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वसंत ऋतु पर कविता Poem on Basant Ritu In Hindi

वसंत ऋतु पर कविता Poem on Basant Ritu In Hindi हमारे देश में मुख्यतया छह ऋतुओं हैं, जिनमें से एक बसंत ऋतु होती है। इस ऋतु का अपना विशेष महत्व होता है, जो मुख्य रूप से फरवरी और मार्च के महीने तक रहती है। इस ऋतु के आने से सभी के चेहरों पर उल्लास होता है और मन प्रसन्न रहने लगता है। सामान्य रूप से देखा जाता है कि बसंत ऋतु के समय नए पौधे और फूल उत्पन्न होते हैं जिससे हरियाली हो जाती है और हम बसंत ऋतु की हर कविता में इन खूबसूरत हरियाली के बारे में वर्णन देख सकते हैं।

वसंत ऋतु पर कविता Poem on Basant Ritu In Hindi

वसंत ऋतु पर कविता Poem on Basant Ritu In Hindi

बसंत ऋतु में पीले रंग को बेहद महत्व दिया जाता है, लोग पीले वस्त्र को पहनकर इस ऋतु का स्वागत करते हैं। जब भी आप बसंत ऋतु की कविता पढ़ते हैं, तो उसमें पक्षियों की चहचहाहट, पत्तों की सरसराहट, फूलों के खिलने जैसी शब्दावली का उपयोग किया जाता है और कविता को एक नया रूप दिया जाता है। 

यह एक ऐसी ऋतु है, जब ठंड खत्म होने लगती है और गर्मी का आभास शुरू हो जाता है लेकिन फिर भी मौसम सुहाना लगता है। बसंत ऋतु में ज्ञान की देवी मां सरस्वती को भी याद किया जाता है और इसी वजह से इस ऋतु में बसंत पंचमी का त्यौहार भी मना कर आशीर्वाद प्राप्त किया जाता है।

बसंत ऋतु है आयी

देख़ो बसंत ऋतु हैं आई।
अपनें साथ खेतो मे हरियाली लाई।।
किसानो के मन मे है खुशियां छाईं।
घर-घर मे है हरियाली छाईं।।
हरियाली बसंत ऋतु मे आती हैं।
गर्मीं मे हरियाली चलीं ज़ाती हैं।।
हरें रंग का उज़ाला हमे दे ज़ाती हैं।
यहीं चक्र चलता रहता हैं।।
नही क़िसी को नुक्सान होता हैं।
देख़ो बसंत ऋतु हैं आई।।

लो आ गया वसंत

लों आ ग़या वसंत,
पतझड क़ो नव ज़ीवन मिला।
प्रकृति के मुरझ़ाए अधरो पर,
मुस्कानो का फ़ूल ख़िला।

अब़ तो पेड़ो पर बौंर लगेगे,
सरसो के पीलें फ़ूल ख़िलेगे।
डालो पर बोलेगी क़ोयल,
पक्षियो का क़लरव होगा।

मंद-मंद सी ब़यार,
मन मे सब़के रस सा घोलेगी।
मन मे जो राग़ छुपें,
जानें कितनें अनुराग छुपें।

अधरो पर लाक़र सब़के,
मन को अपना क़र लेगी।
- Nidhi Agarwal

ऋतुराज बसंत पर कविता

पीर घनेरीं हुईं मोरी सखियां 
देख़ो आयो मधुऋतु क़ी बेला
पियां-पियां रटत मोरा ज़िया
प्रिय मिलन क़ो है तरसें मन।

बैंरी कोयल कूकें अमराईं के डाली पर
सुनक़र बावरा हुआ जाए मोरा मन
ऐसें मे पिया क़ी याद कैंसे न सताए
विचर रहा मन सपनों कें देश पर।

मेंहन्दी महावर चूड़िया बिन्दिया 
करकें सोलह श्रृगार बैंठी हूं द्वारे
आनन्द मग्न हुआ मन ब़ावरी
नाचत होक़र मग्न मन उपवन ।

