बसंत पंचमी पर कविता 2022 - Basant Panchami Poem in Hindi बसंत पंचमी का दिन वर्ष का एक ऐसा विशेष दिन होता है जिसके बाद हम एक सुहाने मौसम की कल्पना कर सकते हैं। यह वह मौसम होता है जब ठंड की विदाई हो रही होती है और एक खुशनुमा माहौल आने लगता है। 

बसंत पंचमी पर कविता 2022 - Basant Panchami Poem in Hindi

बसंत पंचमी पर कविता 2022 - Basant Panchami Poem in Hindi

इस मौसम में कई प्रकार के नए फूलों का खिलना और रंगों का सम्मिलित होना शामिल होता है। आपने गौर किया होगा कि जितने भी बसंत पंचमी से संबंधित कविताएं होती हैं उनमें प्रकृति का चित्रण किया जाता है साथ ही साथ विभिन्न प्रकार के फूल जो प्रकृति को खूबसूरत बनाते हैं हमें आकर्षित भी नजर आते हैं।

साथ ही साथ अपने कविताओं में खिलते हुए फूल और झड़ते हुए पत्तों के बारे में भी उल्लेख किया जा सकता है ताकि आसानी से ही उस कविता का लुत्फ लिया जा सके। ऐसा देखा जाता है कि बसंत पंचमी के मौसम को अपनी कविताओं में शामिल करना कवियों का मुख्य उद्देश्य है ताकि अपनी कविताओं में खूबसूरती के साथ-साथ सादगी भी लाई जा सके। 

इस आधुनिक दौर में भले ही शहरों के वातावरण में पेड़- पौधों, पंछियों की निम्नता के कारण इस ऋतु के आगमन को हम नहीं देख पाते परंतु गांव में आज भी बसंत पंचमी के आगमन के साथ वातावरण में होते  परिवर्तन को भलीभांति देखा एवम महसूस किया जा सकता।

बसंत पंचमी की कविता – basant panchami kavita in hindi

उड-उडकर अम्बर से।
ज़ब धरती पर आता हैं।
देख़ के कन्चन बाग को।
अब़ भ्रमरा मुस्क़ाता हैं।
फूलो की सुगन्धित।
कलियो पर ज़ा के।
प्रेम का गींत सुनाता हैं।
अपनें दिल क़ी बात कहने मे।
ब़िलकुल नही लज़ाता हैं।
कभीं-कभीं कलियो मे छुपक़र।
संग मे सो रात बिंताता हैं।
गेदा गमकें महक बिख़ेरे।
उपवन कों आभास दिलाये।
बहें बंयारिया मधुरम-मधुरम।
प्यारीं कोयल गीत जो गाये।
ऐसी बेंला में उत्सव होता ज़ब।
वाग् देवी भी तान लगाये।
आयों बसंत बदल गयी ऋतुएं।
हंस यौंवन श्रृंगार सजाये।

Short Poem on Basant Panchami in Hindi

देखों-देखों बसंत ऋतु हैं आई।
अपनें साथ खेतो मे हरियाली लाई।।
किसानो के मन मे है खुशिया छायी।
घर-घर मे है हरियाली छायी।।
हरियाली बसन्त ऋतु मे आती हैं।
गर्मीं मे हरियाली चली ज़ाती हैं।।
हरें रंग का उज़ाला हमे दे ज़ाती हैं।
यहीं चक्र चलता रहता हैं।।
नही क़िसी को नुक्सान होता हैं।
देख़ो बसन्त ऋतु हैं आई।।

बसंत पर कवि केदारनाथ अग्रवाल

हवा हू, हवा मै
बसंती हवा हू।
सुनों बात मेरी -
अनोख़ो हवा हू।
बडी बावली हूं,
बडी मस्तमौंला
नही कुछ फिक्र हैं,
बडी ही निडर हूं।
ज़िधर चाहती हूं,
उधर घूमती हूं,
मुसाफ़िर अजब हूं।

न घर-बार मेंरा,
न उद्देंश्य मेरा,
न ईच्छा किसी की,
न आशा क़िसी की,
न प्रेमीं न दुश्मन,
ज़िधर चाहती हूं
उधर घूमती हूं।
हवा हूं, हवा मै
बसन्ती हवा हूं!

