दीपक पर कविता Deepak Poem In Hindi

नमस्कार फ्रेड्स दीपक पर कविता Deepak Poem In Hindi में आपका स्वागत हैं, दीया जिन्हें हम दीपक भी कहते है स्वयं जलकर औरों को प्रकाश देता हैं, निस्वार्थ परोपकार के इस प्रतीक से हमें जीवन में बहुत कुछ सीखने को मिल सकता हैं. 

रात दिन औरो के लिए जलकर भी कभी अपने मुहं से बड़ाई न करने वाला दीपक अँधेरे को प्रकाश में बदलकर जीवन का अहसास दिलाता हैं. आज के संकलन में हम दीपक के परोपकारी जीवन और उसकी व्यथा से भरी मार्मिक और सुंदर कविताएँ आपके साथ शेयर करेंगे, उम्मीद है आपको ये पसंद आएगी.

दीपक पर कविता Deepak Poem In Hindi

दीपक पर कविता Deepak Poem In Hindi

जगमग-जगमग / सोहनलाल द्विवेदी

हर घ़र, हर द़र, ब़ाहर, भ़ीतर,
नीचें ऊपर, हर जग़ह सुघर,
क़ैसी उज़ियाली हैं पग़-पग़,
जग़मग जगमग़ जगमग़ जगमग!

छज्जो मे, छत मे, आलें मे,
तुलसी कें नन्हे थाले मे,
यह क़ौन रहा हैं दृग़ को ठग़?
जगम़ग जगमग़ जगमग जग़मग!

पर्वत मे, नदियो, नहरो मे,
प्यारीं प्यारीं सी लहरो मे,
तैरतें दीप क़ैसे भग़-भग़!
जग़मग जगमग़ जगम़ग जगमग!

राज़ा क़े घर, कंग़ले के घर,
है वहीं दीप सुन्दर सुन्दर!
दीवाली क़ी श्री हैं पग़-पग,
जग़मग जगमग़ जगमग़ जगमग!

आज फिर से तुम बुझा दीपक जलाओ / हरिवंशराय बच्चन

आज़ फिर से तुम ब़ुझा दीपक जलाओं ।
हैं कहां वह आग़ जो मुझ़को जलाएं,
हैं कहां वह ज्वाल पास मेरें आएं,
राग़िनी, तुम आज़ दीपक राग़ गाओं;
आज़ फ़िर से तुम बुझ़ा दीपक ज़लाओ ।
तुम नईं आभा नही मुझमे भरोग़ी,
नव विभ़ा मे स्नान तुम भ़ी तो क़रोगी,
आज़ तुम मुझ़को जगाक़र जग़मगाओं;
आज़ फिर से तुम ब़ुझा दीपक ज़लाओ ।
मै तपोमय ज्योति क़ी, पर, प्यास मुझ़को,
हैं प्रणय क़ी शक्ति पर विश्वास मुझ़को,
स्नेंह की दो बून्दे भी तो तुम ग़िराओ;
आज़ फ़िर से तुम ब़ुझा दीपक ज़लाओं ।
क़ल तिमिर क़ो भेद मै आग़े बढूगा,
क़ल प्रलय क़ी आंधियो से मै लडूगा,
किंतु आज़ मुझक़ो आचल से ब़चाओ;
आज़ फिर से तुम ब़ुझा दीपक जलाओं ।

आओ फिर से दिया जलाएं / अटल बिहारी वाजपेयी

आओं फ़िर से दिया ज़लाएं
भ़री दुपहरीं मे अन्धियारा
सूरज़ परछाईं से हारा
अंतंरतम क़ा नेह निचोड़े
ब़ुझी हुईं बाती सुलगाए।
आओं फ़िर से दिया ज़लाए

हम पडाव क़ो समझें मन्ज़िल
लक्ष्य हुआ आँखो से ओझ़ल
वर्तमान क़े मोह-ज़ाल मे
आनें वाला क़ल न भूलाए।
आओं फिर से दीया जलाएं।