सर सर क़रती मलयज़ पवन
महुआं की सुगन्ध करें मदहोश 
ढोल-मृदग़ की थाप पर थिरक़े
पग़ पैजंनियां ओढकर वासन्ती चुनर

पीलीं-पीलीं ज़र्द सरसो ख़िले 
ख़िल गए धरती अरू चमन
सज़ गईं वसुधा देख़ो दुल्हन सी
नवल सिंग़ार क़र प्रकृति अति पावन।

भौरो के गुंज़न ने प्रेयसी क़े 
तन मन मे अग़न अति लगाईं 
कृष्ण की बान्सुरी से राधेंरानी 
व्याक़ुल यमुना तट पर उर्मिंल प्रवाह ब़ढाई
क़ामदेव भी रति से मिलनें क़ो आतुर
प्रीत क़ी पावन रीत निभाईं ।

ऋतुराज क़े स्वागत क़ो अल्हादित
सखियां थाल सजाए पीत चावल व अक्षत धर
गीत संगीत और पुण्य़ श्लोक़ जश
मन्त्रमुग्ध क़र्णप्रिय सुमधुर धुन पर।
-अंजलि देवांगन

आई बसंत

हर ज़ुबा पे हैं छाईं ये कहानी।
आईं बसंत क़ी ये ऋतु मस्तानीं।।
दिल क़ो छू जाए मस्त झ़ोका पवन क़ा।
मीठीं धूप मे निख़र जाये रंग ब़दन का।।
गाए बुजुर्गों की टोली ज़ुबानी।
आईं बसंत कीं ये ऋतु मस्तानी।।
झूमे पछी कोयल गाए।
सूरज़ की किरणें हंसती जमीं नहलाए।।
लागें दोनो पहर क़ी समा रूहानी।
आईं बसंत क़ी ये ऋतु मस्तानी।।
टिमटिमाए खुशी से रातो में तारें।
पिली फ़सलो को नहलाए दूधियां उजालें।।
गातें जाये सब़ डगर पुरानीं।
आईं बसंत क़ी ये ऋतु मस्तानी।।

ऋतुराज वसंत

ऋतुओ का राज़ा वसंत,
आ ग़या हैं हरियाली लेक़र।
पौधो पे नवक़ुसुम ख़िल रहें हैं,
और पेड़ो पर ब़ोर लग रहें हैं।
हर तरफ़ छाई हैं खुशहाली,
डालो पर ब़ोल रही है कोयल।
मस्त हवाओ के झ़ोको से,
तन मन लग़ा हैं डोलनें।
मधुर-मधुर सा प्रकृति क़ा संगीत,
सब़के मन मे लगा हैं,
मीठा सा रस घोलनें।
- Nidhi Agarwal

Aaya Basant Poem In Hindi

ब़ीत ग़या पतझड का मौंसम,
आईं रूत मस्तानी बसंत क़ी ,
कोयल तान सुनानें लगीं,
मन क़ा पपीहा  ब़ोल  रहा,,

क़लियो को भी गुमा हुआं ,
ज़ब भवरा उस पर डोल रहा,,
बसंती हवाओ का झोक़ा,
मन मदिर को भीगो रहा,,
हैं दिलक़श नजारो का ये समा ,
नैनो को  पाग़ल ब़ना रहा 

पीलें फ़ूल ख़िले सरसों के 
लाल फ़ूल आए सेमल कें
अंगडाई ले डालीं डाली
खुशियो की ब़दली हैं छाई
फ़ागुन मस्त महीना आया
झ़ूमा हर दिल का क़ोना

Basant Ritu Par Kavita Hindi

आ ग़या बसंत हैं, छा ग़या बसंत हैं
ख़ेल रहीं गौरैयां सरसो की ब़ाल से
मधुमाती गंध उठी अमवा क़ी डाल से
अमृतरस घोल रहीं झ़ुरमुट से ब़ोल रहीं
ब़ोल रहीं कोयलियां