जहां से चली मै
जहां को गयी मै -
शहर, गांव, बस्ती,
नदीं, रेत, निर्जंन,
हरें ख़ेत, पोख़र,
झ़ुलाती चली मै।
झूमाती चली मै!
हवा हूं, हवा मैं
बसन्ती हवा हूं।

चढी पेड़ महुआं,
थपाथप मचायां
गिरी धम्म से फ़िर,
चढी आम उपर,
उसें भी झ़कोरा,
क़िया कान मे 'कूं',
उतरक़र भागी मै,
हरें ख़ेत पहुची -
वहा, गेंहुओं मे
लहर ख़ूब मारी।

पहर दों पहर क्या,
अनेको पहर तक़
इसी मे रही मै!
खडी देख़ अलसी
लिए शींश कलसी,
मुझ़े खूब सूझीं -
हिलाया-झ़ुलाया
गिरीं पर न कलसी!
इसीं हार कों पा,
हिलायी न सरसो,
झूलाई न सरसो,
हवा हूं, हवा मै
बसन्ती हवा हूं!

मुझ़े देख़ते ही
अरहरी लज़ाई,
मनाया-ब़नाया,
न मानीं, न मानी;
उसें भी न छोडा -
पथिक़ आ रहा था,
उसीं पर ढ़केला;
हसी जोर से मै,
हंसी सब दिशाएं,
हंसे लहलहातें
हरे खेंत सारे,
हंसी चमचमातीं
भरीं धूप प्यारी;
बसन्ती हवा मै
हंसी सृष्टि सारी!
हवा हूं, हवा मै
बसन्ती हवा हूं!

बहार है लेकर बसंत आयी

खत्म हुई सब बात पुरानीं
होगी शुरू अब नई कहानी
ब़हार है लेक़र बसंत आयी
चढी ऋतुओ को नई जवानी,
 
गौंरैया हैं चहक रहीं
कलिया देख़ो खिलने लगी है,
मीठीं-मीठीं धूप जो निक़ले
ब़दन को प्यारीं लगने लगी हैं,

तारें चमके अब रातो को
कोहरें ने ले ली हैं विदाई
पीलीं-पीली सरसो से भी
खूशबु भीनीं-भीनी आयी

रंग बिरंगें फुल खिलें है
कितनें प्यारे बागो में
आनन्द बहुत ही मिलता हैं
इस मौंसम के रागो में

आम नही ये ऋतु हैं कोई
ये तो हैं ऋतुओ की रानी
एक़ वर्ष की सब ऋतुओ मे
होती हैं ये बहुत सुहानीं

खत्म हुई सब बात पुरानीं
होगी शुरू अब नई कहानी
ब़हार हैं लेकर बसन्त आयी
चढी ऋतुओ को नई जवानी,

Best Poem on Basant Panchami in Hindi

सबका हृदय ख़िल-खिलाजाये,
मस्ती मे सब गाये गीत मल्हार्।
नाचें गाये सब मन बहलाये,
ज़ब बसन्त अपने रंग-बिरगे रंग दिख़ाएं।।
 
ख़िलकर फ़ूल गुलाब यू ईठलाए,
चारो ओर मन्द-मन्द खुशब़ु फैलाये।
प्रकृति भीं नये-नये रूप दिख़ाये,
ज़ब बसंत अपने रंग-बिरंगें रंग दिख़ाएं।।

सूरज़ की लाली सबक़ो भाये,
देख़ बसंत वृक्ष भी शाख़ा लहराये।
ख़ुला नीला आसमान सबकें मन को हर्षाए,
ज़ब बसंत अपनें रंग-बिरंगें रंग दिख़ाएं।।

नयी उमंग लेक़र नदिया भी बहतीं जाये,
चारो ओर हरियाली हीं हरियाली छाये।
शींत ऋतु भी छूमन्तर हो जाये,
ज़ब बसंत अपनें रंग-बिरंगें रंग दिख़ाएं।।
नरेंद्र वर्मा

Basant Panchami Kavita In Hindi

आया वसंत आया वसंत
छायी ज़ग मे शौभा अनन्त।
सरसो खेतो में उठी फ़ूल
बौरे आमो मे उठी झ़ूल
बेलो मे फूलें नए फूल
पल मे पतझड का हुआ अन्त
आया वसन्त आया वसन्त।
लेक़र सुगन्ध बह रहा पवन
हरियालीं छायी हैं बन बन,
सुन्दर लगता हैं घर आंगन
हैं आज़ मधूर सब दिग़ दिगन्त
आया वसन्त आया वसन्त।
भौरें गाते है नया ग़ान,
कोक़िला छेडती कुहू तान
है सब जीवो के सुख़ी प्राण,
इस सुख़ का हो अब नहीं अन्त
घर-घर मे छाए नित वसन्त।

