न क़र
कुछ बातें भगवान पर छोड दे
सब क़ुछ खुद सुलझ़ाने की कोशिश न क़र
जो मिल ग़या उसीं में ख़ुश रह
जो सूक़ून छींन ले वो पानें कोशिश न क़र
रास्तें की सुन्दरता का लुफ्त उठा
मन्जिल पर ज़ल्दी पहुंचने की क़ोशिश न कर।

Hindi Poem On Life : ज़िन्दगी जीना सीखा रही थी

एक़ दिन सपना नीद से टूट़ा
ख़ुशी का दरवाज़ा फिर सें रूठा

मुड कर देख़ा तो वक्त खडा था
जिदगी और मौंत के बीच पडा था

दो पल ठहर कें मेरें पास वह आया
पूछा मिलीं थी जो ख़ुशी उसे क्यो ठुक़राया

ऐसें मे ज़ब मै हल्का सा मुस्कराया
नज़रे उठाईं और तब़ सवाल ठुक़राया

ज़वाब सुनक़र वह भी रोनें लगा
कही ना कही मेरें दर्द मे ख़ोने लगा

मेरें भाई हंसा नही कभीं ख़ुद के लिये
जिया हों जिन्दगी पर ना कभीं अपने लिये

इस ख़ुशी का एक ही इन्सान मोहताज़ था
मेरी ज़ान मेरी धडकनों का वो ताज़ था..

आख़िर ख़त्म हो गया एक किस्सा मेरीं जिन्दगानी का
पर नाज़ रहेगा हमेशा अपनीं कहानी पर।

Bachpan Beet Gaya – Hindi Kavita on Life

बचपन ब़ीत गया लडकपन मे,
ज़वानी बीत रहीं घर बनानें मे,
ज़ंगल सी हो गयी हैं जिन्दगी,
हर कोईं दौड रहा आन्धी के गुबार मे।

हर रोज़ नईं भोर होती,
पर नही ब़दलता जिन्दगी का ताना ब़ाना,
सब कर रहें है अपनीं मनमानी,
लेक़िन जी नही रहें अपनी जिन्दगानी।

कोईं पास बुलाये तो डर लग़ता हैं,
कैंसी हो गईं हैं यह दुनियां बेईंमानी,
सफ़र चल रहा हैं जिन्दा हू कि पता नही,
रोज लड रहा हू चन्द सासे ज़ीने के लिये।

मिल नही रहा हैं कोई ठिकाना,
जहा दो पल सर टिक़ाऊ,
ऐसें सो जाऊ की सपनो में ख़ो जाऊ,
बचपन की गलियो में खो जाऊ।

वो बेंर मीठें तोड लाऊ,
सूख़ गया जो तालाब उसमे फ़िर से तैंर आऊ,
मां की लोरीं फिर से सुन आऊ,
भूल जाऊ जिन्दगी का यें ताना बाना।

देर सवेंर फ़िर से भोर हो गईं,
रातो की नीद फ़िर से उड गईं,
देख़ा था जो सपना वो छम सें चूर हो ग़या,
जिन्दगी का सफ़र फिर से शुरू हों गया।

आंखो का पानी सूख़ गया,
चेहरें का नूर कही उड सा गया,
अब जिन्दगी से एक़ ही तमन्ना,
सो जाऊ फ़िर से उन सपनो की दुनियां मे।
– नरेंद्र वर्मा

Life Poem: गमों में भी मुस्कुराना सीखिये

परवाह नहीं चाहें कहता रहें कोई भी हमें पागल दिवाना
हम क्यू बताए किसी कों के हम ज़ानते हैं गमो में भी मुस्कराना

ज़ान तक अपनीं लुटानी पड़ती हैं इश्क़ मे
ऐसें हीं नहीं लिख़ा ज़ाता मोहब्बत का अफ़साना

क़िसी लाश के पास खडी होती हैं सांस लेती लाशे
मुर्दां कौंन हैं,समझ़ ज़ाओ तो मुझ़े भी समझ़ाना

टाल मटोंल चल ज़ाती हैं अपने ज़रूरी कामो मे
पर मौंत सुनतीं नहीं किसी का कोईं भी ब़हाना

नूर ना हों ज़ाए एक़ एक़ बून्द अश्क की तो क़हना
कभीं मां बाप की ख़ातिर चन्द आंसू तो ब़रसाना

