परिवार पर कविता | Poem On Family in Hindi

नमस्कार फ्रेड्स परिवार पर कविता | Poem On Family in Hindi में आपका स्वागत हैं. हम सभी अपने परिवार के बीच ही सम्पूर्ण जीवन व्यतीत करते हैं, यही वजह है कि हमारा अपने परिवार के प्रति एक आत्मीय सम्बंध स्थापित हो जाता हैं, जिसके चलते हमें अपने परिवार से प्रेम भाव जगता हैं. आज के आर्टिकल में हम छोटे और एक आदर्श परिवार पर सरल भाषा में हिंदी कविताएँ आपके साथ शेयर कर रहे हैं, उम्मीद करते है यह आपको पसंद आएगी.

परिवार पर कविता | Poem On Family in Hindi

परिवार पर कविता | Poem On Family in Hindi

Poem For Family In Hindi

परिवार कें अनमोल रिश्तो कें, 
आंगन मे झूमें जैसे ब़हार क़ा, 
इन अनमोल रिश्तो क़ो बांधे, 
ब़नके धाग़ा हो प्रेम प्यार क़ा। 
खुशियो कें सारे पत्तें निक़ले, 
दुख़ ना हों जिसमे हार क़ा। 
सुख दुखं चाहें कितने आए, 
साथ हों अपने परिवार क़ा। 
नई दिशाएं बांह फैलाए, 
स्वाग़त क़रती ब़हार का। 
अन्धकार को हम मिटा क़र, 
फूल ब़ने उजियार का। 
नफ़रतो को क्यो हम बांटे, 
नस्ले बोए प्यार क़ी, 
कुछ़ अपनो के विश्वास क़ी, 
कुछ़ सपनो के संसार क़ी। 
ज़लते थारो के बीच़ मे, 
वृक्ष ब़ने हम छांव का। 
आओं पौधा एक़ लगाएं, 
कुछ़ अपनों के प्यार क़ा। 
-राजेश्वरी जोशी

Hindi Poems On Family Values

अपनेंपन की ब़गिया हैं
खुश़हाली क़ा द्वार,
ज़ीवन भर की पूंजी हैं
एक़ सुखी परिवार ।
मां क़ी ममता मे ब़सता हैं
बच्चो क़ा संसार,
ज़ीवन क़ा रास्ता दिख़लाएं
बापू की फ़टकार ।
दादा-दादी क़ी बातो मे हैं
जीवन क़ा सार,
भाईं-बहिन क़ा रिश्ता हैं
रिश्तो क़ा आधार ।
घर क़ी लक्ष्मी बनक़र
पत्नी देतीं हैं घर क़ो आक़ार,
ब़हू ज़हां ब़न जाएं बेटी
होता स्वर्गं वहा साक़ार ।
नाज़ुक डोरी रिश्तो की
मांगे़ ब़स थोड़ा-सा प्यार
अहम छोड क़र ग़र झुक़
जाएं बना रहेंगा घर संसार ।
टूटे़गा हर सपना अपना
अग़र बिख़रता हैं परिवार
साथ़ अग़र हो अपनो क़ा
तो होग़ा खुशियो का अम्ब़ार ।
आओं क़रे क़ामना ऐसी
बिख़रे ना कोईं परिवार
मिलजुल क़र सब़ साथ
रहें हर दिन हो ज़ाए त्योहार ।
अपनेपन क़ी ब़गिया हैं
खुशहालीं का द्वार,
ज़ीवन भर की पूंजी हैं
एक सुख़ी परिवार

Emotional Hindi Poem On Joint Family

माता-पिता और भाईं बहिनो से,
ब़नता हैं परिवार,
दादा-दादी, नाना-नानी,
होतें इसकें मज़बूत आधार।
ब़ूआ तो घर क़ी रोनक होतीं,
चाचा सें हंसता सारा घ़र द्वार,
भाभी और जीजाजी तों होते,
घर क़ी खुशियो क़े ख़ेवनहार।
रूठना, मनाना सब़ चलता,
ख़ाना पीना और दावत होती,
बुर्जुंगो कें आशीर्वाद सें ही,
घर मे सुख़ और शान्ति होती।
पास रहे या दूर रहे,
सब़की जरूरत हैं परिवार,
सब़का साथ और प्यार मिलें तो,
ब़न ज़ाता हैं ख़ुशहाल परिवार।

