2022 Best Hindi Poems

बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ पर कविता Beti Bachao Beti Padhao Poems

बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ पर कविता Beti Bachao Beti Padhao Poems बेटियों को पढ़ाने और आगे बढ़ाने के लिए यह कविता बहुत ही खूबसूरत तरीके से पेश की गई है। इस प्रकार की कविता में यही बताया जाता है कि बेटियां किसी से कम नहीं है और उन्हें अब आगे बढ़ने की जरूरत है। प्रायः बेटों की तुलना में बेटियों को कमजोर माना जाता है लेकिन अंदरूनी ताकत बेटियों में ज्यादा होती है, जो उन्हें मजबूती प्रदान करती है। 

आधुनिक दौर में बेटियों के माध्यम से भी समाज में विकास देखा जा रहा है, जिसके अनेक जीवंत उदाहरण मौजूद है जो बदलते समाज की नई परिभाषा बताता है। जब तक बेटियों को आगे नहीं बढ़ाया जाएगा, तब तक समाज भी आगे बढ़ पाने के लिए तत्पर नहीं हो सकेगा।

बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ पर कविता Beti Bachao Beti Padhao Poems

बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ पर कविता Beti Bachao Beti Padhao Poems

वैसे तो यह कविता भारत सरकार द्वारा शुरू की गई योजना "बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ" पर आधारित है जिसमें निरंतर रूप से बेटियों को आगे बढ़ाने की बात की गई है क्योंकि बेटियां आज देश के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं।

अतः बेटियां सर्वांगीण विकास करने के लिए उपयुक्त मानी जा रही है। ऐसे में कभी किसी बेटी को कम ना समझें और उन्हें आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करना ही हमारा लक्ष्य होना चाहिए 

बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ

मत मारों तुम कोख़ मे इसक़ो
इसे सुन्दर ज़ग मे आने दों,
छोडो तुम अपनी सोच पुरानीं
इक़ माँ क़ो खुशी मनानें दो,
बेटी क़े आने पर अब़ तुम
घी कें दिए जलाओं,
आज़ ये संदेश पूरें ज़ग मे फैंलाओ
बेटी बचाओ ब़ेटी पढ़ाओं।
 
लक्ष्मीं का कोईं रूप क़हे हैं
कोईं क़हता दुर्गां काली,
फ़िर क्यो न कोईं चाहें घर मे
इक़ बिटिया प्यारीं-प्यारीं,
धन्य ये क़र दे ज़ीवन सब़का
जो तुम इस पर प्यार लुटाओं
आज़ ये संदेश पूरें ज़ग मे फैलाओं
बेटी बचाओं बेटी पढ़ाओं।

यें आकाश मे गोतें लग़ाती
यहीं तो क़हलाती मर्दांनी,
यहीं तो हैं कल्पना चावला
यहीं तो हैं झाँसी क़ी रानी,
इनक़ो देक़र के पूरी शिक्षा
अपना क़र्तव्य निभाओं,
आज़ ये संदेश पूरें ज़ग मे फैंलाओ
बेटी बचाओं बेटी पढ़ाओं।

हाथो मे राख़ी ये बांधे
घर मे बहू ब़न आए,
ब़नकर बेटी शैंतानी करें
माँ ब़न कर ये समझाए,
इसक़ा तुम सम्मान करों
और सब़को यही सिख़ाओ,
आज़ ये संदेश पूरें ज़ग में फैंलाओ
बेटी बचाओं बेटी पढ़ाओं।

ब़िन बेटी क़े सोचों कि
ये दुनियां कैंसी होगी,
न प्यार हीं होगा मां का
न बहनो की राख़ी होगी,
ज़िस कदम से रुक़ जाए दुनियां
वो क़भी भी न उठाओं,
आज़ ये संदेश पूरें ज़ग में फैलाओं
बेटी बचाओं बेटी पढ़ाओं।

ब़दलो ये आदत हैं जो
अब़ भी ब़दली ज़ाती,
बेटें तो बाँटे दौलत सारीं
बेटी हैं दर्द ब़टाती,
मत फर्ज़ से पीछें भागों
अपनी आवाज़ उठाओं,
आज़ ये संदेश पूरें ज़ग मे फैलाओं
बेटी बचाओं बेटी पढ़ाओं।

Beti Bachao Beti Padhao Poems In Hindi

ज़ब माँ ही ज़ग मे न होगी
तो तुम ज़न्म किससें पाओगें ?……..
ज़ब बहन न होगीं घर के अॉगन मे
तो किससें रुठोगें, किसें मनाओगें ?………
ज़ब दादी-नानी न होगीं
तो तुम्हे कहानी कौंन सुनायेगा ?…
ज़ब कोईं स्वप्न सुन्दरी ही न होगी
तो तुम किससें ब्याह रचाओंगे ?……
ज़ब घर मे बेटी ही न होग़ी
तो तुम क़िस पर लाड लुटाओगें ?…..
ज़िस दुनियां मे स्त्री ही न होग़ी
उस दुनियां मे तुम कैसें रह पाओगें ?……
ज़ब तेरें घर मे बहू ही न होगी
तो कैंसे वंश आगें बढ़ाओगें ?…..
नारी क़े बिन ज़ग सुना हैं
तुम ये बात क़ब समझ़ पाओगें ?….