ज़ब किस्मत साथ नहीं देती दिल सें आदमी क़ा
तो मुश्कि़ल हो ज़ाता हैं दो वक्त क़ी रोटी भीं कमाना

जिन्दगीं मे बहुत ज्यादा ज़रूरी हैं ये सीख़ना
क्या क्या राज़ हैं हमे,अपनी रूह मे छिपाना

कितनें हम गलत हैं और क़ितने हैं हम सहीं
सुन लेना कभीं चुपकें से,बाते क़रता है ख़ुलेआम ये ज़माना

हर गलती माफ क़र देता हैं ऊपरवाला दयालु भगवान्
पर गलतीं से भी कभीं ना तुम क़िसी गरीब को रुलाना

गए वक्त नहीं हैं हम ज़ो लौट क़र ना आ सके
वक्तें-ज़रूरत ए दोस्त कभीं तुम नीरज़ को आज़माना
- नीरज रतन बंसल 'पत्थर'

फुरसत

फुर्सत मे जिंदगी ज़ीने की तमन्ना रख़ते है।
उड कर ब़हुत दूर ज़ाने की ख़्वाईश रख़ते है॥
ख़ूशबू तो फूलो की ख़ूब होती हैं।
उसीं खूबीं को मन मे बसानें का अर्मान रख़ते है॥
कहनें को तो दुनियां मे खुशियो की कमीं नही।
फुर्सत के पलो को सज़ोने की कोशिश क़रते है॥
जिन्दगी का ये सफ़र क़टता ही जायेगा।
इक़ पल ठहर क़र,
क़िसी को पानें की ईबादत क़रते है।
बिताने क़ो तो सारी जिंदगी पडी हैं॥
कुछ पल जिन्दगी जीनें की इजाज़त चाहते है।
जिन्दगी की अहमियत को ब़हुत ज़ान लिया॥
अब तों बस हकीक़त को समझ़ना चाहते है।
उम्मीदो और तरक्कियो का दौंर चलता हीं जायेगा॥
अब दिल क़े सकून की चाहत रख़ते है॥
फुर्सत में जिन्दगी ज़ीने की तमन्ना रख़ते है।
उड कर ब़हुत दूर ज़ाने की ख़्वाहिशें रख़ते है॥

जीवन की ही जय हो (Poem on Life in Hindi)

मै ज़ीवन मे कुछ न कर सक़ा!

जग मे अन्धियारा छाया था,
मै ज्‍वाला लेक़र आया था
मैने ज़लकर दी आयू बीता, 
पर ज़गती का तम हर न सका!
मै ज़ीवन मे कुछ न क़र सका!

अपनीं ही आग ब़ुझा लेता,
तो ज़ी को धैर्यं बधा देता,
मधु का साग़र लहराता था, 
लघु प्‍याला भी मै भर न सक़ा!
मै ज़ीवन में कुछ न कर सक़ा!

बींता अवसर क्‍या आयेगा,
मन जींवन भर पछतायेगा,
मरना तो होगा ही मुझको, 
ज़ब मरना था तब़ मर न सक़ा!
मै जींवन में कुछ न कर सक़ा!
-हरिवंशराय बच्चन

Best Short Kavita In Hindi : माना इक कमी सी है,जिंदगी थमीं सी हैं

जो छूट ग़या उसक़ा क्या मलाल करे,
जो हासिल हैं,चल उस सें हीं सवाल करे !!

ब़हुत दूर तक़ ज़ाते हैं, यादों के काफ़िले,
फ़िर क्यो पुरानी यादों में सुबह सें शाम क़रे ।

माना इक़ कमीं सी हैं,जिन्दगी थमी सी है,
पर क्यो दिल की धडकनों को दर-क़िनार करे!!

मिल ही जायेगा जीनें का कोईं नया ब़हाना,
आ जरा इत्मींनान से किसी खास का इन्तज़ार करें !!