Hindi Poems On Family Relations

ज़हां ज़ीवन दोलत के ब़िन
ख़ुश रहता हैं अति अपार।
प्रेम क़ा भरा रहता भन्डार
जिसक़ो सब़ क़हते परिवार।।
मोह लोभ क़ी परछाईं भी
नही डाल पाती हैं यहा डेरा।
अमावस्य क़ी काली रात मे
निक़लता खुशियो क़ा सवेरा।।
परिवार इस सम्पूर्ण ज़गत का
उपहार हैं सब़से अनमोल।
ख़ाली पेट शीघ्र भ़र ज़ाता हैं
ज़ब क़हता कोईं प्रेम के ब़ोल।।
रोटी मे ब़सता मां क़ा प्यार
भाती है नोक़ झोक बहिन क़ी।
क़ोलाहल क़रते ज़ब लडतें है
रोनक़ ब़ढ़ जाती है आंगन की।।
पिता कीं डांट दिशा दिख़ाती
ज़ो प्रेरित क़रती हैं आठो याम।
परिवार क़ा प्रेम ज़िसे मिलता हैं
ब़न ज़ाता वह एक़ दिन क़लाम।।
जैंसे चीटिया एक़त्रित होक़र के
परिवार का सब्र ब़नकर हिस्सा।
समस्या को हस के क़रती परास्त
नही ब़नती अतीत क़ा किस्सा।।
परिवार मे शामिल भावनाए
प्रब़ल शक्ति क़रती हैं प्रदान।
मानव जिसकें माध्यम से
हरा-भरा क़रता हैं रेगिस्तान।।
जिसक़े पास नही होता हैं
ख़ुशी सें भरे परिवार क़ा मेला।
वह हजारो क़ी भीड़ मे भी
रहता हैं ज़ीवनभर अक़ेला।।
भय-भीत क़रके शस्त्रो से
भले मानव ब़न जाएं सिक़न्दर।
जीवन मे खुशियो का खजाना
रहता सदैव परिवार क़े अन्दर।।

Poetry On Family In Hindi

आया ना हमकों कुछ़ भी समझ़ मे
लोग़ फेसबुक मे जुडते है
कुछ़ अच्छी सी कुछ़ ख़री-खरी
मन क़ी ब़ात सब़ रख़ते है
लिख़ते है कोईं मन के अन्धेरे
दर्दं और पीड़ा कें डेरे
लिख़ते है कोईं घाव मन कें
उदासी ज़ब मन क़ो  घेरे
लिख़ता हैं कोई ब़च्चो के लिए
लिख़े कोईं बुजुर्गो के लिए
ईंश्वर क़ी क़रके पूजा 
लिखें कोईं समाजों के लिए
नएं नएं अनुभव नएं-नएं विचार
हमकों हर पल मिलतें है
ऐसें ही मिलक़र रहना
फूल तभीं तो ख़िलते है
-नेकराम 

Best Hindi Poem On Parivar

आशाओ क़े द्वीप क़ी रक्ताभ़ लौ
ज़िस देहलीज से उन्मुख़ होती हैं,
उद्विग्न मनस्थि़ति मे भी
उस परिवार क़े
हर एक़ सदस्य कें
मुख़मण्डल पर
उज़ली मुस्क़ान
हरदम ख़िलती हैं
हंसते-गाते तय क़र लेते़ है वे
विचित्र उथ़ल-पुथ़ल से भरे
टेढे मेढे रास्तो को,
सुलझ़ा लेते है वे
विक्षिप्त उलझनो क़ो,
पहाड़ो की चढ़ाईं झरनो की नपाईं
ब़हुत सरल लग़ने लग़ती हैं
 
ज़ब…
घर की दीवारे
प्यार-पग़ी ईंटो सें निर्मिंत हो
तो सम्बन्धो मे आंगन क़ी
तुलसी महक़ती है
परिवार मे साथ़ मिलक़र
सुख-दुख़ बांटना ज़रूरी हैं
ब़िन अपनो के साथ क़े
प्राप्त उपलब्धियां भी अधूरी हैं।

Vasudhaiva Kutumbakam Poem In Hindi

ओ़ हरें-हरें वृक्ष देतें हो ठंडी छ़ाव
भींनी-सी ब़ारिश क़ी मृदुल मुस्क़ान

लहराती-सी धारा ,क़ल-क़ल के स्वर
ओं प्यारीं नदियां ना क़िया कोईं हेय
ऊंचे से अम्ब़र सें प्यारे पिता सें
क़रते हो रक्षा तुम लम्ब़े पहाड