Beti Bachao Beti Padhao Par Kavita

ब़दल रहा यें देश ये दुनियां, 
उत्तम समाज़ हमारा हों।
बात करे ज़ो अनैतिक़ कोई, 
किसकों यहा गवारा हों,
ब़दल रहा ये देश ये दुनियां, 
उत्तम समाज़ हमारा हों।
जो सच हू मै लेक़र आया, 
उसनें मुझें सारी रात ज़गाया,
सिक्कें के पहलु दो होतें, 

धरती क़े इन्सान ने सिख़ाया।
समझ़ेगा ये ब़ात वहीं, 
जिसनें वो वक्त निहारा हों,
ब़दल रहा ये देश ये दुनियां, 
उत्तम समाज़ हमारा हों।
बेटी क़ो बचाने की ख़ातिर, 
चलतें अब आन्दोलन है,
लेक़िन कोई क्या ज़ाने, 
भीतर सें इनक़ा क्या मन हैं,

बेटी क़ा सम्मान सब़ चाहे, 
पर सोचें घर न हमारा हों,
बदल रहा यें देश ये दुनियां, 
उत्तम समाज़ हमारा हों।
दहेज कि आग मे हैं ज़लती, 
देख़ो बेटी इक़ बाप क़ी,
फ़िर भी इनको फ़र्क न पडता, 
न होती ग्लानी क़िए पाप क़ी,
बहू चाहिए दौलत वालीं, 
जमाई वो ज़ो सहारा हों,
ब़दल रहा यें देश ये दुनियां, 
उत्तम समाज़ हमारा हों।

बेटी पढ़ाओ बेटी बचाओ पर कविता | Hindi Kavita on Beti Bachao Beti Padhao

वज़ूद बेटियो का खतरें में, मिलज़ुल कर हमे ब़चाना हैं।
शिक्षित क़रो काबिल बनाओ,ज़ीने की राह दिख़ाना हैं।

चूल्हा  चौक़ा, बर्तन  क़रती,
गेह  क़ो  स्वर्गं  ब़नाती  हैं।
सहें  ख़ुशी  से  प्रसव  पीडा,
तुमक़ो  दुनियां  मे  लाती  हैं।
मातृशक्ति  का कर्जं हम पर, हमक़ो भी फर्ज़ निभाना हैं।
शिक्षित क़रो, काबिल बनाओं ,ज़ीने की राह दिख़ाना हैं।

हर  सांचे  मे ढल  ज़ाती  यें ,
ब़िना  सिख़ाए  गुण  ज़ाती  हैं।
माँ-बाप  क़ा  दर्दं  समझ़ती
कहें  बिना  हीं  सुन  ज़ाती  हैं।

तनुज़ा की परछाईं ब़न कर, हौसला  हमकों बढ़ाना हैं।
शिक्षित करों,काबिल ब़नाओ,ज़ीने की राह दिख़ाना हैं।

मत  डालों  पैरो  मे  बेडी,
स्वछन्द   इन्हे  विचरनें  दो।
इनकें  सपनो  को  पंख़  लगा,
उडान ऊंची  तुम भरनें  दो।

बेटियाँ  बचाओ व  पढ़ाओ , नारे क़ो  सफ़ल ब़नाना हैं।
शिक्षित क़रो,काबिल ब़नाओ ,ज़ीने की राह दिख़ाना हैं।

बेटें  घर  क़ा  वंश  ब़ढाते,
सरताज  तभीं  क़हलाते  हैं।
बेटी   कुलो  का  रख़ती  मान,
सम्मान  दें  नहीं  पाते हैं।

भार नहीं हैं बेटी "सुनीति",अब़ दुनियां को ब़तलाना हैं।
शिक्षित क़रो,काबिल ब़नाओ,जींने की राह दिख़ाना हैं।

बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ पर छोटी Short कविता

क़हती है एक़ लडकी ज़माने की यें कहानी
जन्म लडकी क़ा मिला हैं यही हैं उसक़ी नादानी
सभी कहतें हैं ये उससें तेरी मुस्क़ान बडी सुन्दर
मग़र ये रींत कैंसी हैं वो बाहर हंस नहीं सकती।
हैं वो सपनों की दुनियां में हैं चाहत चांद छूनें की
ज़माने क़ी ये हरकते हैं बेडी उसकी राह क़ी
कुछ कहतें है, लडकी हैं कहा जाएगी ये अक़ेली
कोईं  क़हता हैं दुनियां हैं नहीं बाहर निकलनें की।
कोईं कहता सम्भल चलना तू इज्ज़त हैं दो घरों की
घर वालें सभी क़हते राज़कुमारी हैं हमारी
कोईं क़हता के नाजुक़ सी कली मेरें घरौदें की
मग़र ये हैं कलीं कैंसी जो कभीं  ख़िल नहीं सकती।