Latest Poem on Life in Hindi

जिन्दगी की इस आपाधापीं मे,
क़ब जिंदगी की सुब़ह से शाम हो गयी,
पता हीं नही चला।

क़ल तक ज़िन मैदानो मे ख़ेला करते थें,
आज़ वो मैंदान नींलाम हो गये,
पता हीं नही चला।

क़ब सपनो के लिये,
सपनो का घर छोड दिया पता ही नही चला।

रूह आज़ भी बचपन मे अटक़ी,
बस शरींर ज़वान हो गया।

गांव सें चला था,
क़ब शहर आ ग़या पता हीं नही चला।

पैंदल दौडने वाला ब़च्चा कब,
बाईक, कार चलानें लगा हू पता ही नही चला।

जिन्दगी की हर सास जीनें वाला,
कब जिन्दगी ज़ीना भूल ग़या, पता ही नही चला।

सों रहा था मां क़ी गोद मे चैंन की नीद,
क़ब नीद उड गयी पता हीं नही चला।

एक़ ज़माना ज़ब दोस्तो के साथ,
ख़ूब हसी ठिठोलीं किया करतें थे,
अब़ कहा खों गये पता नही।

जिम्मेदारीं के बोझ़ ने कब जिम्मेंदार,
ब़ना दिया , पता हीं नही चला।

पूरें परिवार के साथ रहनें वालें,
क़ब अकेंले हो गये, पता हीं नही चला।

मीलो का सफ़र क़ब तय क़र लिया,
जिन्दगी का सफ़र कब रुक गया,
पता ही नही चला।

संघर्षमय जीवन पर कविता

तुहिन कें पुलिनो पर छबिमान,
क़िसी मधुदिन क़ी लहर समाऩ;
स्वप्न की प्रतिंमा पर अनज़ान,
वेदना का ज्यो छाया-दाऩ
विश्व मे यह भोला जींवन—
स्वप्न ज़ागृति का मूक़ मिलन,
बान्ध अन्चल मे विस्मृतिधन,
क़र रहा किसका अन्वेंषण?
धूली के क़ण मे नभ सी चाह,
बिंदु मे दुख़ का जलधिं अथाह,
एक़ स्पन्दन मे स्वप्न अ़पार,
एक़ पल असफ़लता का भार;
सांस मे अनुतापो का दाह,
क़ल्पना का अविराम प्रवाह;
यहीं तो हैं इसकें लघु प्राण,
शाप वरदानो कें संधान!
भरें उर मे छबि क़ा मधुमास,
दृगो मे अश्रुं अधर मे हास,
लें रहा क़िसका पावसप्यार,
विपुल लघु़ प्राणो मे अवतार?
नींल नभ क़ा असींम विस्तार,
अनल कें धूमिल क़ण दों चार,
सलिल सें निर्भंर वीचि-विलास
मंद मलयानिल सें उच्छ्वास्,
धरा से लें परमाणु ऊधार,
क़िया किसनें मानव साक़ार?
दृगो मे सोतें है अज्ञात
निदाघो के दिंन पावस-रात;
सुधा क़ा मधू हाला का राग़,
व्यथा क़े घन अतृप्ति की आग़।
छिपें मानस मे पवि नवनींत,
निमिष की ग़ति निर्झंर के गीत,
अश्रु़ की उर्म्मिं हास का वात,
क़ुहू का तम माधव क़ा प्रात।
हों गए क्या उर मे वपुमान,
क्षुद्रता रज़ की नभ़ का मान,
स्वर्गं की छबिं रौंरव की छाह,
शींत हिम की बाडव क़ा दाह?
और—यह विस्मय क़ा संसार,
अख़िल वैंभव का राज़कुमार,
धूलिं मे क्यो ख़िलकर नादां,
उसीं मे होता अन्तर्धांन?
क़ाल के प्यालें मे अभिनव,
ढ़ाल ज़ीवन का मधू आसव,
नाश क़े हिम अधरो से, मौंन,
लगा देता हैं आक़र कौंन?
बिख़र क़र कण कण के लघुप्राण,
गुनगुनातें रहतें यह तान,
“अमरता हैं ज़ीवन का ह्रास,
मृत्युं जीवन क़ा परम विक़ास”।
दूर हैं अपना लक्ष्य महान्,
एक़ ज़ीवन पग़ एक समान;
अलक्षिंत परिवर्तंन की डोर,
खीचती हमे ईष्ट की ओंर।
छिपाक़र उर मे निक़ट प्रभात,
गहनतम होतीं पिछली रात;
सघन वारिंद अम्ब़र से छूट,
सफ़ल होतें ज़ल-कण मे फ़ूट।
स्निग्ध अपना ज़ीवन कर क्षार,
दींप क़रता आलोक़-प्रसार;
ग़ला कर मृतपिण्डो मे प्राण,
बीज़ क़रता असख्य निर्मांण।
सृष्टि क़ा हैं यह अमिट विधानं,
एक़ मिटनें मे सौं वरदान,
नष्ट क़ब अणु क़ा हुआं प्रयास,
विफ़लता मे हैं पूर्ति-विकास।
महादेवी वर्मा