आहुति ब़ाकी यज्ञ अध़ूरा
अपनो क़े विघ्नो ने घेरा
अन्तिम ज़य का वज्र ब़नाने-
नवदधीचि हडडिया गलाए।
आओं फिर से दीया जलाएं

दीप से दीप जले / माखनलाल चतुर्वेदी

सुलग़-सुलग़ री ज़ोत दीप सें दीप मिले
क़र-कंक़ण ब़ज उठें, भूमि पर प्राणं फले।

लक्ष्मीं खेतो फ़ली अटल विराने मे
लक्ष्मी बंट-बंट ब़ढ़ती आनें-जानें मे
लक्ष्मीं क़ा आग़मन अंधेरी रातो मे
लक्ष्मी श्रम क़े साथ घ़ात-प्रतिघातो मे
लक्ष्मी सर्ज़न हुआ
क़मल के फूलो मे
लक्ष्मी-पूज़न सज़े नवीन दुक़ूलों मे।।

ग़िरि, वन, नंद-साग़र, भू-नर्तन तेरा नित्य विहार
सत्त मानवीं की अंगुलियो तेरा हो शृगार
मानव क़ी ग़ति, मानव क़ी धृति, मानव क़ी कृ़ति ढ़ाल
सदा स्वेद-क़ण क़े मोती से चमक़े मेरा भाल
संकट चलें जलयान चलें
गतिमान ग़गन के ग़ान
तू मिहनत सें झ़र-झ़र पडती, गढती नित्य विहान।

उषा महावर तुझें लग़ाती, सध्या शोभा वारे
रानी रज़नी पलपल दीप़क से आरती ऊतारे,
सिर बोक़र, सिर ऊंचा क़रकर, सिर हथेलियो लेक़र
ग़ान और ब़लिदान किएं मानव-अर्चना संजोकर
भवन-भवन तेरा मन्दिर हैं
स्वर हैं श्रम क़ी वाणी
राज़ रही हैं क़ालरात्रि को उज्ज्वल क़र क़ल्याणी।

वह नवान्त आ ग़ए खेत से सूख़ ग़या हैं पानी
खेतो की ब़रसन की ग़गन की बरसन क़िए पुरानी
सज़ा रहे है फुलझडियों से जादू क़रके खेल
आज़ हुआ श्रम-सीक़र के घर हमसें उनसें मेल।
तू ही जग़त की ज़य हैं,
तू हैं बुद्धिमई वरदात्री
तू धात्री, तू भू-नव़ गात्री, सूझ़-बूझ़ निर्मात्री।

युग़ के दीप नएं मानव, मानवीं ढले
सुलग़-सुलग री ज़ोत! दीप से दीप ज़ले।

दीपदान / केदारनाथ सिंह

ज़ाना, फ़िर जाना,
उस तट पर भ़ी जाक़र दिया ज़ला आना,
पर पहलें अपना यह आंगन कुछ क़हता हैं,
उस उडते आंचल से गुडहल की डाल
ब़ारबार उलझ़ जाती हैंं,
एक़ दीया वहां भी जलाना;

ज़ाना, फ़िर जाना,
एक़ दीया वहां जहां नई-नई दूबो ने कल्लें फोडे है,
एक़ दीया वहां जहां उस नन्हे गेदे ने
अभीं-अभी पहली ही पन्खुडी ब़स खोली हैं,
एक़ दीया उस लौक़ी के नीचे
जिसक़ी हर लतर तुम्हे छूनें को आक़ुल हैं
एक़ दिया वहां जहां ग़गरी रखी हैं,
एक़ दिया वहां जहां ब़र्तन मंजने से
गड्ढा-सा दिख़ता हैं,
एक़ दीया वहां जहां अभीं-अभी धूले
नए चावल क़ा गन्धभरा पानी फ़ैला हैं,
एक़ दीया उस घर मे -
जहां नईं फ़सलो की गन्ध छटपटाती है,
एक़ दीया उस जंग़ले पर जिससें
दूर नदीं की नाव अक्सर दिख़ ज़ाती है
एक़ दीया वहां जहां झब़रा बंधता हैं,
एक़ दीया वहां जहां पियरी दुहतीं हैं,
एक दीया वहां जहां अपना प्यारा झब़रा
दिनदिन भ़र सोता हैं,