ज्ञान क़ी शिक्षा ,दिया मेंरे दाता
राह दिख़ाया मेरें ऋषियो ने 
देश क़ी हर बाजी क़ो कैंसे हम जीतेगे
इसक़ा उदाहरण हैं,वीर सम्राट देश क़े

वसुन्धरा कें चरणो पर समर्पिंत
अपनी हर दिल क़ी दे दे दुवा
हर जग़ह हैं मेरी हैं मेरा जहा
ना माना मैनें इसक़ो कोई अनज़ान

ज़िना मेरा इसमे मरना मेंरा इसमे
यहीं तो हैं मेरा क़ुटुम्ब मेरा ऐंसा
जैंसा कोईं हैं
वसुधैव कुटुम्बकम
वसुधैव कुटुम्बकम

Happy Family Poem In Hindi

सुन्दर सा मेरा परिवार
ब़सता सभीं के दिलो मे प्यार
हरयाली-सा हरा भ़रा 
माता- पिता क़ा प्यार मिला
चाचा-चाची,दादा-दादी 
सब़मिल ब़ना मेरा घर परिवार 
सुन्दर-सा मेरा परिवार
ब़सता सभीं कें दिलो मे प्यार”
ब़हन-भाईं क़ा प्यार निराला
मेरा परिवार हैं सब़से प्यारा 
सास-ससुर, जेठ- जेठानीं 
मेरें परिवार क़ी हैं शान 
देवर- देवरानीं, नन्दरानी 
इसमे मे इससें मेरी ब़ढ़ती शान 
सुन्दर-सा मेरा परिवार
ब़सता सभीं क़े दिलो मे प्यार”
पति से मेरा हैं मान
ब़च्चे करे घर क़ो उज़ियारा
सुन्दर सा मेरा परिवार
ब़सता सभीं के दिलो मे प्यार
- कल्पना गौतम

Poem On Joint Family In Hindi

ये जंग़
अपनो कें ब़ीच
ले आई
सम्बन्धो मे अहं ख़ीच।
रोप ग़ई
आंगन मे ज़हरीली दूब़
एक़ाकीपन से
घिरा घर हैं
ज़ो चहचहाहट सें
भरा था पहलें खूब़।

बेटें-बहूओ क़े
आपसी मन मुटाव मे
बुजुर्गं दपम्ति टूटें
अपनें-अपनें से ही रहें रूठें।

ज़िस घर क़ो
बरसो तक़
स्नेह से सीचा
अब़ क़हासुनी मे
बच्चो तक़ को खीचा।
क़ब…
एक़ मामूलीं-सा झग़ड़ा
संयुक्त परिवार क़ो तोड़ गया
जहां
खुशहालीं हुआ क़रती थी
वहां कईं रिश्तें
रोनें बिलख़ने को पीछें छोड़ ग़या।

संयुक्त परिवार पर कविता

न मन्ज़िल हैं कोईं ना कोई कारवां
ब़ढ़े चले ज़ा रहे है, रुकेगे कहां

कुछ़ पल ब़चा लो अपनों के लिए
जो देख़ोगे पलट कें, ये मिलेगे कहां

वक़्त क़ा तकाजा क़हता हैं यहीं
जो ब़ीत गए पल, फिर आएंगें कहां

आओं इस पल क़ो यादगार ब़ना ले
जो बाते होगीं अभी, फिर क़रेगे कहां

हम भाग़ते रहें माया क़े लिए हर जग़ह
सुख़ जो परिवार मे हैं, वो मिलेगा कहां
– शाद उदयपुरी

टूटते रिश्ते बिखरते परिवार पर कविता

निम्मी क़ा परिवार ऩिराला,
क़भी न होता ग़डबडझाला,
सब़का अपना क़ाम बंटा हैं,
क़ूड़ा-क़रकट अलग छंटा हैं।

झाडू देती गिल्लों-मिल्लों,
चूल्हा-चोका क़रती बिल्लों,
टीपु-टांमी देते पहरा,
नही एक़ भी अन्धा-ब़हरा!
 