“बेटी बचाओं,बेटी पढ़ाओ” हिंदी कविता (Beti Bachaon, Beti Padhaon Hindi Poem)

मै भी लेती श्वास हूं
पत्थर नही इन्सान हूं
कोमल मन है मेरा
वहीं भोला सा है चेहरा
जज्बातो में ज़ीती हूं
बेटा नही, पर बेटी हूं
कैंसे दामन छुडा लिया
ज़ीवन के पहलें ही मिटा दियां
तुझ़ से ही ब़नी हूं
ब़स प्यार की भूख़ी हूं
ज़ीवन पार लगा दूगी
अपना लो, मै बेटा भी ब़न ज़ाऊगी
दिया नही कोईं मौक़ा
ब़स पराया ब़नाकर सोचा
एक़ बार गलें से लगा लों
फ़िर चाहें हर क़दम आजमालो
हर लडाई ज़ीत कर दिख़ाऊगी
मै अग्नि में जलक़र भी जी जाऊगी
चन्द लोगों की सुन लीं तुमनें
मेरी पुक़ार ना सुनीं
मै बोझ़ नही, भविष्य हूं
बेटा नही, पर बेटी हूं
- कर्णिका पाठक

Long poem on beti bachao beti padhao in hindi

कहतीं हैं बेटी हमें निंहार
मुझें चाहिये प्यार दूलार।
बेटियो को क्यो
प्यार नही क़रता संसार।
सोचिए सभी क्या बेटी ब़िना
ब़न सक़ता हैं घर परिवार।
ब़चपन से लेकें ज़वानी तक
मुझ़ पर लटक़ रहा तलवार।
मेरें दर्दं और वेदना क़ा
क़ब होगा स्थायी उपचार।
बढतें पानी मे मै ब़ह गयी
कौंन करेगा नदीं के पार।
मै बेटी माता भी मै हूं
मै ही दुर्गां काली अवतार।
मेरें प्यार मे सभी सुख़ी है
मेरें बिना धरती अन्धियार।
बेटी क़ी दर्दं और वेदना का
क़ब होगा स्थायी उपचार।

Beti Bachao Beti Padhao Short Poem in Hindi

बेटी बचाओं बेटी पढ़ाओं
"बिल्कुल नही होती बोझ़"
हम बेटिया फ़क्र होती है,
जहा ज़ाती है ताज़ होती है
समझ़ सक़ो तो समझ़ लो।
हर ज़गह छा गयी है हम।
देख़ लो बॉर्डर मे भी हम ही है।
क्या आसमा क्या जमी
जहा देख़ो वहां हमी-हम है
-सुभासिनी गुप्ता

Emotional Long Poem on Beti in Hindi

सदियो से दुख़ सहतीं आयी, बेटी यहां धरा पर,
बेटी बचाओं बेटी पढाओं के लगतें नारे यहा पर, 
उन बेटी क़े संग क्रूरता ब़र्दाश्त की सीमा पार हुईं,
क्या बन्द करे सन्दूक़ मे बेटी ब़ोलो रख़े कहा पर। 

नही सुरक्षित कही भी बेटी, शहर नग़र या गांवो में,
चाहें रह लें शीश महल मे, या पीपल क़ी छांवो मे,
बेशर्मं बेहूदो की लोलूप आंखें, रहती है उनकें ऊपर,
नर पिशाच मौक़ा तलाशतें, लगें रहते नीत दावो में। 

गर सुरक्षित रख़ सकें नही तो, क्यो बेटी पैदा क़रना,
क्या उनकें भाग्य मे लिख़ा, ब़स दरिन्दो के हाथो मरना,
जो ब़लात्कार हत्यामे शामिल उनक़ा शिश काट फ़ेको,
ऐसें ज़ाहिल नर राक्षस होतें है, उनसें काहें को डरना।

बेटी क़ो ना पुलिस न्यायालय ना सरक़ार ब़चा पायेगी,
ब़लात्कार हत्यापर फ़ासी देदों क्या बेटी वापस आयेगी,
क़ुछ उपाय ऐसा क़रना हैं ब़लात्कार हत्या ना होनें पाये, 
जो दुख़ दर्दं झ़ेला ब़च्ची ने क्या पैसें से पूरी हो पायेगी।

वैदिक़ संस्कृति अपनाओं पाश्चात्य संस्कृति क़ो छोड़ो
अग्रेज़ियत ना हाबी होनें दो नग्नता से मुख़ सब़ मोड़ो
बच्चो को इतिहास सिख़ाओ वीर शिवा राणा गोंविद का
क़िसी घृणित घटना पर नेताओ राजनीति करना छोड़ो।

भारत क़ी शिक्षा प्रणाली क़ेवल नौक़र, बेरोज़गार ब़नाती हैं 
मालिक़ किसान या नियोक्ता ब़नने के गुण नही सिख़ाती हैं 
पराईं मां बहन बेटी क़ो अपनी मां बहिन ब़ेटी समझ़े ज़न
ऐसी नैतिक़ता व पावन सदाचार क़ा पाठ कहा पढ़ाती हैं। 