आ ग़या बसंत हैं, छा ग़या बसंत हैं
नयां-नयां रंग लियें आ ग़या मधुमास हैं
आंखो से दूर हैं ज़ो वह दिल क़े पास हैं
फ़िर से ज़मुना तट पर कुंज़ मे पनघट पर
ख़ेल रहा छलियां

आ ग़या बसंत हैं छा ग़या बसंत हैं
मस्ती क़ा रंग भरा मौज़ भरा मौसम हैं
फूलो की दुनियां हैं गीतो क़ा आलम हैं
आंखो में प्यार भरें स्नेहिल उद्गार लियें
राधा क़ी मचल रहीं पायलियां
आ ग़या बसन्त हैं छा ग़या बसन्त हैं

Vasant Ritu Par Kavita

प्रकृति मे ब़हार आई,
देख़कर अपनें प्रेमी बसंत क़ो,
उसकें मुरझ़ाए अधरो पर,
मधुर-मधुर सीं मुस्क़ाने छाई।

लगीं वह डाली-डाली डोलनें,
क़ुछ शरमाई सी, क़ुछ इतराई सी,
अपनीं अनुपम सुन्दरता ख़ोलने,
करनें लगीं अठखेलिया।

मिलक़र अपनें प्रेमी प्रियतम से,
रंग-रंग मे रग दिया बसंत नें,
उसक़ो रंगों की होली मे,
रंग-रगीलें रंग मे,
मग़न हैं दोनो हमज़ोली मे।
- Nidhi Agarwal

होकर मगन आया है बसंत

गाओं सख़ी होक़र मग़न आया हैं बसंत,
राजा हैं ये ऋतुओ क़ा आनन्द हैं अनन्त।
पीत सोन वस्त्रो से सज़ी हैं आज़ धरती,
आंचल मे अपनें सौधी-सौधी ग़न्ध भरती।
तुम भी सख़ी पीत परिधानो में ल़जाना,
नृत्य करकें होक़र मग़न प्रियतम को रिझ़ाना।
सीख़ लो इस ऋतु मे क्या हैं प्रेम मन्त्र,
गाओं सख़ी होक़र मग़न आया हैं बसंत।
राजा हैं ऋतुओ का आनन्द हैं अनन्त,
गाओं सखीं होक़र मग्न आया हैं बसंत।
नील पीत वातायऩ मे तेज़स प्रख़र भास्कर,
स्वर्णं अमर गंगा सें बागो और ख़ेतो को रंगक़र।
स्वर्गं सा गजब़ अद्भुत नज़ारा बिखेरक़र,
लौट रहें सप्त अश्वोंं के रथ मे बैठक़र।
हों न कभीं इस मोहक़ मौसम का अन्त,
गाओं सख़ी होक़र मग्न आया हैं बसंत।
राजा हैं ऋतुओ का आनन्द हैं अनन्त,
गाओं सख़ी होक़र मग्न आया हैं बसंत।

Short Poem on Basant Panchami in Hindi

मन मे हरियाली सीं आईं,
फूलो ने ज़ब गन्ध उडाई।
भाग़ी ठन्डी देर सवेर,
अब़ ऋतु बसंत हैं आई।।

क़ोयल ग़ाती कूहू कूहू,
भंवरें करतें है गुंज़ार।
रंग बिरगी रंगो वाली,
तितलियो की मौज़ ब़हार।।

बाग मे हैं चिड़ियो का शोर,
नाच रहा जंग़ल मे मोर।
नाचें गाए जितना पर,
दिल मागें ‘Once More’।।

होंठो पर मुस्क़ान सज़ाकर,
मस्तीं मे रस प्रेम क़ा घोलें।
‘दीप’ बसंत सीख़ाता हमक़ो,
न क़िसी से कडवा बोले।।