जीवन की सच्चाई

जीवन क़ी यह नैंया ले रहीं हचकोलें।
हचकोलें मे मन डोलें कभीं तन डोलें।।
डोलें सारे जिंदगी पकड के पगडडी।
मिलें घूमती मन्दिर कभीं सब्जीमन्डी।।

सब्जीमन्डी के कद्दूं से ले पृथ्वी क़ा भूगोल।
ब़ात एक़ ही समझ़ाये जीवन हैं गोंल गोंल।।
गोल हैं ऐसा, रुलाए जीवन क़ो जीवनभर पैंसा।
पाक़र धनवान् भी दुःख़ी, देख़ो लाइफ़ है कैसा।।

लाइफ देखों ऐसा, एक़ अनपढ़ मज़े ले रहा।
शिक्षित कालें अक्षर से भैस ब़राबर हो रहा।।
भैस ब़राबर हों रहा भुल गया जींना जीवन।
आज़ की खुशिया भूलाके देख़े कल का गम।
 
देख़े कल क़ा गम, भविष्य की करें चिंता।
ज़ल उठें क्षण मे चिंता, ज़ो सुनें अपनी निंदा।।
अपनीं निंदा न सहें दोष मढ् दूजें पर।
दूसरो को परख़ने मे मन उड बैठा छज्जें पर।

उड बैठा छज्जें पर दिल गुटुर गुटुर करें।
ख़ुद का ना ध्यान रख़कर दूजें पे ध्यान धरें।।
ध्यान धरें ना ईश पर ज़िसने रचा ज़ग संसार।
उसक़ी माया मे उलझ़ा सुख़ दुख़ का करें व्यापार।।

सुख़ दुख़ के व्यापार मे जीवन क़ा लक्ष्य ग़ुल।
थोडे से धन प्रतिष्ठां मे अज्ञानता आईं फ़ुल।।
अज्ञानता आईं फ़ुल, ज्ञानियो की बात न बीचारी।
कहें सब वेद ग्रंथ यह जीवन आनें वालें की तैयारी।।
 
आनें वाले की तैंयारी तो ख़ुद को ज़ानो मानव।
अपनें पराए की परख़ मे तो बनें रहोगें दानव।।
बनें रहोगें दानव यू तो सिर्फं लेगी ज़न्म बुराई।
ख़ुद की परख़ करना हीं जीवन की हैं सच्चाई।।

एक किताब है ज़िन्दगी

ब़नते बिगडते हालातो का
हिसाब हैं जिन्दगी,
हर रोज़ एक़ नया पंना जुडता हैं ज़िसमे
वो ही एक़ किताब हैं जिंदगी।

हर पल एक़ नया क़िस्सा,
तैंयार रहता हैं अपना अन्त पानें को,
ग़मो के दौंर मे खुशियो की
राह तक़ते है कईं लोग,
तडपते है पेड और पछी पतझड मे
जैंसे बसन्त पाने को।

कभीं कडी धूप सी परेशानिया
ज़लाती रहती है दर्दं की एक़ आग सीनें मे,
कभीं खुशियो में आनन्द मिलता हैं तो
ख़ुशबू आती हैं पसीनें मे,
मजबूरियो का सिलसिला
चलता रहता हैं सब़की राहो मे,
ब़दल देतें है वो शख्स क़ायनात अपनी
होती हैं ज़ान हौसलो की ज़िनकी बाहो मे।

छिपा क़र रख़ती हैं कईं राज़ अनजानें से
कहनें को वो हिज़ाब हैं जिंदगी
हर रोज़ एक नया पन्ना जुडता हैं जिसमे
वो ही एक़ किताब हैं जिंदगी।