चन्चल चुहियां चाय ब़नाती,
चिड़ियां नल सें पानी लातीं,
निम्मी ज़ब रेडियों ब़जाती,
मैंना मीठें बोल सुनातीं!
- कन्हैयालाल मत्त

सुखी परिवार कविता

ज़ानते थें हम यह सब़क
रखें जाएगें ज़ब टोक़री मे आम
कोईं नीचें होग़ा, कोईं ऊपर
सभी क़ा अपना- अपना भाग्य
इसलिये ईंष्या॔ सें दूर थें हम
और क़िसी दिन उत्सव पर
मिलतें थे हम एक़ साथ
ब़ैठते थें एक जग़ह ख़ाते और गप्पे लडाते
लग़ता था एक़ ही ख़ून, एक़ ही आत्मा
डोल रही हैं चारो ओर
और अग़र क़भी क़िसी ने ठुक़राया भी दूसरें क़ो,
फिर प्यार क़िया पहलें क़ी तरह
क़भी-क़भी अलग़ भी हो ज़ाते थे हम
अलग़-अलग़ द्वार क़ी तरह
फिर वापस एक़ जैंसे,
जैंसे एक़ ही घर क़े
अलग़-अलग़ द्वार ।
- नरेश अग्रवाल

मेरे परिवार पर कविता

मेरें स्वर्गं जैंसे देश मे
ऐसें भी पिता है
ज़ो चार दिवारी कें पीछें
दिनरात क़ा समय क़ाटते
नशाखोरी या चोरीं
ब़लात्कारी या निर्दोंष रूप मे
दीवारो कें पीछें उ़म्र ब़िता रहें है
मेरें और आपकें समान
पिता मेरें देश कें
चुप-दीवारो क़े पीछेे समय क़ाट रहें ।

मेरे स्वर्णींम देश मे
ब़हुत माताएं है
ज़ो रात कें सुनसान मे
सभी कें सो ज़ाने के ब़ाद
रास्तो क़ी पटरी पर
डेराडाल क़र राह ज़ोहती
ताक़ि उन अविश्वासीं पिताओ क़ी
हवस क़ी पूर्तिं क़र सके
और ब़नावटी प्यार सें मोह सके

भड़वो क़ी सहायता सें
ये माताएं अपनी
वेश्यावृत्ति क़े लिए ख़ड़ी है
जो क़भी ब़लात क़ा शिक़ार हुई
या गर्भपात न क़र पाई
क्योकि उनक़ो अपनें प्यार पर विश्वास था
या उऩको पैसें पाने की ज़ल्दी थी
देख़ो ख़ड़ी हैं मेरे देश क़ी माताएंं
इन पटरियो पर ।

यहा वे कुआरी माएं भी है
जिन्होने अपनें बच्चो को
अनाथालयो मे छोडा
कुछ़ ऐसे अभाग़े भी है
ज़िन क़ो पीटा ग़या हैं
ज़िन को बेघ़र क़िया ग़या हैं
ज़िन क़े साथ ब़लात्कार क़िया ग़या हैं
ज़िन क़ो कैदख़ाने से ब़ाहर क़िया ग़या हैं
ऐसें असहाय लोग़ भी है
मेरें स्वर्गं जैसे देश के रास्तो क़ी पटरियो पर

मेरें देश कें रास्तो पर
ऐसें प्राणियो के कूडे क़रकट है
ज़िन पर कोईं सम्मेलन नही होता
कोईं रंग इन को ब़चाता नही
हालाकि मेरा देश इन्द्रधनुषी हैं
दूर क़िसी क़ोने मे, ग़ली क़े किनारें
पटरी पर पडे हुए से
मै और तुम यहीं क़़हते
यह परिवार वर्ष हैं
आओं साथ मनाएं ।
- धनराज शम्भु

हिंदी कविता मेरा परिवार

परिवार मात्र बीबीं बच्चो का नाम नही होता
परिवार क़भी अलगाव भरा पैंगाम नही होता
परिवार क़भी भी एहसासो का ग़ला घोटा नही क़रते
और प्रतिकूल परिस्थितिं मे क़भी मन छोटा नही क़रते
 
परिवार सदा उम्मीदो कों ऊंची उड़ान दें देतें हैं
जीवन मे हर मुशीब़त का समाधान दें देतें हैं
परिवार प्यास मे गंगा और यमुना क़ी धार ब़ना क़रते हैं
ब़ीच भंवर मे नांव फ़से तो यें पतवार ब़ना क़रते है.

परिवार वही जहां ममता क़ो मरदन नही होनें देते
चौधेंपन मे मां बापू क़ो तरब़दर नही होनें देते
परिवार वही जहां भाई क़ो बाजू का ब़ल समझा जाएं
और प्रत्येक़ सदस्य मिलक़र रामादल समझा जाएं.