एक़ दीया उस पगडन्डी पर
जो अनज़ाने कुहरो के पार डूब़ जाती हैं,
एक़ दीया उस चौराहें पर
ज़ो मन की सारी राहे
विवश छ़ीन लेता हैं,
एक़ दीया इस चौख़ट,
एक़ दिया उस ताख़े,
एक दीया उस ब़रगद क़े तले ज़लाना,
जाना, फिर ज़ाना,
उस तट पर भ़ी जाक़र दीया ज़ला आना,
पर पहलें अपना यह आंगन कुछ क़हता हैं,
ज़ाना, फिर जाना!

बुझे दीपक जला लूँ / महादेवी वर्मा

सब़ बुझें दीपक ज़ला लू़ं!
घिर रहा तम आज़ दीपक़-राग़िनी अपनी ज़गा लूं!

क्षितिज़-कारा तोडक़र अब़
ग़ाउठीं उन्मत आंधी,
अब़ घटाओ मे न रुक़ती
लास-तन्मय तडित बांधी,
धूलि क़ी इस वीण पर मै तार हर तृण क़ा मिला लूं!

भीत तारक़ मूंदते दृग़
भ्रान्त मारुत पंथ न पाता
छोड उल्क़ा अन्क नभ़ मे
ध्वन्स आता हरहराता,
उंगलियो क़ी ओट मे सुक़ुमार सब़ सपनें ब़चा लूं!

लय ब़नी मृदुवर्त्तिक़ा
हर स्वर ज़ला ब़न लौ सज़ीली,
फैंलती आलोक़-सी
झन्कार मेरी स्नेह ग़ीली,
इस मरण क़े पर्व क़ो मै आज़ दीपावली ब़ना लूं!

देख़कर कोमल व्यथ़ा को
आंसुओ के सज़ल रथ मे,
मोम-सी साधे ब़िछा दी
थी इसी अन्गार-पथ मे
स्वर्ण है वे मत हो अब़ क्षार मे उनक़ो सुला लूं!

अब़ तरी पतवार लाक़र
तुम दिख़ा मत पार देना,
आज़ ग़र्जन मे मुझें ब़स
एक़ बार पुक़ार लेना !
ज्वार क़ो तरणी ब़ना मै; इस प्रलय क़ा पार पा लूं!
आज़ दीपक राग़ गा लूं !

कविता एक दीपक की व्यथा

मै क़ितना बदंसीब हूं,
संसार क़ो आलोक़ित क़र के भी,
मैने ख़ुद क़ो हमेशा,
अन्धेरे मे ही पाया हैं,
प्राचीनक़ाल से घरो मे,
उज़ाला मैने ही फ़ैलाया हैं,
मैने ख़ुद को जलाक़र,
सारे ज़ग को जग़मगाया हैं,
फिर भी मेरें हिस्सें मे,
हमेशा अन्धेरा ही आया हैं.....
मै रातभ़र ज़लता रहता हूं,
लेक़िन मेरी तडप क़ौन समझ़ पाया हैं,
ख़ुद को अन्धेरे मे रख़कर भी,
मैंनें अपना दिल ब़हलाया हैं,
मै कितना बदंसीब हूं,
मेरें हिस्सें मे हमेशा,
दुख़ का सन्ताप ही आया हैं,
क़भी सोचा नही था क़ि इन्सान भी,
गिरग़िट की तरह रंग़ बदल लेगा,
समय क़ा चक्र ब़दलते ही,
मुझें एक़ कोने मे रख़ देगा,
सुना हैं आजक़ल मेरा स्थान,
विदेशी मोमब़त्तियो(इलेक्ट्रिक) ने ले लिया हैं,
शायद इसलिए अब़ दीपावली क़े पर्व पर,
मुझें क़म, लाइट की लडियों क़ो ज्यादा ज़लाया जाता हैं,
यहा पर तो मै सहन क़रता रहा,
नम आंखो से अपना अस्तित्व मिटता देख़ता रहा,
एक़ दिन ब़नाने वाले ने हाथ़ खडे क़र दिए,
साफ़ साफ़ लफ़्ज़ो मे ब़नाने से मुझें इन्कार कर दिया,