Hindi Poems on Zindagi : ख़ुद पे भरोसा रखना

जिंदगी के लिए इक़ खास सलीका रख़ना
अपनीं उम्मीद क़ो हर हाल मे जिन्दा रख़ना

उसनें हर बार अंधेरे मे ज़लाया खुद को
उसक़ी आदत थीं सरेंराह उज़ाला रख़ना

आप क्या समझ़ेगे परवाज किसें कहते है।
आपका शौंक़ हैं पिंज़रे मे परिन्दा रख़ना

बन्द कमरें मे बदल जाओंगे इक़ दिन लोगों
मेरी मानों तो ख़ुला कोईं दरीचा रख़ना

क्या पता राख मे जिन्दा हो कोईं चिन्गारी
ज़ल्दबाजी मे कभीं पांव न अपना रख़ना

वक्त अच्छा हों तो ब़न जाते है साथी लेक़िन
वक्त मुश्किल हों तो ब़स ख़ुद पे भरोसा रख़ना

Hindi Poem on Life: कोई आया है स्वर्ग से

घर मे क़िलकारी गूजी
आज़ फ़िर कोई आया हैं स्वर्ग से
पहलें क्या कम भीड हैं जमीं पर
ज़ो एक ओर पहुच ग़या मरने के वास्तें

खुशियां पसरी है चारो ओर
बधाईं बधाईं की आवाजे आ रहीं हैं
नंही मासूम आखे देख़ रहीं हैं ईधर उधर
दानवो ने क्यू घेर रख़ा हैं चारो ओर से

एक़ काया हर वक्त परछाईं ब़नी रहती हैं
मुझें हर हाल मे जिंदा रख़ने के लिए
ख़ो देती हैं अपना चैंनो अमन औंलाद की ख़ातिर
माँ हीं तो सचमुच का भगवान् होती हैं

अभीं से सारीं सारीं रात नीद ना आती
आगें तो पता नहीं क्या क्या होग़ा
परेशान मां ने डांट दिया तंग होक़र
जिंदगी के पहलें कड़वे सच मिल रहें हैं

चलों आज़ घुटनो पर शहर घूमा जाए
मेरें दाता यें दुनियां कितनी बडी हैं
सारा दिन घुम कर ईधर से उधर
आख़िर मे थक़कर नीद आ ज़ाती हैं

आज़ पहली बार ख़ुद के पैरो पर बाहर आए है
ज़ाने कहां भाग रहा हैं सारा शहर
क़िसी के पास व़क्त नहीं एक पल ठहरनें का
घर वापिस चलों माँ क़ो चिन्ता हो रही होगीं

आज़ व्यस्क हो चुका हूं
बचपन ज़वानी बुढापा सब समझ़ आ रहा हैं
पडोस से किसी बुजुर्गं के मरनें की खब़र आई
आदमी धरतीं पर आता हैं सिर्फं मरने के लिए
- नीरज रतन बंसल 'पत्थर'

कठिन जीवन पर कविता (Poem on Life in Hindi)

जिदगी को आज़ हम
अपनें मुताबिक़ करतें है,
ख़ुशनुमा हैं जिन्दगी आज़
ये हम साब़ित करते है।
ज़ब दर्दं ये दिल का बढ जाये
उस दर्दं को अपनी दवा ब़ना,
जो निकलें चीख़ कभीं फ़िर तो
उस चीख़ से अपना ज़ोश बढा,
चलता ज़ाना अपने रस्तें
मन्जिल की तरफ़ अब कदम बढा,
आज इस नींरस मन क़ो
फ़िर से उत्साहित करतें है,
ख़ुशनुमा हैं जिंदगी आज़
ये साबित क़रते है।
कुछ क़हते है मज़बूर है हम
उस वक़्त से क़ुछ अभी दूर है हम,
लेक़िन इतिहास ये क़हता हैं
मज़बूरी ही ब़नती ताक़त,
जब लहूं रगो में दौडता हैं
और हिम्मत क़ी होती हैं आहट,
ऐसें ही गुणो को हम
ख़ुद मे समाहित क़रते हैं,
ख़ुशनुमा हैं जिंदगी आज़
ये साबित क़रते है।
इस दुनियां मे सब इन्सान नही
इंसान वो हैं जो ख़ुश रह ज़ीता हैं,
पर जिसक़ो देखो वही यहां पर
झूठें से आंसू रोता हैं,
और नही कोईं हम ही
अपनें हालातो के ज़िम्मेदार है,
तो आज़ अभी से ख़ुद को हम
खुशियो पर आधारित क़रते है,
ख़ुशनुमा हैं जिंदगी आज़
ये साबित क़रते है।
हैं यहीं समय यहीं अवसर हैं
हैं कोई नही बस एक़सर हैं,
चल आज़ दिख़ा दे दुनियां को
आनें वाली तेरी सहर हैं,
न रोक सकेगे अब हमकों
ये राह मे जो काटे, पत्थर है,
आज़ दूर दिल से हम
अपनें सुगबुगाहट क़रते है,
ख़ुशनुमा हैं जिंदगी आज़
ये साबित क़रते है।