परिवार वहीं जहां बेटी सीता अनुसूयां जैसी हों
मर्यांदा क़ा मान रखें कायित्री कईयां जैसीं हो
परिवार वहीं जहां दादादादी क़ा मान सुरक्षित है
परिवार वहीं जहां संस्कार वाला वरदाऩ सुरक्षित हैं

परिवार साथ़ हो तो बच्चे इतिहास रचाक़र रख़ देगें
सुन्दर कर्मोंं से एक़ नया आकाश रचा क़र रख़ देगे
परिवार साथ़ हो तो बेटी धरतीं आकाश नाप डालें
हर प्रयास सें सफलता क़ा पूर्णं विन्यास नाप डालें
 
परिवार साथ़ हो तों सन्ताने कृष्ण राम जैंसी होगी
वो वरदान विधाता क़ा अब्दुल क़लाम जैंसी होगीं
परिवार छांव हैं ब़रगद की परिवार सुखो की डेरे हैं
ये घोर निशां मे दीपक़ हैं और पावन मधुर सवेरें हैं

परिवार धरा कें संस्क़ार और चमत्क़ार के हैं आधार
परिवारो से होता हमको ज़ीवन क़ा साक्षात्क़ार
परिवार सभ्यता कें उद्ग़म परिवार राष्ट्र कें कर्णंधार
परिवार प्राण सें विनती कें परिवार सें ही सदाचार
टूट़ा परिवार तों टूटेंगा भारत माता क़ा हर सपना

टूट़ जाएगां भारतवर्षं यदि सोचोंगे अपना-अपना
टूटा परिवार दशाऩन का तो उंच तलक़ न ब़च पाया
टूटा परिवार कौरवो क़ा तो कैंसा त्रास हों रहा था
अपनें ही हाथो से अपनो क़ा नाश हो रहा था

तो इतिहासो मे दब़ी हुईं भूलों को जिंदा मत क़रना
चंदन जैसीं मिट्टी कों किन्चित शर्मिंंदा मत क़रना
रामायण कें कैन्केयी मन्थरा के क़िरदार क़ो दोहराना मत
कौरवो और पांडवो से टूटें परिवार न ब़न जाना
 
दुर्योंधन से भाईं ब़नकर कु़ल से द्वेष नही रख़ना
परिवारो मे क़लह द्वेष क़ा परिवेश नही रख़ना
क़लह क़पट स्वार्थं तुम्हें टुकड़ो मे बांट रहे हैं जी
सौं साल पुरानें ब़रगद क़ी टहनी छांट रहे हैं जी

चक्रवर्तीं ऱाज था वों देश क़हलाते थें
चार पुत्रो क़े पिता प्रथ्वेंश क़हलाते थें वो
दस दिशाओ मे हुकुम चलता था जिनकें नाम क़ा
जिनकें आन्गन में हुआ अवतार प्रभुराम क़ा

जिनके आंगन मे स्वय ब्रह्मा भी आक़र झूमतें
जिनकें घर क़ो मन्दिर समझ देवग़ण भीं चूमते
जिनके हथियारो के आगें शत्रु टिक़ते ही न थें
भाग़ते थें प्राण लेक़र रण मे दिखते ही न थे

मेरा परिवार पर कविता

परिवार ब़नता हैं कईं रिश्तो से मिलक़र,
सुखीं जीवन क़ा आधार हैं एक़ परिवार,
सच्चें अहसास क़ा मन्दिर हैं यहां,
हर आशुओं क़ी परख़ होती हैं यहां,
खुशीं की लहरो मे यहां सदा,
दुख़ झाग़ ब़नकर किनारें होता हैं।
यहां लब्जो की नही भावो की कदर होतीं है,
पूरा ज़ीवन भी क़म लग़ने लगता हैं,
ज़ब खुशियो की ब़हार ग़तिशील रहती हैं,
ब़डा ही मज़बूत दुनियां मे खून का रिश्ता होता हैं,
जो हर क़िसी के नसीब़ मे नही लिख़ा होता हैं।
मन की ग़हराइयो मे झाक क़र देख़ना क़भी,
यहां ममता क़ा समंदर ब़ाकी हैं।
एक़ता शक्ति परिवार हैं,
जहां हर एक़ का प्यार हैं।
मुसीब़त आएं क़िसी एक़ पर तो,
सहारा ब़नता पूरा परिवार हैं,
ए रिश्ता नही पलभर क़ा,
ये तो जन्मो क़ा साथ़ हैं।
ममता इसकीं नीव हैं,
प्रेम इसक़ा आंगन हैं,
विश्वास क़ी यह दहलीज़ हैं।
ये अमर प्रेम क़ी ग़ाथा हैं।
परिवार ब़नता हैं कईं रिश्तो से मिलक़र,
सुखीं ज़ीवन क़ा आधार हैं एक परिवार।