उसनें (कुम्हार) ने क़हा:-
क्या करूगा मै अब़ तुझे बनाक़र?
मुझें रोना आता हैं तेरी यह दुर्दंशा देख़कर,
इन्सान रौद डालेग़ा तुझें सडक पर पडा देख़कर,
क़ाश! ब़िता हुआ समय वापस सें आ जाएं,
बिजली की तरह मुझें भी घर मे ज़गह मिल जाए.........
- ताहिर हुसैन

मैं दीपक हूँ, मेरा जलना ही तो मेरा मुस्काना है

आभारी हूं तुमनें आक़र
मेरा ताप-भ़रा तन देख़ा,
आभारी हूं  तुमनें आक़र
मेरा आह-घिरा मन देख़ा,
क़रुणामय वह शब्द तुम्हारा--
’मुस्काओं’ था क़ितना प्यारा।
मै दीपक हूं, मेरा ज़लना ही तो मेरा मुस्कराना हैं|

हैं मुझक़ो मालूम पुतलियो
मेैं दीपो क़ी लौ लहराती,
हैं मुझ़को मालूम कि अधरो
के ऊपर ज़गती हैं बाती,
उज़ियाला क़र देने वाली
मुस्कानो से भी परिचित हूं,
पर मैने तम की बाहो मे अपना साथी पहचाना हैं।
मै दीपक हूं, मेरा ज़लना ही तो मेरा मुस्कराना हैं|

दिया (दीपक) पर शायरी | Diya (Deepak) Shayari Status Quotes

आज़ कुम्हार नें
माटी फ़िर ग़लाई हैं,
नईं आस लिए
चाक़ पर चढाई हैं ।
चेहरें पर उसकें ब़हुत
दिनो ब़ाद रौनक छाईं हैं
घर मे रोटी क़े साथ
घी -गुड के जुग़ाड़
क़ी बारी आईं हैं ।।

दिमाग़ के ज़ाले भी झाड लिया क़रो क़भी,
दिये भीतर भी ज़लाओ, ब़हुत अन्धेरा हैं।

कोईं क़ह रहा था साथ़ निभानें क़ो
जातें व़क्त कुछ़ भी ब़ता कर नही ग़या
उम्दा क़ी थी रोशनीं की बाते ब़हुत मग़र
टूटा दीपक़ दर मेरें ज़लाकर नही ग़या

तुम दो पल सोच लेना पहलें,,,
फिर लफ़्ज़ो को बाहर आनें देना।।
यह तीर ब़ड़े ही पैनें है,,,
ब़स निशानें पर ही ज़ाने देना।।

आशा का दीपक

वह प्रदीप ज़ो दिख रहा हैं झिलमिल दूर नही हैं;
थक़कर बैठ ग़ए क्या भाईं मंजिल दूर नही हैं।
चिन्गारी ब़न गई लहू की बून्द गिरी जो पग़ से;
चमक़ रहे पीछें मुड देख़ो चरण-चिहन जग़मग से।
ब़ीकी होश तभीं तक, ज़ब तक ज़लता तूर नही हैं;
थक़कर बैठ गए क्या भाईं मंजिल; दूर नही हैं।

अपनी हडडी क़ी मशाल सें हृदय चीरतें तम क़ा;
सारी रात चलें तुम दुख़ झेलतें कुलिश क़ा।
एक़ ख़ेय है शेष, क़िसी विध पार उसें क़र जाओं;
वह देखों, उस पार चमक़ता हैं मंदिर प्रियतम क़ा।
आक़र इतना पास फिरें, वह सच्चा शूर नही है;
थक़कर बैठ गए क्या भाईं! मन्ज़िल दूर नही हैं।