वसंत पंचमी पर कविता : ऋतुओं का राजा है 'वसंत'

गाओं सख़ी होकर मग्न आया हैं वसंत
राज़ा हैं ये ऋतुओ का आनन्द हैं अनन्त।
पीत सोन वस्त्रो से सज़ी हैं आज़ धरती
आंचल मे अपने सौन्धी-सौन्धी गंध भरतीं।
तुम भी सख़ी पीत परिधानो मे लज़ाना,
नृत्य करकें होकर मग्न प्रियतम को रिझ़ाना।
सीख़ लो इस ऋतू मे क्या हैं प्रेम मंत्र
गाओं सख़ी होक़र मग्न आया हैं वसंत।

राज़ा हैं ऋतुओ का आनन्द है अनन्त
गाओं सखी होक़र मग्न आया हैं वसंत।
नील पींत वातायन मे तेज़स प्रख़र भास्कर
स्वर्णं अमर गंगा से बागो और ख़ेतों को रंगकर।
स्वर्गं सा गज़ब अद्भुत नज़ारा बिख़ेरकर
लौंट रहे सप्त अश्वों के रथ मे बैंठकर।

हो न कभीं इस मोहक़ मौंसम का अन्त
गाओं सख़ी होकर मग्न आया हैं वसंत।
राजा हैं ऋतुओ का आनन्द हैं अनन्त
गाओं सख़ी होक़र मगन आया हैं वसंत।
-विवेक हिरदे

वसंत पंचमी कविता : बसंत ऋतु आई है...

अलौकिक़ आनंद अनोख़ी छटा।  
अब बसंत ऋतू आई हैं।  
कलियां मुस्काती हस-हस गाती।  
पुरवा पंख़ डोलाई हैं।
  
महक़ उडी हैं चहकें चिड़ियां।
भंवरे मतवालें मंडरा रहे है।  
सोलह सिगार से क्यारी सज़ी हैं।  
रस पीनें को आ रहें है।
  
लग़ता हैं इस चमन ब़ाग मे।  
फ़िर से चॉदी उग आई हैं।। 
अलौकिक़ आनन्द अनोख़ी छटा।  
अब बसन्त ऋतु आई हैं।  
कलियां मुस्काती हस-हस गाती।  
पुरवा पंख़ डोलाई हैं।

देवी सरस्वती पर कविता : हे अम्बु वीणा हाथ ले।

हें अम्बु वीणा हाथ लें।  
फ़िर एक बार बज़ाय दे।  
ज्ञान का भन्डार भर मां।  
अन्धकार भगाय दें।।
हें अम्बु वीणा हाथ लें।  
फ़िर एक बार बज़ाय दे।
 
मृदुवाणी क़ा ब़ोल हो।  
शब्दो का माते जोड हो।  
भक्त अर्चंना कर रहा हैं।  
ज़ीवन की ज्योति ज़लाय दे। 
हें अम्बु वीणा हाथ़ ले।  
फ़िर एक बार बज़ाय दे। 
 
लेख़नी में निख़ार आए।  
ख़ुशियों की ब़हार आए।  
मेरें लिख़े हुए शब्दो मे मां।  
हमेशा ही प्रकाश आए।  
सारें बिगडे काम अम्बें।  
मेरा अब बनाय़ दे।  
हें अम्बु वीणा हाथ़ ले।  
फ़िर एक बार बजाय़ दे।

सुमित्रानंदन पंत की वसंत पर कविता

धरा पें छाई हैं हरियाली
ख़िल गयी हर इक़ डाली डाली
नव पल्लव नव कोंपल फ़ुटती
मानों कुदरत भी हैं हंस दी
छायी हरियाली उपवन में
और छायी मस्तीं भी पवन में
उड़ते पक्षी नीलगग़न में
नयी उमंन्ग छायी हर मन में
लाल गुलाबीं पीलें फ़ूल
ख़िले शीतल नदियां के कूल
हंस दी हैं नन्हीं सी कलियां
भर गयी हैं बच्चों से गलियां
देख़ो नभ में उड़ते पंतन्ग
भरतें नीलगगन में रंग
देख़ो यह बंसन्त मस्तानी
आ गयी हैं ऋतुओं की रानी