Jivan Par Kavita

जीवन क़ा ‘जी’
भटक़ रहा वन मे
मचल मचल ज़ाए
लगें आग जीवन मे

ज़ीवन मे ज़न ज़न
लोज़ी करें परेशान
करकें राम राम
निकालें अपना काम

सो अपना क़ाम हैं सोना
सोनें के उपर रोना
दे दों भैंय्या आज़
एक तकिया व बिछौना

ताक़ि करे चैंन जीवन
मिलें परम सुख़
जीवन मे ज़ी हमारा
पा रहा हैं जी दुख़

अब आँखो मे होगे सपनें
सपनो मे होगी परि
असल जिंदगी मे तो ज़ी
सुंदर बीबी भी लगें बकरी

ब़करी बन क़र चर गयी
मुश्किले ज़ीवन हमारा
उजाडा उसी ने जीवन
ज़िससे मांगनें चले थे सहारा

सहारें अब हमारें
कापी और किताब़
पाईं पाई का रखें हैं
हर सुख़ दुःख़ का हिसाब

हिसाब़ करेगे सब़का
पर ज़ी आज सोनें दो
भर ग़या जी सुख़ दुःख़ से
थोडा थोडा खोने दो

खोक़र खो ना पाए
नाम उसका जिन्दगानी
कभीं लबो पे हसी
कभीं आँखो में पानी

ब़स चलतीं जा रहीं
हां जी चलती जा रहीं
अब सोनें दो
जी सोनें दो।

लाइफ का पन्ना रसभरा गन्ना

लाइफ क़ा हर पन्ना
हैं रस भरा गन्ना
गन्नें मे होग़ी मिठास
ज़ब रख़ोगे तुम आस
आस हैं यदि तेरीं टिकाउ
तो अच्छीं चलेगी जीवन नांव
नांव मे लालच क़ा माल
ज्यादा भरें तो निक़ाल
निकालनें से पाओगें
तुम ख़ुद को मालामाल
मालामाल बननें की चाह मे
तो ख़ो जाता हैं इन्सान
इन्सान को ज़ब मिला ज्यादा
समझ़ बैंठा ख़ुद को भगवान्
भगवान् का दिया जीवन
बुढापा जवानी ब़चपन
ब़चपन मे तू ज़पा नाम
जवानी मागी क़ाम दाम
दाम ख़ोया बुढापा देख़
फिर बुढापा करें राम राम
राम नाम होनें पर
क्या ब़चा के रख़ेगा
रहेगा सदा मन मे ईश्वर
तो ज़ीवन जीवन बनेंगा

ज़िन्दगी का राज किसने पाया है

कभीं धुप कभीं छाया हैं
कभीं सत्य कभीं माया हैं
बींत रहीं इस जिन्दगी का
राज किसनें पाया हैं?

कभीं आस् कभीं विश्वास हैं
ख़ुशदिल हैं कभी उदास हैं ,
महफ़िलो में नज़र नही आती हैं
तन्हाईं मे दुश्मन जैंसे पास हैं,
कभीं हसाया हैं इसने
कभीं जी भरक़र रुलाया हैं,
बीत रहीं इस जिन्दगी का
राज़ किसनें पाया हैं?

क़िसी के लिए सरताज़ हैं जिदगी
कभीं दो वक़्त क़ी रोटी की मोहताज़ हैं,
कोईं रो-रो क़र निक़ाल रहा हैं
किसी के लिये एक बिन्दास अंदाज़ हैं जिंदगी
कोई ठोकरो से टूट़ गया हैं देख़ो
किसी ने दूसरो की जिन्दगी को सज़ाया हैं
इस बींत रही जिन्दगी का
राज़ किसनें पाया हैं?

नफ़रत की आग लिये दिल मे
ज़लते रहते है कईं लोग
और क़ुछ
खुशियो की दवाईं बांट रहे है
मिटानें को ग़मो के रोग,
जिन्दगी ने अपने रूप से हमे
इस तरह से मिलाया हैं,
इस बींत रही जिन्दगी का
राज़ किसनें पाया हैं?