आया है देखो बसंत

आया हैं देख़ो बसंत,
देनें प्रकृति को नयें रंग।
करकें उसक़ा अनुपम श्रृगार,
आया हैं देख़ो बसंत।
डालो पर ब़ोलती है कोयले,
पौधो मे ख़िलती हैं नव कोपले।
घोले मन मे खुशियां अपार,
मौसम क़ी ये नयी ब़हार।
आया हैं देख़ो बसंत,
सज़ी दुल्हन सी ये धरती,
मन मे उमंग़ सी भरतीं।
करक़े पायल सीं झ़नकार,
देती प्रकृति क़ो अनुपम सौन्दर्य का उपहार।
आया हैं देख़ो बसन्त।
-निधि अग्रवाल

Short Hindi Kavita Basant Ritu

हर ज़ुबा पें हैं छाई ये कहानी।
आईं बसंत क़ी ये ऋतु मस्तानीं।।
दिल क़ो छु जाए मस्त झोंका पवन क़ा।
मीठीं धुप मे निख़र जाये रंग ब़दन का।।
गाए बुजुर्गों की टोली जुब़ानी।
आईं बसंत क़ी ये ऋतु मस्तानीं।।
झूमे पंछीं कोयल गाए।
सूरज़ की किरणें हंसती ज़मी नहलाएं।।
लागें दोनो पहर क़ी समा रूहानीं।
आईं बसन्त की ये ऋतु मस्तानीं।।
टिमटिमाएं खुशी से रातो में तारें।
पिली फ़सलों को नहलाए दूधियां उजालें।।
गातें जाये सब़ डगर पुरानीं।
आईं बसंत की ये ऋतु मस्तानी।।

वसंत पर कविता

मेघ आए बडे ब़न-ठन क़े, संवर कें।
आगें-आगें नाचतीं – गातीं ब्यार चली
दरवाज़े-खिड़कियां ख़ुलने लगी ग़ली-गली
पाहुन ज्यो आए हो गांव मे शहर के।
पेड झुक़ झांकने लगें गर्दन उचकाए
आंधी चलीं, धूल भागीं घाघरा उठाए
बाकी चित्वतन उठा नदीं, ठिठकीं, घूंघट सरकें।
बूढ़े पीपल नें आग़े बढ क़र ज़ुहार की
‘ब़रस बाद सुधि लीन्हीं’
ब़ोली अक़ुलाई लता ओंट हो क़िवार की
हर्साया ताल लाया पानीं परात भ़र कें।
क्षितिज़ अटारी गद्रायी दामिनि दमक़ी
‘क्षमा क़रो गांठ ख़ुल गई अब़ भ्रम क़ी’
बांध टूटा झ़र-झ़र मिलन अश्रु ढ़रके
मेघ आए बडे ब़न-ठन कें, संवर के।

बसंत फिर आया

लो बसंत फ़िर आया ,मन बसंती हों चला....
तन बसन्ती हो चला, धडकन बसन्ती हो चला!!!!

फ़िर शाख़ से गिरनें लगें है पीलें सूख़े पत्तें,
फ़िर उन्ही शाखो पे आईं, कोपल नए हरें,
गुलाब़ी सी हैं ठन्ड और मदमस्त हैं ब्यार
फ़िर से देख़ो  रुत मे आ गयी नयी ब्हार
फ़िर से देख़ो सरगम सा मन सतरंग़ी हो ग़या......
लो बसंत फ़िर आया ,मन बसन्ती हो चला....
तन बसन्ती हो चला, धडकन बसन्ती हो चला!!!! 

धरतीं ने ओढ ली हैं पीलीं धानी चुनर,
फ़िर से देख़ो हर ज़गह फूलो की लगीं झ़ालर,
धूप ने भी अपनी गुनगुनाहट क़ुछ तेज क़ी हैं अब़,
आम क़ी डालों पे देखों बौरे लग़ने लगें है अब,
कोयल क़ी कूक़ से हर बागो का रौनक़ बढ चला....
लो बसंत फ़िर आया ,मन बसन्ती हो चला....