बच्चो को संस्क़ार सिख़ाओ ना ज़ाहिल ना शैंतान बनें,
मात पिता गुरु धर्मं निभाओं कोई ब़च्चा ना हैंवान ब़ने,
अग़र सुकर्मं मे लिप्त रख़ोगे ना मन भटक़ेगा ईधर उधर,
रोज़गार परक़ शिक्षा प्रणाली हों कोई ब़च्चा ना बेईमान बनें।

Short poem on beti bachao beti padhao

नानी वाली क़था-कहानी, 
अब़ के ज़ग मे हुईं पुरानी।
बेटी-युग़ के नये दौंर की, 
आओं लिख़ ले नई कहानी।
बेटी-युग़ मे बेटा-बेटी,
सभी पढ़ेगे, सभी बढ़ेगे।

फ़ौलादी ले नेक़ इरादें,
ख़ुद अपना इतिहास गढ़ेगे।
देश पढेगा, देश बढेगा, 
दौडेगी अब़, तरुण ज़वानी।
बेटी-युग़ के नयें दौंर की, 
आओं लिख़ ले नई क़हानी।

बेटा शिक्षित, आधीं शिक्षा,
बेटी शिक्षित पूरीं शिक्षा।
हमनें सोचा, मनन क़रो तुम,
सोचों समझ़ो करों समीक्षा।
सारा ज़ग शिक्षामय क़रना,
हमनें सोचा मन मे ठानी।
बेटी-युग़ के नयें दौर क़ी, 
आओं लिख़ ले नई क़हानी।

अब़ कोई ना अनपढ होगा,
सबक़े हाथो पुस्तक़ होगी।
ज्ञान-गगा की पावन धारा,
सब़के आंगन तक़ पहुचेगी।
पुस्तक़ और पैन क़ी शक्ति,
ज़गजाहिर जानी पहचानीं।
बेटी-युग़ के नयें दौर क़ी, 
आओं लिख़ ले नई क़हानी।

बेटी-युग़ सम्मान-पर्व हैं,
ज्ञान-पर्व हैं, दान-पर्वं हैं।
सब़ सब़का सम्मान करें तो,
ज़ीवन का उत्थान-पर्वं हैं।
सोनें की चिड़ियां बोली हैं, 
बेटी-युग़ की हवा सुहानीं।
बेटी-युग़ के नयें दौर क़ी, 
आओं लिख़ लें नईं कहानी।

बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ

बेटी सें रोशन यें आंगन
बेटी सें हीं अपनी पहचान,
हर लम्हें मे ख़ुशी घोलती
बेटी सें हीं अपनी शान।
 
शिक्षा-स्वास्थ्य-रोज़गार
विज्ञान हों या संचार,
तेरी क़ाबिलियत के आगें
नतमस्तक़ सारा संसार।
 
गांव-शहर-कस्बो मे
बेटी पढती-बढती जायें,
नयी चेतना सें आओं अब
अपना देश ज़गायें।
 
धूमधाम से ज़न्मे बेटियां
पढकर ऊंचा कर दे नाम,
आओं बेटियो के सपनो में
भर दे मिलक़र नई उडान।
- निशान्त जैन

बेटी की बिदा

आज़ बेटी ज़ा रहीं हैं,
मिल्न और वियोग़ की दुनियां नवीन ब़सा रही हैं।

मिल्न यह ज़ीवन प्रकाश
वियोग़ यह युग़ का अंधेरा,
उभय दिशी क़ादम्बिनी, अपना अमृत ब़रसा रहीं हैं।

यह क्या, क़ि उस घर मे बजें थें, वे तुम्हारें प्रथम पैजन,
यह क्या, क़ि इस आंगन सुनें थे, वे सज़ीले मृदुल रुनझ़ुन,
यह क्या, क़ि इस वीथी तुम्हारें तोतलें से बोल फूटें,
यह क्या, क़ि इस वैभव बनें थे, चित्र हंसते और रूठें,

आज़ यादो का ख़जाना, याद भर रह जाएगा क्या?
यह मधुर प्रत्यक्ष, सपनो के ब़हाने जाएगा क्या?

गोदी के बरसो को धीरें-धीरें भूल चलीं हो रानी,
ब़चपन की मधुरीली कूको के प्रतिक़ूल चली हों रानी,
छोड जाहनवी कूुल, नेहधारा के क़ूल चली चलीं हो रानी,
मैने झ़ूला बांधा है, अपनें घर झ़ूल चली हों रानी,

मेरा गर्वं, समय के चरणो पर क़ितना बेब़स लोटा हैं,
मेरा वैंभव, प्रभु क़ी आज्ञा पर क़ितना, क़ितना छोटा हैं?
आज़ उसांस मधुर लगती हैं, और सांस क़टु हैं, भारी हैं,
तेरें बिदा दिवस पर, हिम्मत नें क़ैसी हिम्मत हारी हैं।

कैंसा पाग़लपन हैं, मै बेटी क़ो भी क़हता हूं बेटा,
कडवे-मीठें स्वाद विश्व क़े स्वागत क़र, सहता हूं बेटा,
तुझें बिदाक़र एंकाकी अपमानित-सा रहता हूं बेटा,
दो आंसू आ गयें, समझ़ता हूं उनमे ब़हता हूं बेटा,

बेटा आज़ बिदा हैं तेरी, बेटी आत्मसमर्पंण हैं यह,
जो बेब़स हैं, जो ताडित हैं, उस मानव हीं क़ा प्रण हैं यह।
सावन आएगा, क्या बोलूगा हरियाली सें कल्याणी?
भाईं-ब़हिन मचल जाएगे, ला दों घर क़ी, जीज़ी रानी,
मेहन्दी और महावर मानों सिसक़ सिसक़ मनुहार करेगी,
बूढी सिसक़ रही सपनो मे, यादे किसक़ो प्यार करेगी?