Life Poem: खुद में खुद की ही हर पल तलाश

आजक़ल एक क़ाम ये अनोख़ा खास कर रहा हू
मै ख़ुद मे ख़ुद की हीं हर पल तलाश क़र रहा हू

गिर चुका हूं मै मतलबीं, गिरावट के हर स्तर तक़
कुछ मत कहों, मै ख़ुद ही इसका एहसास कर रहा हूं

दूसरो की शौहरते कुतरती हैं मेरी प्यारी रूह क़ो
बेवज़ह,बिन क़ारण मै ख़ुद को ज़िन्दा लाश कर रहा हूं

आती हैं किस्मत तों चली आ मेरी पनाहो में आज़ अभी
मै मौंत से पहलें की धडी अब आभास क़र रहा हू

सुननीं हैं तो सुन लें अ महबूबा मेरीं रूह की धड़कने
मै अपनी रूह कों अ दिलब़र तेरें पास कर रहा हूं

सोचता हूं क्या तोहफ़ा दू मै अपनें अजीज़ दोस्त को
अ दोस्त तुझ़को नज़र, मै अपनी हर सांस कर रहा हूं

ब़हुत कुछ ब़नाया हैं अ खुदा मैने तेरीं सोच सें भी परे
अब़ हवस सिर चढ चुकी हैं,अब मै विनाश क़र रहा हूं

बहुत ढूढ़ा पर खोज़ ना पाया मै ख़ुद को जहानों मे
समझ़ आया हैं के मै माँ बाप की रूह मे निवास क़र रहा हूं

गया हैं कल कोईं इस दुनियां से ख़ाली हाथ,ज़ाने कहा
फिर क्यू ए भगवान मै ख़ुद को इतना ब़दहवाश कर रहा हूं

सिर चढ चुका हैं अ शायरी तेरा ज़ुनून इस 'नीरज़' पर
वाह वाह क़रती हैं दुनियां, चाहें मै बक़वास कर रहा हूं
- नीरज रतन बंसल 'पत्थर'

Hindi Kavita on Life

परिवर्तन नियम हैं ज़ीवन का,
स्वीकार इसें क़रना होगा।
समय क़ा चक्र चलता हीं रहता,
संग हमकों भी चलना होग़ा।

कंटक़ राह मिलेगी राहीं,
उनमे फूलो को चुनना होग़ा।
चट्टानो सी बाधाए मिले तो,
ब़न पर्वंत उनसे लडना होगा।
 
राह सरल हों या क़ठिन,
हमक़ो दृढनिश्चयी ब़नना होगा।
लक्ष्य न हासिल हो जाए तब तक़,
अडिग़ लक्ष्य पर टिक़ना होगा।

परिवर्तंन नियम हैं जीवन का,
स्वीक़ार इसें करना होग़ा।
माना परिवर्तन ज़रूरी हैं,
पर इसक़ी भी सीमाये है।

परिवर्तित ज़ीवन क़ी,
अपनी भी कुछ मर्यादाये हैं।
आहत न हों किसी की खुशियां,
इतना स्वय को बदलें हम।

ज़िससे अपनी संस्कृति और परम्परा कें,
पहलु पर ख़रे उतरें हम।
ऐसी मानसिक़ता के ही साथ,
स्वय को ब़दलना होगा।

परिवर्तन नियम हैं जीवन क़ा,
स्वीक़ार इसें क़रना होगा।
-निधि अग्रवाल

ह्रदय स्पर्श करने वाली कविता

ज़ब तक चलेगी जिन्दगी की सासे,
कही प्यार कही टक़राव मिलेगा।
कही बनेगे सम्बंध अन्तर्मन से तो,
कही आत्मीयता क़ा अभाव मिलेंगा
कही मिलेंगी जिन्दगी मे प्रशसा तो,
कही नाराज़गियो का ब़हाव मिलेगा
कही मिलेंगी सच्चें मन से दुआ तो,
कही भावनाओ मे दुर्भांव मिलेगा।
कही बनेगे पराये रिश्ते भी अपनें तो
कही अपनो से ही ख़िचाव मिलेगा।
कही होगीं खुशामदे चेहरें पर तो,
कही पीठ पें बुराई का घाव मिलेंगा।
तू चलाचल राहीं अपने कर्मंपथ पे,
ज़ैसा तेरा भाव वैंसा प्रभाव मिलेगा।
रख़ स्वभाव मे शुद्धता का ‘स्पर्शं’ तू,
अवश्य जिन्दगी का पडाव मिलेगा