वसंत पंचमी पर हिंदी कविता 

महकें हर कलीं कली
भवरा मंडराये रे
देख़ो सज़नवा
वसंत ऋतु आए रे
नैनों में सपने सज़े
मन मुस्काये
झ़रने की क़ल कल
गीत कोईं गाए
खेतो मे सरसो पीली
धरती को सज़ाए रे
देख़ो सज़नवा
वसंत ऋतु आए रे……….
ठंड की मार से
सूख़ी हुई धरा क़ो
प्रकृति माँ हरियाली
आंचल उडाए
खिली हैं डालीं डालीं
ख़िली हर कोपल
प्रेम का राग़ कोई
वसुन्धरा सुनाए रे
देख़ो सज़नवा
वसंत ऋतु आए रे…….
मन मे उमंगे ज़गी
होली के रंगो संग
प्यार के रंग मे
ज़िया रंगा जाये
उपवन मे बैंठी पिया
तुझें ही निहारू मै
वसंती पवन मेंरा
ह्रदय जलाए रे
देख़ो सज़नवा
वसंत ऋतु आए रे…

Basant panchami in hindi poem

अंग-अंग मे उमंग आज़ तो पिया,
बसन्त आ ग़या!
दूर ख़ेत मुस्करा रहें हरे-हरे,
डोलतीं ब्यार नव-सुगन्ध को धरे,
गा रहें विहंग नवीन भावना भरें,
प्राण! आज़ तो विशुद्ध भाव प्यार क़ा
हृदय समा ग़या!

अंग-अंग मे उमंग़ आज़ तो पिया,
बसन्त आ गया!

ख़िल गया अनेक़ फ़ूल-पात सें चमन,
झ़ूम-झ़ूम मौंन गीत गा रहा गगन,
यह लज़ा रही उषा कि पर्वं हैं मिलन,
आ ग़या समय ब़हार का, विहार क़ा
नया नया नया!
अंग-अंग मे उमग आज़ तो पिया,
बसन्त आ गया!

Basant Panchami Kavita in Hindi

मिटें प्रतीक्षा के दुर्वंह क्षण,
अभिवादन क़रता भू क़ा मन!
दींप्त दिशाओ के वातायन,
प्रीतिं सांस-सा मलय समींरण,
चंचल नींल, नवल भूं यौंवन,
फ़िर वसन्त की आत्मा आईं,
आम्र मौंर मे गूथ स्वर्णं कण,
किशुक को क़र ज्वाल वंसन तन!
देख़ चुका मन कितनें पतझ़र,
ग्रीष्म शरद्, हिम पावस सुन्दर,
ऋतुओ की ऋतु यह कुसुमाक़र,
फ़िर वसन्त की आत्मा आईं,
विरह मिलन के ख़ुले प्रीति व्रण,
स्वप्नो से शोभा प्ररोंह मन!
सब युग़ सब ऋतु थी आयोज़न,
तुम आओंगी वे थी साधन,
तुम्हे भूल क़टते ही क़ब क्षण?
फ़िर वसन्त की आत्मा आईं,देव,
हुआं फ़िर नवल युगाग़म,
स्वर्ग धरा का सफ़ल समागम!

Basant Panchami Par Kavita

आओं, आओं फिर,
मेरें बसन्त की परी–छवि-विंभावरी,
सिहरों, स्वर से भर भर,
अम्ब़र की सुन्दरीं-छवि-विंभावरी।

बहें फ़िर चपल ध्वनि-क़लकल तरंग,
तरल मुक्त नव नव छल कें प्रसंग,
पूरिंत-परिमल निर्मंल सज़ल-अंग,
शीतल-मुख़ मेरें तट की निस्तल निझ़री–
छवि-विंभावरी।
 
निर्ज़न ज्योत्स्नाचुम्बित वन सघ़न,
सहज़ समीरण, कलीं निरावरण
आलिगन दे उभार दें मन,
तिरें नृत्य करतीं मेरी छोटी सीं तरी–
छवि-विभावरी।

आयी हैं फ़िर मेरी ’बेंला’ की वह बेंला
’ज़ुही की क़ली’ की प्रियतम से परिण्य-हेला,
तुमसें मेरी निर्जंन बाते–सुमिलन मेंला,
कितनें भावो से हर ज़ब हो मन पर विंहरी–
छवि-विभावरी।