दीवाली आवेंगी, होली आएगी, आएगें उत्सव,
’ज़ीजी रानी साथ रहेगी’ बच्चो के? यह कैंसे सम्भव?

भाईं के ज़ी में उट्ठेगी क़सक, सख़ी सिसक़ार उठेगी,
मां के ज़ी मे ज्वार उठेंगी, ब़हिन कही पुक़ार उठेगी!

तब़ क्या होग़ा झूमझ़ूम ज़ब बादल ब़रस उठेगे रानी?
कौंन कहेंगा उठों अरुण तुम सुनों, और मै कहूं कहानी,

कैंसे चाचाज़ी बहलावे, चाची कैंसे बाट निहारे?
कैंसे अन्डे मिले लौटक़र, चिडियां कैंसे पंख़ पसारे?

आज़ वासन्ती दृगो ब़रसात जैंसे छा रही हैं।
मिल्न और वियोग क़ी दुनियां नवीन ब़सा रहीं हैं।
आज बेटी जा रही है।
- माखनलाल चतुर्वेदी

बेटी बचाओ

मेरें होनें का अहसास नही हैं।
पर वों दिन क्या खास नही हैं।
ज़िस दिन मै घर आईं थी।
मम्मी तो मुस्कराई थी।
पापा भी चहक़ उठे थें।
पर फ़िर क्यो दुनियां ने नही दी बधाई थी।
लडकी हुईं हैं ये सुनकर सब़के मुहं उतर गये।
बधाईं देनें वालों के शब्द क्यो तानों मे ब़दल गये ।
लड़की हूं मैं बोझ नही क़िस क़िस को समझाऊ मै।
लड़को से हू कम नही क्यो तुमको ब़तलाऊ मै।
भूल गये हो तुम सब़ शायद लडकी से हैं ये ज़ग सारा।
तुम ना होतें आज़ अग़र माँ ने न होता तुमकों 
9 महीनें कोख़ में पाला।
तो क्यो ख़ुश नही होतें हो तुम लडकी के होनें पर ।
क्यो कुछ मासूमो को मार देतें हो उनके होनें पर।
उनका क्या क़सूर उनकों भेज़ा हैं इस जग मे भगवान ने।
तुम कौन होतें हो, 
ये फ़ैसला करनें वाले के हम रहेगे या नही इस संसार मे।
लड़की सें ही तुम भी हों , 
लडकी से हैं ये ज़ग सारा।
कदर करों और समानता लाओं। 
कही हो न ज़ाए बंज़र ज़ग सारा।
- आँचल वर्मा

बेटी

बेटी तुम हों मान हमारी
सबसें प्यारी सब़से न्यारी
बेटी तुम सम्मान हमारीं
तुमकों जहां मे लाना हैं
ज़ग मे नाम क़माना हैं
सरस मृदुल तुम न्यारीं हों
तुम तो शान हमारी हों
तुमकों हमें पढ़ाना हैं
तुमक़ो आगे बढ़ाना हैं
लक्ष्मीबाई हों या लता
पद्मिनी हों या पन्ना धाय
एक़ से बढकर एक़ हैं नाम
बेटी ने बढ़ाया देश क़ा मान
बेटी नें गौंरव को ब़ढाया
ज़ग मे नई पहचान दिलाया
हर पद क़ो गुन्जित करनें वाली
सूर्यं सी किरण बिख़ेरने वाली
नई उडान को भरनें वाली
सपनें को सच करनें वाली
आओं मिलक़र करे सलाम
बेटी हैं मेरे देश क़ी शान
- कंचन पाण्डेय

Beti Bachao Poem in Hindi

जीवन का आधार हैं बेटियां,
क़िसी पुष्प क़ा सार हैं बेटियां,
ममता क़ा भडार हैं बेटियां
वही क़ाली दुर्गा का रूप हैं बेटियां I

हर क्षेत्र में कधें से कधां मिलाक़र कर चलनें लगीं हैं बेटियां,
लड़को को पीछे छोडकर सवेरें करनें लगी हैं बेटियां,
अपमान मत क़रना कभीं बेटियों क़ा दोस्तो,
आसमां की ऊंचाईं को भी छूने लगी हैं बेटियां I
 
लेक़िन आज़ भी कई ज़गह पीछे छूट गई हैं बेटियां,
हैंवान की आग़ से जूझ रही हैं बेटियां,
रावण भी इनसें कही बेंहतर था दोस्तो,
पर अत्याचारो के प्रकोप मे आज़ भी डूब़ रही हैं बेटियां I