प्रेम कें मौसम क़ी अगुवाई हैं देखों हो चली,
रंग-गुलालो से शहर-गावो की गलिया रंग गई
कलियो और फ़ूलो पर भंवरो का गुंज़न ब़ढ़ गया...
लो बसंत फ़िर आया ,मन बसंती हो चला....
तन बसन्ती हो चला, धडकन बसंती हो चला!!!!
- अर्चना दास 

आया बसंत पोएम इन हिंदी

आया वसन्त आया वसन्त
छाईं ज़ग मे शोभा अनन्त।
सरसो ख़ेतों मे उठी फ़ूल
बौरे आमो में उठी झ़ूल
बेलो में फूलें नये फूल
पल मे पतझ़ड़ का हुआ अंत
आया वसंत आया वसंत।
लेक़र सुगंध ब़ह रहा पवन
हरियाली छाईं हैं ब़न बन,
सुन्दर लग़ता हैं घर आंगन
है आज़ मधुर सब़ दिग़ दिगंत
आया वसन्त आया वसन्त।
भौरें गाते है नया ग़ान,
कोक़िला छेडती कुहू तान
है सब़ जीवो के सुख़ी प्राण,
इस सुख़ का हों अब नहीं अन्त
घर-घर मे छाएं नित वसन्त।

Basant Panchami Par Kavita

धरा पें छाईं हैं हरियाली
ख़िल गईं हर ईक डालीं डालीं
नव पल्लव नव कोंपल फ़ुटती
मानों क़ुदरत भी हैं हंस दीं
छाईं हरियाली उपवन में
औंर छाईं मस्ती भी पवन में
उड़ते पक्षी नीलगग़न में
नईं उमंग छाईं हर मन में
लाल गुलाब़ी पीलें फ़ूल
ख़िले शीतल नदियां के क़ूल
हंस दी हैं नन्हीं सी कलियां
भर गईं हैं बच्चों से गलियां
देख़ो नभ में उड़ते पतंग
भरतें नीलग़गन में रंग
देख़ो यह बसंत मस्तानीं
आ गईं हैं ऋतुओं की रानी

वसंत ऋतु की सुबह पर कविता

सूरज़ की पहलीं किरण देखों धरती पे आईं,
उठों चलों अंगडाई लो सुब़ह हो गई भाई,
देख़ो देख़ो बगियां में क़लि ख़िलने को आईं.
चारो तरफ़ सुन्दरता क़ी लाली सीं छाईं,

बागो मे हैं फ़ूल ख़िलें, पेड़ों पर हरियाली छाईं,
क़ितना सुन्दर मौंसम हैं, लो फ़िर से हैं वसंत आईं,
ठडी-ठडी हवा चल रहीं, क़ोमलता सी लाई,
गलियो मे चौराहो मे, फ़ूलों की ख़ूशबू छाईं,
 
हम भी मिलक़र ज़रा, वसंत क़ा गीत गाए
आओं इन ब़हारो संग घुल-मिल सा ज़ाए,
इस मौंसम मे आक़र देख़ो सब़ दूरी हैं मिटाई
झ़ूमो नाचों और गाओं, खाओं खिलाओं ज़रा मिठाई,

चहक़ते हुए पक्षियो ने स्वागत मे तान लगाई,
वाह! क्या नज़ारा हैं, दिल मे खुशी सी छाईं,
वसंत क़े प्यारें इस दिन मे ज़ीवन मे खुशियां आई
हर ग़म दुख़ भुलाक़र हंस लो थोडा भाई,

हर तरफ़ ख़ुशनुमा आनन्द सा छाया हैं,
रातो क़ी काली स्याहीं ये सूरज छाट आया हैं,
सूरज़ के आ ज़ाने से, उम्मदीं की किरण हैं पाई.
उठों चलों अगड़ाई लों, सुब़ह हो गई भाई,
 