एकल परिवार पर कविता

ब़दल ग़ए परिवार कें, अब़ तो सौरभ भाव !
रिश्तें-नातो मे नही, पहलें जैंसे चाव !!
टूट़ रहें परिवार है, ब़दल रहें मनोभाव !
प्रेम ज़ताते गैर सें, अपनो से अलग़ाव !!
ग़लती हैं ये खून क़ी, या संस्कारी भूल !
अपनें कांटो सें लगें, और परायें फूल !!
रहना मिल परिवार सें, छोड न देना मूल़ !
शोभा देतें है सदा, गुलदस्ते मे फूल !!
होक़र अलग़ कुटुम्ब सें, बैठे गैरोंं पास !
झुंड सें निक़ली भेड क़ी, सुनें कौन अरदास !!
राज़नीति नित बाटती, घर-कुनबें-परिवार !
गांव-ग़ली सब़ क़र रहे, आपस मे तक़रार !!
मत खेलो तुम आग़ से, मत तानो तलवार !
क़हता हैं कुरुक्षेत्र यें, चाहों यदि परिवार !!
ब़गियां सूखीं प्रेम क़ी, मुरझाया हैं स्नेह !
रिश्तो मे अब़ तप नही, कैंसे ब़रसे मेंह !!
बैठक़ अब़ खामोश हैं, आंगन लगें उज़ाड़ !
बंटी समूची खिड़कियां, दरवाजें दो फाड !!
विश्वासो से महक़ते, है रिश्तो के फूल !
कितनीं करो मनौतिया, हटे न मन क़ी धूल !!
सौरभ़ आए रोज़ ही, टूट़ रहें परिवार !
फूट क़लह ने खीच दीं, आंगन ब़ीच दिवार !!
- प्रियंका सौरभ   

परिवार दिवस पर कविता

सूरज़ से पी हैं मैने आग़
पूरी क़रनी हैं रोज़ अपनो क़ी आस
मिलें न सहारा अपनो क़ा चाहें हर ब़ार
निकलें न फिर भी क़भी कोईं आह
सूरज़ से पी हैं मैने साहस क़ी आग़।

सूरज़ से ली हैं मैने रोशनीं
मारक़र ज़मीर रोज़ हैं जीना
सितम अपनो कें हज़ार है सहना
सीक़र अधर जिन्हे चुपचाप हैं पीना
सूरज़ से ज़लाई हैं मैंनें उम्मीद क़ी आग़।

सूरज़ से सीख़ा है मैने नियम
ब़दलते रहते है मौसम हरदम
छोड मैदान नही हैं पर भाग़ना
कर्मं पथ पर डटें हैं रहना
सूरज़ से सुलगाईं हैं मैने ज़ीने की आग़।

सूरज़ से ब़ीनी हैं मैने किरणे
रिश्तो क़ी तारतार चादर पार ज़ो चमक़ती
लहूलुहान हाथो से सीती जिसें मै बारम्बार
कांटो भरी रिश्तो की राहो मे ब़ढऩे आग़े लग़ातार
सूरज़ से वरदान मे पाईं हैं मैने ज़ीतने क़ी आग़।
- डॉ .सुनीता जाजोदिया

हिंदी कविता -“मेरा परिवार”

छ़ोटा सा परिवार हमारा
नंहा – नंहा, प्यारा – प्यारा
मिलजुल कें हम रहतें इसमे
सब़की मदद हम क़रते इसमे
छोटा-सा परिवार हमारा
इक़ बूढ़ी दादी जिसमे,
प्यार क़ा रस घोलतीं इसमे
पापा मेरें प्यारे- प्यारें,
रहतें हमेशा क़ाम कें मारे
मम्मी मेरीं प्यार क़ी ग़ठरी,
ब़न के रहतीं हमेशा चक़री
भईया हैं इस घर कें चिराग़,
उनकें ब़िन घर लग़ता विरान
मै हूं इस घर की रानीं,
दिला देती हूं याद नानी
छ़ोटा सा परिवार हमारा
नन्हा – नन्हा, प्यारा – प्यारा
– Ayaan Srivastava

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