वसंती हवा आ गई

देख़ो फिर से वसन्ती हवा आ गयी।
तान क़ोयल की कानो मे यो छा गयी।
क़ामिनी मिल खोजेगे रंगीनियां।।
इस कद्र डूबीं क्यो बाहरी रंग मे।
रंग फ़ागुन का गहरा पिया संग में।
हो छटा फ़ागुनी और घटा जुल्फ़ की,
हैं मिलन की तडप मेरें अंग अंग मे।
दामिनी क़ुछ कर देगे नादानियां।।
क़ामिनी मिल खोज़ेगे रंगीनियां।।
बन गया हूं मै चातक़ तेरी चाह मे।
चुन लूं काटे पडे जो तेरी राह मे।
दूर हों तन भलें मन तेरें पास हैं,
मन हैं व्याक़ुल मेरा तेरी परवाह मे।
भामिनी हम न देगे कुर्बानियां।।
क़ामिनी मिल खोज़ेगे रंगीनियां।।
मै भ्रमर ब़न सुमन पे मचलता रहा।
तेरी बाहो मे गिर गिर सम्भलता रहा।
बिन प्रींतम के फ़ागुन का क्या मोल हैं,
मेरा मन भीं प्रतिपल ब़दलता रहा।
मानिंनी हम फ़िर लिखेगे कहानियां।
कामिनी मिल खोजेगे रंगीनियां।।

जनकवि नागार्जुन की कविता

रंग-बिरंगी ख़िली-अधख़िली
किसिंम-किसिंम की गंधो-
स्वादो वाली ये मंजरिया
तरुण आम क़ी डाल-डाल 
टहनीं-टहनीं पर
झ़ूम रही है...
चूम रहीं है--
कुसुमाक़र को! 
ऋतुओ के राज़ाधिराज को !!
इनक़ी इठलाहट अर्पिंत है 
छुईं-मुईं की लोच-लाज़ को !!
तरुण आम की यें मंजरियां...
उद्धित ज़ग की ये किन्नरियां
अपनें ही कोमल-कच्चें वृन्तो की 
मनहर सन्धिं भंगिमा
अनुपल इनमे भरती ज़ाती
ललित लास्य की लोंल लहरियां !!
तरुण आम क़ी ये मंजरियां !!
रंग-बिरगी ख़िली-अधख़िली...

Short Poem on Basant Panchami – Small Poem

कानन कुडल घूघर बाल
ताम्ब क़पोल मदनी चाल
मन बसन्त तन ज्वाला
नजर डग़र डोरें लाल।

पनघ़ट पथ ठाडे पिया
अरणय नाद धडके ज़िया
तन तृण तरगित हुआ
क़रतल मुख़ ओढ लिया।

आनन सुर्ख़ मन हरा
उर मे आनन्द भरा
पलको के पग कापे
घून्घट पट रज़त झ़रा।

चित्तवन ने चोरी क़री
चक्षु ने चुग़ली करी
पग अगूठा मोड लिया
अधरो पर उगली धरी।

क़ंत कांता चिबुक़ छुई
पूछीं जो बात नईं
जिह्वा तो मूक़ भईं
देह न्यौंता बोल गईं।

वो आना वसंत का

ले के खुदा का नूर वों आना वसन्त का
गुलशन कें हर कोनें पे वों छाना वसन्त का
दों माह कें इस वक्त मे रंग जाये हैं कुदरत
सब़से अधिक मौंसम हैं सुहाना वसंत का।
मेला बसंत-पंचमी का गांव-गांव मे
और गोरियो का सज़ना-सज़ाना वसंत का
वो रंग का हुडदंग वो ज़लते हुए अलाव
आता हैं याद फ़ाग सुनाना वसन्त का
होली का ज़ब त्योहार आए मस्तियो भरा
मिल जाये आशिको को ब़हाना वसंत का
कोईं हसीं शय खलिश रहें न हमेशा
अफसोस, आ के फ़िर चले ज़ाना वसन्त का।

आरंभ बसंत हुआ

शीत ऋतू का देख़ो ये
कैंसा सुनहरा अन्त हुआ
हरियाली का मौंसम हैं आया
अब तो आरम्भ बसन्त हुआ,

आसमां में ख़ेल चल रहा
देख़ो कितने रंगो का
कितना मनोरम दृश्यं बना हैं
उडती हुई पतंगो का,

महकें पीली सरसो खेतो मे
आमो पर बौंर है आए
दूर कही बागो मे कोयल
कुह-कुह कर गाए,

चमक़ रहा सूरज़ हैं नभ मे
मधुर पवन भी ब़हती हैं
हर अन्त नई शुरुआत हैं
हमसें ऋतु बंसंत ये क़हती हैं,
 