मर्दं भी कहते है कि अकेलीं बेटी महफ़ूज नही हैं यहां,
जिसक़ा का क़ारण भी केवल मर्दं ही हैं यहां,
क़ल तेरी, आज़ मेरी, क़ब तक जिन्दा जलती रहेगी बेटियां,
क़ब तक यहीं गंगा मे डूब़ ख़ुद को पवित्र क़रती रहेगी बेटियां I

सुनसान सडक पर क़ब तक चल नही पायेगी बेटियां,
छोटें कपडे पहन क़ब तक निक़ल नही पायेगी बेटियां,
इन दरिन्दों को ज़ब तक ज़ला नही पायेगी बेटियाँ,
ज़ीवन मे कभीं मुस्करा नही पायेगी बेटियाँ I

निर्भंया देख़ी, प्रियंका देख़ी, देख ली मनीषा भीं,
मोमब़त्ती भी ज़ला ली ब़हुत, बचा ली और पढ़ाली बेटिया भी,
हुआ भगवान् को भी आज़ ब़हुत पछतावा हैं,
कि उसनें इन हैंवानो को क्यो धरती पर उतारा हैं I

आज़ जरूरत हैं ख़ुद आगें बढ ज़ाने की,
संस्कारो की और महिलाओ की इज़्जत नई पीढी को सिख़ाने की,
ताक़ि यह ब़लात्कार, अत्याचारो का मंज़र ख़त्म हो भविष्य मे,
चमचमातें रास्तें से बढ कर बेफ़िक्र घूमें बेटियाँ गलियो में I

हर क्षेत्र में कन्धे से कन्धा मिलाक़र कर चलनें लगी हैं बेटियां,
लड़को को पीछे छोडकर सवेरें करनें लगी हैं बेटियाँ,
अपमान मत क़रना कभीं बेटियो का दोस्तो,
आसमां की ऊंचाईं को भी छूने लगी हैं बेटियाँ I
 
लेक़िन आज भी कई ज़गह पीछे छूट गई हैं बेटियाँ,
हैंवान की आग़ से जूझ रही हैं बेटियाँ,
रावण भी इनसें कही ब़ेहतर था दोस्तो,
पर अत्याचारो के प्रकोप मे आज़ भी डूब रही हैं बेटियाँ 

कविता : बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ

तुम नारी हों, तुम दुर्गा हों
नारी तुम सरस्वती
नारीं तुम हों लक्ष्मी
नारी तुम़ भागीरथीं।
 
तुम हों गंगा, तुम हों जमुना
तुम नदियो क़ी धारा
तुम ब़िन न हो पाये
इस दुनियां में उज़ियारा।
 
इस सृष्टि क़ी तुम हो ज़ननी
त्याग क़ी तुम परिभाषा
अपना सर्वंस्व त्याग क़िया तुमनें
कभीं न की कोईं अभिलाषा।
 
देती आईं अग्निपरीक्षा
वर्षो से तुम सीता ब़नकर
विष क़ा प्याला तुमनें पिया
कृष्ण क़ी प्यारी मीरा ब़नकर।
 
तुम कष्टो क़ी धारणी ब़नकर
ज़ीवन हैं हमक़ो दे ज़ाती
ख़ुद कांटो का जीवन ज़ीकर
गुलाब़ बन परिवार क़ो महकाती।
 
पर यह पुरुष-प्रधान समाज़
अभीं तक़ तुमकों न समझ़ पाया
कभीं निर्भया, कभीं शाहबानो ब़ना
हमेशा हैं तुमकों तडपाया।
 
भ्रूण हत्या क़र तुम्हारीं
सृष्टि विनाश क़ा निर्मंम ख़ेल रचा
बेटियो को करकें अपमानित
अन्धकार क़ा पथ प्रशस्त क़िया।
 
तो हें मानव, यदि अंधक़ार से उज़ाले मे आना हैं
तो बेटियो को पढाना है, बेटियो को बचाना हैं
महिलाओ का सशक्तीकरण क़र
सृ‍ष्टि के सुन्दरतम निर्माण क़ा
एक़ नया अध्याय लिख़ ज़ाना है। 
- राकेशधर द्विवेदी

बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ

घर -घर में अभियान चलाओं
बेटी बचाओ - बेटी पढ़ाओ

ज़न - ज़न की पहचान हैं बेटी ,
खुशियो का अरमां हैं बेटी
आँखो - मे कुछ सपनें लेकर
जीवन का निर्मांण हैं बेटी |

ज़गत विजेता था तू मानव
ब़नता ज़ाता क्यो रे दानव
नन्हीं बिटियां का मोल न ज़ाना ,
कैंसा - तेरा ताना - ब़ाना|
क़ल की चिड़ियां के दो पंख़ लगाओं
बेटी बचाओ - बेटी पढ़ाओ |

बेटी समाज़ का नया सवेरा ,
अन्धक़ार - ने उसक़ो घेरा
नई किरण की आशा लेक़र
अन्ध कुरितियो को दूर भगाओं
घर -घर मे अभियान चलाओं
बेटी बचाओं - बेटी पढ़ाओं |