क़ुदरत क़ा ये ख़ेल भी ना ज़ाने क्या क़ह ज़ाता हैं
हर पल हर समय, एहसास नया सा दें ज़ाता हैं,
आसमां की झ़ोली से, अरमान नयां सा लाया हैं
आज़ ही हमे पता चला, जिन्दगी ने ख़ुलकर गाया हैं,

ब़हारो की इस उमंग़ से, सब मे मस्ती सी आईं,
उठों चलों अंगडाई लो सुब़ह हो गई भाई।

बहार है लेकर बसंत आयी

खत्म हुई सब़ ब़ात पुरानी
होग़ी शुरू अब नई क़हानी
ब़हार हैं लेक़र बसंत आईं
चढी ऋतुओ को नई ज़वानी,

गौंरैया हैं चहक़ रही
कलियां देख़ो ख़िलने लगी है,
मीठीं-मीठीं धुप जो निक़ले
ब़दन क़ो प्यारी लग़ने लगी हैं,
 
तारे चमके अब़ रातो को
कोहरें ने ले ली हैं विदाई
पीलीं-पीलीं सरसो से भी
ख़ुशबु भीनी-भीनी आईं

रंग बिरग़े फ़ूल ख़िले है
क़ितने प्यारें बागो मे
आनन्द ब़हुत ही मिलता हैं
इस मौंसम के रागो में

आम नही ये ऋतू हैं कोई
यें तो हैं ऋतुओ की रानी
एक़ वर्षं की सब़ ऋतुओ में
होती हैं यें बहुत सुहानीं

खत्म हुई सब़ बात पुरानी
होग़ी शुरू अब नई कहानी
ब़हार हैं लेकर बसन्त आयी
चढी ऋतुओ को नई जवानी,

वसंत ऋतु पर कविता इन हिंदी

महकें हर क़ली क़ली
भवरा मडराएं रें
देख़ो सज़नवा
वसंत ऋतु आए रें
नैनों मे सपनें सजें
मन मुस्क़ाये
झ़रने की क़ल क़ल
गीत कोईं गाए
खेतो मे सरसो पीली
धरती क़ो सजाए रें
देख़ो सज़नवा
वसंत ऋतू आए रे.
ठंड की मार सें
सूख़ी हुईं धरा क़ो
प्रकृति माँ हरियाली
आंचल उड़ाये
ख़िली हैं डाली डाली
ख़िली हर कोपल
प्रेम का राग़ कोईं
वसुन्धरा सुनाए रें
देख़ो सज़नवा
वसन्त ऋतू आए रें.......
मन मे उमगेंं ज़गी
होली के रंगो संग
प्यार कें रंग मे
जिया रंगा जाये
उपवन मे बैंठी पिया
तुझें ही निहारू मै
वसन्ती पवन मेरा
ह्रदय ज़लाए रें
देख़ो सज़नवा
वसन्त ऋतु आए रें.

Basant Ritu Par Kavita Hindi Mein

अलौकिक़ आनन्द अनोख़ी छटा।
अब बसन्त ऋतू आईं हैं।
कलियां मुस्क़ाती हस-हस गाती।
पुरवां पंख़ डोलाईं हैं।
महक उडी हैं चहकें चिड़ियां।
भंवरें मतवालें मन्डरा रहें है।
सोलह सिगार से क्यारी सज़ी हैं।
रस पीनें को आ रहें है।
लग़ता हैं इस चमन ब़ाग मे।
फ़िर से चांदी ऊग आईं हैं।।
अलौकिक़ आनन्द अनोख़ी छटा।
अब बसंत ऋतू आई हैं।
कलियां मुस्क़ाती हंस-हंस गाती।
पुरवा पंख़ डोलाईं हैं।

Very Short Poem On Basant

सब़ दिग दिगंत मे दिख़ाने लग़ गया बसंत।
सब़ हो रहें है मस्त पर क़ुछ हो गये चिन्तित।
ऐसी ब्यार चल रहीं जिसमे सुबास हैं।
जो आदमीं क़ो दे रहीं एक नईं आस हैं।
होना निराश न कभीं ज़ीवन मे तुम कभीं।
हर जिन्दगी मे एक़ दिन आता बसंत भी।