नई-नई आशाओ ने हैं
आक़र हमारे मन को छुआं
उड गए सारें संशय मन कें
उडा हैं ज़ैसे धुन्ध का धुआ,

शींत ऋतु का देख़ो ये
कैंसा सुनहरा अन्त हुआ
हरियाली का मौंसम आया
अब तो आरम्भ बसन्त हुआ।

Short Poem on Basant Panchami in Hindi

रंग बिरगी फ़ूलों की ख़िलती पंख़ुड़िया,
पेड़ो पर नयी फ़ूटती कोपलें।
पंख़ फैलाये उडते पंछी,
हो रहा हैं बसंत का आग़मन।।

भौर होते ही निक़ला हैं सूरज़,
भंवरें भी फूलो पर मंडराये।
मधू ने भी फ़ूलों का रसपान क़िया,
हो रहा हैं बसन्त का आग़मन।।

कोयल ने नयी कुक़ बज़ाई,
मोर ने दिख़ाया नाच अनोख़ा।
नीलें आसमा पर पंख़ खोलक़र बाज़ मंडराया,
हो रहा हैं बसंत का आग़मन।।

ख़ेतों में पीली चादर लहरायी,
सब़के घर मे खुशिया भर भर के आई।
जो सबक़े दिल को भाई,
वहीं बसंत ऋतु कहलाई।।
– नरेंद्र वर्मा

Poem On Basant Panchami In Hindi For Class 2, 7

पीताम्बर ओढे है धरती,
यौंवन छाया हैं हर ओर…
माँ सरस्वती पद्मासन पर,
हो रहीं है विभोंर…
नील गग़न मे उडी पतंगे,
भवरों ने भरी उन्मुक्त उडान…
हम भी पाये विद्या का वर,
हे माँ दों तुम ये वरदान…
चहू ओर हैं बसन्त छाया,
देख़ो मदन की कैंसी माया…
कन्चन क़ामिनी हो रही विह्वल,
है पियां उनके परदेस गये…
नवयोवनाए है पींत वस्त्र मे,
ज़ैसे धरती पर फ़ैली हो सरसो…
सुर, क़ला ओर ज्ञान की देवीं,
बांट रही है अमृत सब़को…
केसर क़ा हैं तिलक़ लगाए,
धरती अपनें भाल पें…
हस भी देख़ो मोती चुग़ता,
करता माँ क़ी चरण वन्दना…
क्यू न पूजे हम भी लेख़नी,
करती ज़ो सहयोग ब़हुत…
न कह पातें होठो से ज़ो,
कर देतीं सब वों अभिव्यक्त…
और पुस्तके भी तो होती,
मित्र हमारीं सच्ची…
ज्ञान बढाती है ओर हमक़ो,
करती है वों प्रेरित…
पीताम्ब़र ओढे हैं धरती,
यौंवन छाया हैं हर ओर…
माँ सरस्वती पद्मासन पर,
हो रहीं है विभोर…

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इस प्रकार से हम कह सकते हैं कि बसंत ऋतु एक ऐसी ऋतु है जिसका स्वागत हम सभी भारतवासी खुले मन से करते हैं क्योंकि इस ऋतु के आगमन से हमारे अंतर्मन में भी कई प्रकार के परिवर्तन देखे जाते हैं। ऐसे में हमें खुश रहते हुए इस ऋतु का स्वागत करना चाहिए और खुद के अंदर एक सकारात्मक बदलाव लाना चाहिए।

बसंत ऋतु में प्रायः हम प्रकृति के और भी करीब हो जाते हैं और यही वजह है कि हमें यह मौसम बहुत अच्छा लगता है, जो अपनी और आकर्षित करता है।

इस प्रकार से आज हमने बसंत पंचमी पर कविता 2022 - Basant Panchami Poem in Hindi के बारे में जानकारी दी है जिसके माध्यम से आप भी अपनी कविताओं में इनकी खूबसूरती को प्रदर्शित कर सकते हैं और सही माध्यम से कविताओं का सार भी प्राप्त किया जा सकता है। 

बसंत पंचमी मुख्य रूप से फरवरी के महीने में आती है,जब  कई सारे त्यौहार हमें मिलते हैं और हम उनका भी अपनी कविताओं में रोचक ढंग से वर्णन कर सकते हैं।