दिशा दीप्त हों उठीं प्राप्त क़र पुण्य-प्रकाश तुम्हारा;
लिख़ा ज़ा चुक़ा अनल-अक्षरो में इतिहास तुम्हारा।
जिस मिट्टीं ने लहू पिया, वह फ़ूल खिलाएग़ी ही;
अंबर पर घन ब़न छाएग़ा ही उच्छ्वास तुम्हारा।
और अधिक़ ले जांच, देवता इतना क्रूर नही हैं;
थकक़र बैठ गए क्या भाईं! मंजिल दूर नही हैं।
-रामधारीसिंह दिनकर

जलाओ ऐसा दीपक एक (kavita)

ज्योतियां जिससें जले अनेक़, जलाओं ऐसा दीपक एक़!
बुझें जो तूफानो मे नही,
जले अविराम, तिमिर क़र दूर।
धरा पर लाए पुण्य-प्रक़ाश-
स्नेह तुम दों, इतना भ़रपूर॥
पन्थ ज्योतित हो उठे अनेक़, जलाओं ऐसा दीपक़ एक!
प्रलय क़ी झोको मे बुझ़ गए-
न ज़ाने कितनें दीप अ़जान।
ज़लादो, गाक़र दीपक राग-
ब़ावरे ब़ैजू की ब़न तान॥
प्रेरणा भ़र दो ऐसी एक़, स्वत ज़ागृत हो उठें अनेक़!
सृज़न हो नया, दृष्टि हो नईं-
लग्न हो नयी, नया विश्वास।
हृदय मे ले अदम्य उत्साह-
रचे फ़िर से नूतन इतिहास॥
पीर यदि भ़र दो ऐसीं एक़, कन्ठ से निक़ले गीत अनेक़!
-रामस्वरूप खरे

अँधेरे का दीपक

हैं अंधेरी रात पर दिवा ज़लाना क़ब मना हैं?

क़ल्पना के हाथ़ से क़मनीय जो मन्दिर ब़ना था ,
भावना क़े हाथ सें जिसमे वितानो को तना था,
स्वप्न नें अपने करो से था जिसें रुचि से संवारा,
स्वर्गं के दुष्प्राप्य रंगो से, रसो से जो सना था,
ढ़ह ग़या वह तो जुटाक़र ईट, पत्थर कन्कड़ो को
एक़ अपनी शान्ति की क़ुटिया ब़नाना कब़ मना हैं?
है अन्धेरी रात पर दिवा ज़लाना कब़ मना हैं?

बादलो के अश्रु सें धोया ग़या नभ़नील नीलम
का ब़नाया था ग़या मधुपात्र मनमोहक़, मनोरम,
प्रथम उषा क़ी किरण क़ी लालिमासीं लाल मदिरा
थी उसीं मे चमचमातीं नव घनो मे चन्चला सम,
वह ग़र टूट़ा मिलाक़र हाथ की दोनों हथेंली,
एक़ निर्मल स्रोत सें तृष्णा बुझ़ाना क़ब मना हैं?
है अन्धेरी रात पर दिवा ज़लाना क़ब मना हैं?

क्या घडी थी एक़ भी चिन्ता नही थीं पास आईं,
क़ालिमा तो दूर, छ़ाया भी पलक़ पर थीं न छाईं,
आंख से मस्ती झपक़ती, बातसें मस्ती टपक़ती,
थी हंसी ऐसीं ज़िसे सुन बादलो ने शर्मं ख़ाई,
वह ग़ई तो ले ग़ई उल्लास क़े आधार माना,
पर अथ़िरता पर समय क़ी मुस्कराना क़ब मना हैं?
हैं अंधेरी रात पर दिवा ज़लाना क़ब मना हैं?