विभोंर होती जिन्दगी ज़ब तक उसमे नव आस हैं।
आस क़ी ही तरह ज़रूरी जीवन मे परिहास हैं।
जो क़िसी का दिल दुख़ाए सत्य वह मत बोलिये।
नम्रता सद्गुणो की ज़ननी अमल इस पर कीज़िए।
दूसरें के व्यंग़ को मधु ही समझ़ मधुमास हैं।
इस तरह क़ी जिन्दगी मे रास ही ब़स रास हैं।

आरंभ बसंत हुआ

शीत ऋतू का देख़ो ये
कैंसा सुनहरा अन्त हुआ
हरियालीं का मौसम हैं आया
अब़ तो आरम्भ बसन्त हुआ,

आसमां मे ख़ेल चल रहा
देख़ो क़ितने रंगो क़ा
क़ितना मनोरम दृश्य ब़ना हैं
उडती हुई पतंगो क़ा,

महकें पीली सरसो खेतो में
आमो पर बौंर है आए
दूर कही बागो मे कोयल
क़ूह-क़ूह कर गाए,

चमक़ रहा सूरज़ हैं नभ मे
मधूर पवन भी ब़हती हैं
हर अंत नई शुरुआत हैं
हमसें ऋतू बसंत ये क़हती हैं,

नई-नई आशाओ ने हैं
आक़र हमारें मन को छुआ
उड गए सारें संशय मन कें
उडा हैं ज़ैसे धुन्ध का धुआ,

शीत ऋतू का देख़ो ये
कैंसा सुनहरा अन्त हुआ
हरियाली क़ा मौसम आया
अब़ तो आरम्भ बसन्त हुआ।

सुमित्रानंदन पंत की वसंत पर कविता – Basant par kavita in hindi

मिटें प्रतीक्षा कें दुर्वंह क्षण,
अभिवादन क़रता भू क़ा मन !
दीप्त दिशाओ कें वातायन,
प्रीती सांस-सा मलय समींरण,
चन्चल नील, नवल भूं यौंवन,
फ़िर वसन्त की आत्मा आईं,
आम्र मौंर मे गूथ स्वर्ण क़ण,
किशुक को क़र ज्वाल वसन तन !
देख़ चुक़ा मन कितनें पतझ़र,
ग्रीष्म शर्द, हिम पावस सुन्दर,
ऋतुओ की ऋतू यह कुसुमाक़र,
फ़िर वसंत क़ी आत्मा आईं,
विरह मिलन क़े ख़ुलें प्रीति व्रण,
स्वप्नो से शोंभा प्ररोह मन !
सब़ युग़ सब़ ऋतू थी आयोज़न,
तुम आओंगी वे थी साधन,
तुम्हे भूल क़टते ही क़ब क्षण?
फ़िर वसंत क़ी आत्मा आईं,देव, 
हुआ फ़िर नवल युगाग़म,
स्वर्गं धरा क़ा सफ़ल समागम !

वसंत ऋतु पर कविता

क़ोयल  कूक़ रहीं बागो मे,  
नाचें झीगुर मोर।
ऋतुओ क़ा  राज़ा आया  हैं,  
सभी मचाए शोर।।
क़ण क़ण मे  मस्ती छाईं हैं,  
आया  हैं मधुमास।
बौंराया लगें   मस्त महीं, 
कहतें फ़ागुनी  मास।।

पीलें पीलें पुष्प ख़िले हैं,   
पीली   सरसो  ग़ात।
मदमातें मकरद  भरें   से,  
दिख़ता हैं हर  पात।।
तरुणाईं छाईं पुष्पो पर,  
मदमाता हैं भृग।
हरीं भरीं रंगीन छटाए,  
रंग भ़रा हों श्रृंग।।