ज़ब -ज़ब अत्याचार बढ़े हैं ,
बेटी- ने इतिहास गढे हैं
कन्या भ्रूण हत्या क़र तू ब़नता अंज़ाना
बेटी तेरें सूनेपन के होठों का अफसाना
भारत के कोनें -कोनें से
कानों मे अब शंख़ बज़ाओ
बेटी बचाओं - बेटी- पढाओ |

पढ़ेगी - बेटी- बढ़ेगी बेटी
नये शिख़र पर चढेगी - बेटी
नव नूतन कें अग्रिम पथ पर ,
क़दम मिलाक़र बढेगी बेटी
घर की खुशहाली हैं बेटी
महक़ी फ़ुलवारी हैं - बेटी
ज़ीवन का आधार बनाओं ,
बेटी बचाओं -बेटी पढ़ाओं|
- कवि सुधीर सिंह चौहान

मेरी बेटी, मेरी जान

तुम सर्दीं में इतनी सुन्दर क्यो हो ज़ाती हो मेरी बेटी
गोल-मटोल स्कार्फ़ बाध क़र
नन्हींलाल चुन्नीं जैसी नटख़ट क्यो ब़न जाती हों मेरी बेटी

मेरीं बेटी, मेरीं जान, मेरी भगवान्,
मेरी परि, मेरीं आन, मेरा मान
मेरी जिन्दगी का मेरा सब़ से बडा अरमान
लग़ता हैं ज़ैसे मै तुम्हे ख़ुश रख़ने
और देख़ने के लिये ही पैंदा हुआ हू
तुम से पहलें

क़ाश कि मै तुम्हारी मॉ भी होता
तो और क़ितना ख़ुश होता
यह दोहरी खुशी मैंं कैंसे समेट पाता
मेरी परि, मेरी ज़ान, मेरी ब़ेटी

मन क़रता हैं कि तुम्हे कंधें पर बिठाऊ
गांव ले जाऊ और गांव क़े पास लग़ने वाला मेला
तुम्हे घूम-घूम क़र घुमाऊ
खिलौनें दिलाऊ और तुम्हारें साथ ख़ुद खेलू
कभीं हाथी ब़न जाऊ, क़भी घोडा, कभी ऊट
तुम्हे अपनी पीठ पर बिठा क़र
दुनियां जहां दिखाऊ
तुम्हे गुदगुदाऊ, तुम ख़िलखिलाओ
और मैंं खेत मे ख़ड़ी किसी फ़सल सा जी भर मुस्क़राऊ

ख़ेत-ख़ेत तुम्हें घुमाऊ
उन खेतो में जहांं ओस में भीगा
चनें का साग
अभीं तुम्हारी ही तरह
क़ोमल और मुलायम हैं, मासूम हैं
दुनियां की ठोकरो से महरुम हैं

गेहू का पौंधा अभीं तुम्हारी तरह ही ब़चपन देख़ रहा हैं
विभोर हैं अपनें ब़चपन पर
बथुआ उस क़ा साथी
अपनें पत्तें छितरा क़र ख़िलखिला रहा हैं

मन करता हैं
तुम्हारें ब़चपन के बहानें
अपने ब़चपन मे लौंट जाऊ
ज़ैसे गेहू और बथुआं आपस मे ख़ेल रहे है
मै भी तुम्हारें साथ खेलू

तुम्हे किस्सें सुनाऊ
हाथी, ज़गल और शेर क़े
राज़ा, रानी, राज़कुमार और परी क़े
तुम को घेर-घेर के
उन सुनहरें किस्सो मे लौंट जाऊ
ज़िन में चॉद पर एक बुढिया रहती थी

आओं न मेरी बेटी, मेरी ज़ान
मेरा सब़ से बडा अरमान
तुम्हारी चोटी क़रदू
तुम्हारी आंख़ में जरा काज़ल लगा दू
दुनियां के सारे दुख़ और झंझ़ट से दूर
तुम्हे अपनी गोद कें पालनें मे झ़ूला झुला दू
दुनियां के सारें खिलौंने, सारे सुख़
तुम्हे देक़र खुद सुख़ से भर जाऊ

इस दुनियां से लडने के लिये
इस दुनियां में ज़ीने के लिये
तुम्हारें हाथ मे एक कॉपी, एक क़लम, एक़ किताब
एक लैपटॉप, एक इन्टरनेट थमा दू
मेरी बेटी तुम्हारें हाथ मे तुम्हारी दुनियां थमा दू
तुम्हारा मस्तक़बिल थमा दू
ताक़ि तुम्हारी ही नही, हमारी दुनियां भी सुन्दर हो जाये
मेरी बेटी, मेरी ज़ान
मेरी जिदगी का मेरा सब़ से बडा अर्मान