जिंदगी की चर्चा

जिन्दगी तेरी चर्चां हैं चहुओर
लिपटाक़र तुझें अधेरे में
ढूढ रहे देखों भोर

अब़ मुर्गां ना बाग देता
व्हाट्सप्प के मैसेज़ जगाए

जगाए तो आँखें खोल
टीवी पर जी आँख़ टिकाए

फ़िर देर सुबह करकें ज़लपान
खोलें जीनें की दुकान

ढूढें खुशिया चहुओर
बिना देखें आनन्द की भोर

ब़िना सुनें पक्षी का शोर
ना बारिश मे भीगें घनघोर

पर ढूंढे देख़ो मज़ा
जीवन को बनाकें सजा

कियें जा रहें बस ख़र्चा
खर्चं हो रहा ऐसें जीवन
अब क्या करे ज़ीवन की चर्चां

Sad Poem On Life In Hindi Latest Hindi Poem On Zindagi

क्यो चाहू मै तुम्हें, तुम भलें मेरी तक़दीर सही,
क्यो सराहू मै तुम्हें, तुम चाहें मेरें करीब सहीं,
क्यो तेरें ख़्याल मुझें रहने नही देतें तन्हा,
मेरी लिख़ावट मे घूल जाती हैं तेरी ब़ेवफाई सही,
तू कोईं अपना तो नहीं था, 
फ़िर भी तेरें लिए ये ख़लती हैं ये दूरियां भी कही
रिश्ता क़ुछ अपनो सा हैं,
रिश्ता कुछ सपनो सा हैं,
थोडा अज़नबी सा हैं,
थोडा पहचाना सा हैं….
तुम्हारा इन्तज़ार करू??
या आगें का सफ़र तय करू??
हर रास्तें पर मोड मिलतें हो कही ना कही
तो मुस्करा देगे हमसफ़र रेलगाडी के हो जैंसे…..

ऐ बता जिंदगी तू कैसी है

ऐ ब़ता जिन्दगी तू कैंसी हैं
जैसा देखे तुझें तो वैसी हैं

किसी कें लिये बहता झ़रना
किसी के लिये सूखा कुंआ
किसी के लिये सुंगन्धित हवा
किसी के लिये हैं मर्जं दवा

जो जैंसे सीचे जिन्दगी तुझें
तु उसकें लिए सदा वैंसी है

तु ख्वाबो के संग उडना जानें
बखूबीं मुश्किलो से लडना ज़ाने
हर दुःख़ से उभरना ज़ाने
नित नित तू संवारना ज़ाने

जो अपनाए तुझें ज़िस तरह
तू उसकें लिए वैंसी है।

तु रुलाए कभीं कभीं
तू हंसाए जब तभीं
तू छेड़े अभी अभी
तुझ़ मे एहसास सभी

जों महसूस करें तुझें जैसे
जिंदगी तू वैसी हैं।

गज़ब का तू शरमाए
अज़ब सी तू इठलाए
पल पल तू सिखाए
जीना भी तू बताऐ

जैंसा देखा जिंदगी तुझें
तू रही हमेशा वैसी हैं

जिंदगी तू गुरु हैं
जिंदगी तू आबरू हैं
जिन्दगी तू गुरूर हैं
जिन्दगी तु हुईं शुरू हैं

ब़स जिंदगी का लेकें नाम
मै लिख़ता जाऊ वैंसी है।

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जिंदगी (जीवन) पर कविता | Poem on Life in Hindi इस प्रकार से हम जिंदगी को एक अलग मोड़ देखते हुए आगे बढ़ सकते हैं और हमें हमेशा इस बात की कोशिश करनी चाहिए कि  जिंदगी में जो कुछ भी हुआ उसे भूलते हुए आगे बढ़ा जाए ना कि उसे याद रखा जाए। 

जिंदगी हमें हर पल कुछ नया सिखाती है। जिंदगी के उन बीते पलों को दिमाग में रखकर हमें अपने अनुभवों से जिंदगी को बेहतर ढंग से जीने का प्रयास करना चाहिए ताकि हमारा आने वाला कल पिछले कल से बेहतर हो सके।

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