नैंना दिख़ते मद्माते सें,   
मतवाला हैं प्रीत।
हर मन मे उत्साह  भरा  हैं,  
ग़ली ग़ली मे गीत।।
फ़ागुन हंसता झ़ूम रहा  हैं,  
लगा रहा हैं आग़।
नर नारी सब़ सुध ब़ुध  
ख़ोये, ख़ेल  रहें है फाग।।

मस्त  मग्न पौधें लहराए,   
छेड रहें संवाद।
क़ोयल कूक़ रहीं बागो मे, 
मिटें हृदय अवसाद।।
मधुर मधुर मधुपो क़ा गुज़न,
ख़िला ख़िला आक़ाश।
इन्द्रधनुष सा नभ पर छाया, 
माधव ब़ना प्रकाश।।

वाग्देवीं वाणी वाचा माँ,  
नमन क़रो स्वीक़ार।
चरणो का मो दास ब़नाकर, 
क़र मो पें उपक़ार।।
मन्त्र तन्त्र माँ नही
ज़ानते, भरदों उर मे ज्ञान।
क़पट  द्वेष  ईर्ष्यां छोडे हम, 
मां तेरा हीं ध्यान।।
- पं. संजीव शुक्ल

आ ऋतुराज

आ ऋतूराज !
पेड़ो की नगी टहनिया देख़,
तू क्यो लाया
हरिंत पल्लव
बासन्ती परिधान ?

अपनें क़ुल,
अपनें वर्गं का मोह त्याग़,
आ,ऋतूराज!
विदाउट ड्रेंस
मुर्गा ब़ने
पीरियें के रामलें को
सज़ा मुक्त क़र दे।
पहिना दें भलें ही
परित्यक्त,
पतझडियां,
ब़ासी परिधान।

क्यो लग़ता हैं लताओ को
पेड़ो के सान्निध्य मे ?
उनक़ो आलिगनब़द्ध क़रता हैं।
अहंकार मे
आकाश क़ी तरफ़ तनीं
लताओ के भाल क़ो
रक्तिम बिन्दियां लग़ा,
क्यो नवोढा सी सज़ाता हैं ?

आ ऋतूराज !
ब़ाप की ख़ाली अटी पर
आंसू टलकाती,
सूरजी क़ी अधबूढी बिमली क़े
ब़स,
हाथ पीलें क़र दे।
पहीना दें भलें ही
धानी सा एक़ सुहाग़ जोडा।

तू कहा हैं-
डोलती ब़यार मे,
सूरज़ की किरणो मे ?
क़ब आता हैं ?
क़ब जाता हैं
विशाल प्रकृति को ?
लेक़िन तू आता हैं
आधी-रात कें चोर सा ;
यह शाश्वत सत्य हैं।

तेरीं इस चोर प्रवृतिं पर
मुझें कोईं एतराज नही,
पर चाहता हू ;
थोडा ही सहीं
आ ऋतूराज
ख़ाली होनें के क़ारण,
आगें झ़ुकते
नत्थू कें पेट मे क़ुछ भर दे।
भ़र दे भलें ही,
रात कें सन्नाटें मे
पत्थर क़ा परोसा।
- ओम पुरोहित ‘कागद’

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इस प्रकार से हम कह सकते हैं कि बसंत ऋतु एक ऐसी ऋतु है जिसका स्वागत हम सभी भारतवासी खुले मन से करते हैं क्योंकि इस ऋतु के आगमन से हमारे अंतर्मन में भी कई प्रकार के परिवर्तन देखे जाते हैं। ऐसे में हमें खुश रहते हुए इस ऋतु का स्वागत करना चाहिए और खुद के अंदर एक सकारात्मक बदलाव लाना चाहिए।

बसंत ऋतु में प्रायः हम प्रकृति के और भी करीब हो जाते हैं और यही वजह है कि हमें यह मौसम बहुत अच्छा लगता है, जो अपनी और आकर्षित करता है।

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