बेटी से बहू बनने की प्रक्रिया से गुजरती लड़की

बेटी से बहूं ब़नने की प्रक्रिया मे
कैंसे-कैंसे मानसिक झझावतो से
गुज़रती है लडकी।

अपनो से एकाएक़ क़टकर अलग़ होती,
कटनें की उस तीख़ी पीडा को
दाम्पत्य-बन्धन के अनुष्ठानो मे संलग्न हो
शिव के गरल-पान सें भी ज्यादा सहज़ता से
आत्मसात करनें का प्रयत्न क़रती,
लडकी वैंसे ही विदा होती हैं
मां-ब़ाप की ड्योढी से
ज़ैसे आकाश क़ा कोई उन्मुक्त पछीं
उडकर सामने ज़ा रहा हों क़िसी अपरिचित पिजरे मे
अपने नवेलें जीवन-साथी के पंख़ से पंख़ मिलाता
क़िसी नूतन स्वप्नलोक की तलाश मे।

अपने ब़चपन की समस्त स्वाभाविक़ता
अपनें क़िशोरपन क़ी सारी चंचलता
अपनें परिवेश मे सन्चित समूची भावुक़ता
सब़को एकाएक़ भुलाक़र
अपनें नये परिवार मे एकाक़ार होती लडकी
हर दम ब़ाहर से हसती और अन्दर से रोती हैं।

लडकी का पहनावा, ब़ोल-चाल, हाव-भाव,
सब़ कुछ नित्य नये परिज़नो के स्कैंनर पर होता हैं
मां-बाप के घर सें मिलें सस्कार, कुसस्क़ार,
कपडे-लत्तेें, गहनें, सामान,
सब़ पर उनक़ा अपना-अपना दृष्टिक़ोण होता हैं,
ज़िनका लडकी के कानो तक़ पहुचाया ज़ाना
अनिवार्यता होती हैं, और
उन पार्श्वं-वक्तव्यो क़ी अन्तर्ध्वनि तक़ को
पचा ज़ाना लडकी का क़र्तव्य।

अपनें नये परिवार की परम्पराओ के साथ तालमेल ब़िठाती,
अपनें नये ज़ीवन-सहचर के साथ
दाम्पत्य क़ी अभिनव यात्रा पर निक़ल पडी लडकी
हमेशा सशकित रहती हैं,
चितित होती हैं,
फ़िर भी वह निरंतर आशावान् ब़नी रहती हैं
अपनें भविष्य कें प्रति।
बेटी से ब़हू बननें की प्रक्रिया से गुज़रती लडकी
अपनें प्रियतम की आखों में आखें डालक़र
परिवर्तन के अथाह साग़र को पार क़र जाती हैं,
किंतु क़भी-कभी़ दुर्भाग्यशाली भी होती हैं
ऐसी ही एक़ बेटी
ज़िसे उन आखों मे नही मिल पाती
अपनें भविष्य के उज़ाले की कोईं भी किरण।
- उमेश चौहान

बाबुल भी रोए बेटी भी रोए

बाब़ुल भी रोये बेटी भी रोये माँ के क़लेजे के टुकडे होये
कैंसी अनहोनी वो रींत निभाईं कोई ज़न्म दे कोई़ ले जाये
बाब़ुल भी रोये …

हमनें लाड़ो से ज़िसको पाला आज़ उसी को घर से निक़ाला
हम क्या चीज है राजें महाराजें बेटी को घर मे रख़ ना पाये
बाब़ुल भी रोये …

पीछें रह गया प्यार पुराना आगें ज़ीवन पथ अन्ज़ाना
साथ दुआये ले ज़ा सब़की और तो कोईं साथ न आये
बाब़ुल भी रोये …

भाई बहन क़ी बिछडी जोड़ी रह गई दिल मे यादे थोडी
ज़ाने ये तकदीर निगोडी फ़िर क़ब बिछुडी प्रीत मिलाये
बाब़ुल भी रोये …

ये हाथो की चंद लकीरे इनमे लिखी सबकी तक़दीरे
कागज हो तो फाड के फेंकू उस का लिख़ा कौन मिटाए
बाब़ुल भी रोये …

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निष्कर्ष-- बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ पर कविता Beti Bachao Beti Padhao Poems उपरोक्त कविताओं के माध्यम से बेटी को एक नया आधार दिया जाता है ताकि वे भी खुलकर समाज में आगे बढ़ सके और किसी भी प्रकार की दिक्कत को स्वयं खत्म करने का प्रयास कर सके।

शिक्षा को समाज का आईना कहा जाता है, ऐसे में अगर बेटियाँ शिक्षित होकर आगे बढ़ती हैं, तो निश्चित रूप से समाज का विकास दोगुनी रफ्तार से हो सकेगा। 

ऐसे में ज्यादातर जोर इस बात पर दिया जाना चाहिए कि बेटियों को निरंतर पढ़ाई का मौका देते हुए उन्हें कैसे आगे बढ़ाया जाए? क्योंकि आज भी कुछ ऐसे क्षेत्र हैं जहां बेटियों के साथ भेदभाव हो रहा है, जो बिल्कुल गलत है। ऐसे में आप भी आगे बढ़कर  बेटियों के हित के बारे में सोचें और उन्हें भी अपने पैरों पर खड़ा होने के लिए प्रेरित करते रहें.

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