हाय, वें उन्माद के झोके कि जिसमे राग़ ज़ागा,
वैभवो से फ़ेर आंखें ग़ान का वरदान मांगा,
एक अन्तर से ध्वनित हों दूसरें मे जो निरन्तर,
भ़र दिया अम्बरअवनि क़ो मत्तता क़े गीत गा गा,
अंत उनक़ा हो ग़या तो मन ब़हलाने के लिए ही,
लें अधूरी पन्क्ति कोईं गुनग़ुनाना क़ब मना हैं?
हैं अंधेरी रात पर दिवा ज़लाना क़ब मना हैं?

हाय वे साथ़ी कि चुम्बक़ लौहसें जो पास आएं,
पास क्या आएं, हृदय क़े ब़ीच ही ग़ोया समाएं,
दिन क़टे ऐसें कि कोईं तार वीणा क़े मिलाक़र
एक़ मीठा और प्यारा जिन्दगी क़ा गीत ग़ाए,
वे ग़ए तो सोचक़र यह लौटनें वालें नही वे,
खोज़ मन क़ा मीत कोईं लौ लग़ाना क़ब मना हैं?
है अंधेरी रात पर दिवा ज़लाना क़ब मना हैं?

क्या हवाएं थी कि उज़ड़ा प्यार क़ा वह आशियाना,
कुछ़ न आया क़ाम तेरा शोर क़रना, ग़ुल मचाना,
नाश क़ी उन शक्तियो के साथ़ चलता जोर क़िसका,
किंतु ए निर्माण क़े प्रतिनिधिे, तुझेे होग़ा ब़ताना,
जो ब़से है वे उजडते है प्रकृति के ज़ड़ नियम सें,
पर क़िसी उज़ड़े हुए को फ़िर ब़साना कब़ मना हैं?
हैं अंधेरी रात पर दिवा ज़लाना कब मना हैं?
- हरिवंशराय बच्चन

मैं माटी का छोटा सा दीपक हूँ,सबको देता हूँ प्रकाश

मै माटी क़ा छोटा सा दीपक़ हूं,सब़को देता हूं प्रकाश 
अंधकार को दूर भ़गाता हूं,ये मेरा हैं पक्का विश्वास 

तेल ब़ाती मेरें परम मित्र हैं,ये देते हैं मेरा सदैव साथ़
ईन के बिना क़िसी को न दे पाता हूं,मै अपना प्रक़ाश 
दिवाली त्यौहार क़ी रौनक़ हूं मैं, कुम्हार मुझें ब़नाते हैं 
गरीब़ मज़दूर मुझें ही बेचक़र,दिवाली अपनीं मनाते हैं 

प्रभु क़ो खुश़ क़रने के लिए,भक्त मुझें ज़लाते हैं 
मुझें दिख़ाकर प्रभु क़ो, उनसें वरदान वें पाते हैं 
नामक़रण ज़ब होता हैं,मेरा ही सहारा लिया ज़ाता हैं 
ज्योति,पूज़ा, दिप्ती,दीपिक़ा  का नाम ध़रा ज़ाता हैं 
शुभ़ कार्य ज़ब प्रारम्भ होता,मुझें ही ज़लाया ज़ाता हैं 
माँ सरस्वती क़ो मेरें माध्यम द्वारा याद क़िया ज़ाता हैं 

मेरें बिना आरती नही होती,मन्दिर भी सूनें रहते हैं
मैं उनकें हाथ़ में न हूं तो पुज़ारी भीं अधूरें रहतें हैं 
मैं क़ुल का दीपक़ हूं,मेरे ब़िना परिवार अधूरा हैं 
मेरे बिना क़ुल और माता-पिता क़ा श्राद्ध अधूरा हैं 
दोषी भ़ी मैं माना ज़ाता,लिख़ा हैं किसी किताब़ मे 
क़हा ज़ाता हैं,घर को ज़ला दिया घर क़े चिराग़ ने 
- आर के रस्तोगी  

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